31 जुलाई, 2017

एक तीर : कई निशानें

मारे आदि-आयुध तीर-कमान रहें हैं। समय ने प्रगति की और अनेकानेक आयुधों के इस दौर में हम उन्हें भूल गए हैं। तीखे तीर से राम ने रावण को मारा। वैसे तीर की क्षमता उसकी तीक्ष्णता पर निर्भर नहीं करती है, यह कमाल तो हाथ और अंगूठा दिखाता है। हमारे सामने कोई तीर ताने यह सहनीय है, पर हमें कोई अंगूठा दिखाए.... यह असहनीय है! गुरु द्रोण के समय से ही अगूंठा देखने की हमारी आदत बिगड़ी हुई है। अब तो शिष्यों ने बिना मांगे ही गुरुओं को अगूंठें देने आरंभ कर दिए हैं। अगूंठा देना और दिखाना भी एक कला है, ठीक वैसे ही जैसे कि तीर चलाना और तीर झेलना कला है।
गुरुजी भी कम नहीं, वे भी अब अगूंठा मांगते नहीं, बहुत हो चुका वे अब सरेआम अगूंठा-छाप घोषित करते हैं। कल की ही बात लो, भरी सभा में गुरुजी ने बोलते हुए सवाल दागा- ‘लिंचिंग’ का मतलब किसी को पता है? सारे चुप! यह लिंचिंग बीच में कहां से आ गया। वे बोल तो ब्लीचिंग पाउडर पर थे और बीच में उनका अहम जाग गया। अपनी कुटिल मुस्कान के साथ वे बोले- मुझे पता है, आपको नहीं पता होगा। आप जब इस देस में रहते हुए भी अगला-पिछला कुछ जानते नहीं, फिर अगूंठा-छापों की श्रेणी में आ जाओ। सुनिए हाल ही के दिनों में भीड़ के हाथों बढ़ रहे क़त्ल के लिए लिंचिंग शब्द प्रचलन में आया है। हाय जुनैद, इतनी बड़ी बात और ये सब नहीं जानते!
वर्षों पहले गीतकार मजरुह सुलतानपुरी ने गुरुजी की किसी बात पर लिखा था- ‘कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना’। नाजुक दिलों को ऐसे और वैसे तीर कुछ ज्यादा ही घायल करते हैं। इस तश्वीर का दूसरा पहलु यह भी है कि रोजाना ऐसे अगूंठे देखने वालों का दिल मजबूत हो जाता है। वे कठोर, निष्ठुर ऐसे घायल नहीं होते। कोई घायल बाद में गुरुजी के बारे में कह रहा था कि उनका मन था, मंच पर जाकर कुछ ऐसा पूछे जिसका जबाब गुरुजी के गुरुजी को भी नहीं आता हो। माना यह उनकी भ्रांति थी पर वे मन मार कर रह गए। ऐसा अगर तीर चल भी जाता तो क्या होता? गुरुजी का स्वभाव रहा है कि ऐसे पथभ्रष्ट चेलों को सार्वजनिक रूप से बदनाम कर दो। ऐसे नालायक चेलों की भ्रूण-हत्याएं गुरुजी बखूबी कर डालते हैं। ऐसे बांसों को वे जड़-मूल से नष्ट करने की कला में पारंगत हैं, इसलिए बांसुरी वही बजती है जिसके सुर सात होते हैं। कोर्स में आठवां सुर नहीं फिर कैसे कोई नया आलाप ले सकता है। यह निषेध है। विधि सम्मत नहीं।
पक्ष हो या विपक्ष, गुरु हो या शिष्य सभी की यही कामना होती है कि कोई ऐसा तीर मिल जाए जिससे कई निशाने एक साध सध जाएं। इश्यू बनाने पड़ते हैं, ढूंढ़ने पड़ते हैं। अब तो ‘एक साधै : सब सधे’ की तर्ज पर बस एक तीर को साधना चाहते हैं कि अगला-पिछला सब सध जाए। ऐसे साधक अपनी लाठियों को सलामत रखते हुए सांपों को मारने निरंतर अभ्यास करते हैं, पर इसका क्या किया जाए जब उनकी आस्तीनों में सांप पल रहे हो। ऐसे में सलामत लाठियों को खुद पर ही बरसाना होता है।
पंच काका कहते हैं- चोर-चोर मैसेरे भाई, कोई कुछ कहता-करता नहीं। आग लगानी तो सरल है पर बुझानी जरा कठिन। आंदोलन करना तो सरल है पर हिंसा रोकनी जरा कठिन। तीर चलाया तो जा सकता है पर उनके घाव मिटाना जरा कठिन है।
० नीरज दइया 
 

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