15 जुलाई, 2017

स्कूली-पाठ्यक्रम की जीवन में उपादेयता

    फेसबुक से जुड़ी अनेक कहानियां है। मैं एक छोटी-सी कहानी साझा करता हूं। जिन्हें कभी मैंने पढ़ाया था, वर्षों बाद फेसबुक की दुनिया में वे अनेक छात्र-छात्राएं मुझे मिले। यह जया की कहानी है। उसने अपने स्कूल-टाइम के टीचर यानी मुझ से एक सवाल किया- “सर, ये जो आपने हमें पढ़ाया था... साइन-कोस-टेन... वगैराह-वगैराह... वो हमें यूज कब करना है?” प्रश्न बड़ा गंभीर है कि गणित या फिर अन्य विषयों का स्कूली पाठ्यक्रम हमारे भविष्य के जीवन में कितनी उपादेयता रखता है। अगर कोई पाठ्यक्रम आगे के जीवन में उपादेयता नहीं रखता है तो उसके पीछे हम सुनहरा बचपन और युवावस्था को कोई बोझिल बनाते हैं?
    सभी शिक्षकों की मजबूरी होती है कि उन्हें पाठ्यक्रम पूरा करना होता है। जो पाठ्यक्रम में है, जैसा पाठ्यक्रम में है उन्हें उसे पढ़ाना होता है। नौकरी का असूल है कि दिया हुआ काम करो। कोई ऐसा-वैसा सवाल मत करो। पाठ्यक्रम निर्माण और ऐसी अनेक गंभीर बातें बड़े-बड़े नेताओं और शिक्षाविदों के बस की बातें हैं। उसे कोई गांव का या शहर का सामान्य शिक्षक नहीं समझ सकता। मैं भी जब विज्ञान-विद्यार्थी के रूप में स्कूल-कॉलेज में पढ़ रहा था, तब मेरे लिए भी यह रहस्य था- ‘हम क्यों पढ़ रहे हैं? यह हमारे आगे के जीवन में कब काम आएगा।’ मैं शिक्षक बनने का प्रशिक्षण ले रहा था, तब भी मन में ऐसे अनेक सवाल आते थे। सवालों का होना एक अच्छे अध्येता की निशानी है। ऐसे मेरे सवालों का जवाब मैंने खोजने और पूछने का प्रयास किया। कुछ विषयों और पाठ्यक्रम के कुछ हिस्से के बारे में तो कुछ बातें ठीक लगी पर इस सवाल का पूरा जबाब किसी ने नहीं दिया, कहीं नहीं मिला। बहुधा तो मेरे शिक्षक मेरे सवाल का जवाब ही अपने कुछ सवालों में देते थे। और उन दिनों कभी ऐसे जबाब मिलते थे कि मेरी समझ में नहीं आया था। अब भी मैं यदि अपने अनुभव से जवाब देने का प्रयास करूंगा तो वह अंतिम जबाब होगा ऐसा नहीं कह सकता। कुछ आंशिक जबाब ही सही इस बात पर जया के बहाने चर्चा की जानी चाहिए।
    शिक्षक के रूप में शिक्षा-नीतियों और पाठ्यक्रम आदि के बारे में आलोचना नहीं की जा सकती। किसी भी शिक्षक का ऐसा करना गलत है। दूसरे को इस बात से उनका सरोकार है नहीं, फिर इस पर चर्चा कौन करेगा। यह आलोचना नहीं वरन हमारे देश के भविष्य का प्रश्न है जिससे लाखों-करोड़ों की अभिलाषाएं और जीवन जुड़ा है। मुझे लगता है कि स्कूली पाठ्यक्रम के दौरान बच्चे जिस अवस्था में होते हैं वहां उनके माता-पिता, अभिभावकों अथवा शिक्षकों को यह जानकारी होना संभव नहीं कि बच्चा आगे चलकर क्या बनेगा। जब हमें मालूम नहीं विद्यार्थी आगे चलकर क्या करेगा, पाठ्यक्रम में समाहित सारी बातें जीवनोपयोगी हैं। स्कूली पाठ्यक्रम ऐसे विविध वितानों का समुच्चय है जिनके लिए बच्चे से हम उम्मीद करते हैं। यह ठीक किसी बीज में पेड़ होने का सपना देखने जैसा है। ऐसे में बहुत जरूरी है कि उन्हें वह सब कुछ पढ़ाया और सीखाया जाए जिसकी आगे चल कर किसी मार्ग पर उन्हें आवश्यकता पड़ सकती है। यह पहले जैसा सामज नहीं कि लड़की को चिट्ठी लिखनी-पढ़नी आ जाए तो बस हो गई पढ़ाई। आगे जाकर रोटियां बनाने वाली महिलाएं अब केवल रोटियां बनाने वाली नहीं रही हैं। उनकी उम्मीदे, सपने और सरोकार इस देस समाज को प्रभावित करते हैं।
    श्रेष्ठ शिक्षक जीवन पर्यंत शिक्षार्थी बना रहता है। मुझे मेरे शिक्षार्थी होने में गर्व और आनंद है। किसी भी सफल शिक्षार्थी की निशानी है कि उसके पास कुछ सवाल है। जया, त्रिकोणमिति में साइन-कोस-थीटा को बहुत अच्छे से समझ कर, मैंने इतने विद्यार्थियों को पढ़ाया कि वह पूरा अध्याय रट-सा गया है। दैनिक जीवन में त्रिभुज और पूरी त्रिकोणमिति का गहरा अभिप्राय संभव है। केवल तीन भुजाओं और तीन कोण के माध्यम से अनेक गूढ़ अर्थों को समझ सकते हैं। किसी भी विद्यार्थी की असली पढाई अपने पाठ्यक्रम को याद रखना और स्कूली जीबन के संस्कारों का पोषण करना है। किसी का गुण मानना है, किसी को याद रखना और अपने सांस्कृतिक मूल्यों को आने वाली पीढ़ियों को सौंपना ही संसार का नियम है। किसी गृहणी के जीवन में रोटी और सब्जी बनाते समय बेशक गणितीय शिक्षा के आधार-लंब और कर्ण आदि का कोई विशेष अर्थ नहीं होता। घर के बच्चों को पालते समय भी नहीं होता शायद, पर जब वे बच्चे स्कूल जाएंगे तब अर्थ होने लगेगा। अगर माता-पिता ‘साइन-कोस-टेनथीटा’ से परिचित हैं, तो वे बच्चों को संभाल सकते हैं। उनकी मदद कर सकते हैं, कुछ बता सकते हैं। जया तुम्हारे बच्चे इंजिनियन बनेंगे अथवा गणित-विज्ञान पढेंगे, तब थीटा तुम्हारे लिए कुछ काम का होगा। कोई एक आदमी केवल एक काम करता है पर देश में एक नहीं अनेक काम है और उन अनेक कामों की संभावनों से जुड़ी हमारी शिक्षा पद्धति है। स्कूली-पाठ्यक्रम की जीवन में उपादेयता इसी बात पर निर्भर करती है कि यह हमारी सामूहिकता और एकता का प्रतीक है। पूरे देश में समान पाठ्यक्रम इसी बात पर आधारित है।
नीरज दइया




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