15 अप्रैल, 2018

हर समस्या का समाधान है नई समस्या

नीरज दइया
    मैं कोई नई बात नहीं बता रहा हूं, यह तो आप सभी जानते ही हैं कि लोहा लोहे को काटता है। बात बिल्कुल छोटी सी है और मुझे तो यह भी पता है कि आपको सच और झूठ दोनों स्थितियों में गर्दन हिलाने की आदत है। यह एक बेहतर स्थिति है। इससे आप भी मेरी तरह यह प्रगट नहीं होने देना चाहते हैं कि आप ज्ञानी हैं अथवा अज्ञानी। यह हमारा सर्वकालिक सूत्र रहा है- जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी। हम जो कुछ है वह भावना और दृष्टि में हैं।
    हमारे भारतीय स्वभाव का यह अभिन्न अंग है कि जो हम नहीं जानते हैं, वह भी हम जानते हैं। हमको भगवान ने सब कुछ दिया है। अब सब कुछ में क्या कुछ नहीं आता, यह हम नहीं जानते हैं। इतिहास को देख हम मुदित होते हैं कि हमने दुनिया को जीरो हमने दिया और हम पूरे महान हो गए। अब बार-बार महान होना और महानता को प्रमाणित करना हमें रास नहीं आता है। हम तो सादा जीवन उच्च विचार वाले हैं। हमें प्रर्दशन बिल्कुल पसंद नहीं है और तो और हमारे यहां अज्ञानता प्रदर्शन को तो वर्जित माना गया है।
    अब नए बच्चों को कम समझ आता है इसलिए मैं उन्हें समझाने के लिए इसी सूत्र को थोड़ा-सा समझा रहा हूं। मैं समझाने के मामले में जरा कंजूस-सा हूं, आपको यदि पूरा समझा दूंगा तो मुझ से मेरी पूरी समझ स्थानांतरित हो जाएगी। अस्तु आप थोड़े में संतोष करें। संतोषी सदा सुखी होते हैं। मैं मेरी समझ का शेष पूरा भाग मेरे पास रखना अपना अधिकार मानता हूं। देखिए ना बाज वक्त मेरी यह समझ मेरे और आपके काम आनी है। हां, तो जैसा कि मैंने कहा लोहा लोहे को काटता है, यह हमारा आप्त-वाक्य है। वैसे पते की बात यह भी है कि हमारे देश में बहुत से लोग हरदम रोते ही रहते हैं।
    अब बेरोजगारी की समस्या की ही बात करते हैं। असल में हमें हमारी मूल समस्या का पता नहीं है और हमारे नेता यह अच्छे से जानते हैं कि जैसे लोहा लोहे को काटता है ठीक वैसे ही समस्या समस्या को काटती है। बस हमने हमारी एक समस्या को काटने के लिए दूसरी और दूसरी को काटने के लिए तीसरी समस्या पर ध्यान केंद्रित किया है। अब हमारे यहां समस्याओं का एक अम्बार बन गया है। समस्या समस्या को काटती है की तर्ज पर बहुत से प्रयोग किए गए हैं। अब चुनाव की बात करें तो पार्टी पार्टी को काटती है।
    वैसे हमारी हर समस्या से भी देश में खुशहाली बढ़ी है। सुनने में तो बेरोजगारी की समस्या बड़ी लगती है पर इसी की बदौलत कितने ही लोग रोजगार पा रहे हैं। इसी बेरोजगारी से तो हमारी सरकार भी माला माल हो रही है। चार पोस्ट निकालती है और उसके लिए फार्म और फीस के नाम पर वारे न्यारे हैं। अब फार्मों के अंबार की समस्या जब आई तो सब कुछ ऑन-लाइन कर दिया है। हमारी नई परीक्षा तकनीक, सब कुछ ऑन लाइन कर दिया है। जिनके लिए यह ऑन लाइन समस्या है उनके लिए भी हम किसी दूसरी समस्या का इजाद करेंगे। अब सुख-दुख और अच्छे दिन सब कुछ ऑन लाइन है। इससे पर्यावरण और प्रदूषण की समस्या का भी अंत हुआ कि नहीं हुआ? बोलो? अरे कुछ तो बोलो, केवल गर्दन नहीं हिलानी है। झूठ और सच में अंतर करना सीखो भाई। अब समय आ गया है कि सच को सच कहें और झूठ को झूठ।
    चलिए जो मन में है उसे कहना सीखें। भैया, मन की बात बोलो और अपने सारे राज खोलो। देखिए हमारे माननीय प्रधानमंत्रीजी इतने बड़े पद पर होते हुए अपने मन की बात बोलते हैं। जब वे कुछ छुपा कर नहीं रखते तो हम और तुम यानी आम आदमियों की औकात ही क्या है। सच में अब सभी को अपने अपने मन की बात कहनी चाहिए। समस्या यह है कि मन की बात कहना कठिन है।
    पंच काका का तो मानना है कि गोपियों की भांति हमारे मन को कोई कृष्ण ले गया है। हम बिना मन वाले भला मन की कोई बात कह ही कैसे सकते हैं। याद रखना किसी झूठ पर गर्दन हिलाने से पहले नेक-प्रोब्लम और बाद में नोज-प्रोब्लम हो सकती है।
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