31 जुलाई, 2017

एक तीर : कई निशानें

मारे आदि-आयुध तीर-कमान रहें हैं। समय ने प्रगति की और अनेकानेक आयुधों के इस दौर में हम उन्हें भूल गए हैं। तीखे तीर से राम ने रावण को मारा। वैसे तीर की क्षमता उसकी तीक्ष्णता पर निर्भर नहीं करती है, यह कमाल तो हाथ और अंगूठा दिखाता है। हमारे सामने कोई तीर ताने यह सहनीय है, पर हमें कोई अंगूठा दिखाए.... यह असहनीय है! गुरु द्रोण के समय से ही अगूंठा देखने की हमारी आदत बिगड़ी हुई है। अब तो शिष्यों ने बिना मांगे ही गुरुओं को अगूंठें देने आरंभ कर दिए हैं। अगूंठा देना और दिखाना भी एक कला है, ठीक वैसे ही जैसे कि तीर चलाना और तीर झेलना कला है।
गुरुजी भी कम नहीं, वे भी अब अगूंठा मांगते नहीं, बहुत हो चुका वे अब सरेआम अगूंठा-छाप घोषित करते हैं। कल की ही बात लो, भरी सभा में गुरुजी ने बोलते हुए सवाल दागा- ‘लिंचिंग’ का मतलब किसी को पता है? सारे चुप! यह लिंचिंग बीच में कहां से आ गया। वे बोल तो ब्लीचिंग पाउडर पर थे और बीच में उनका अहम जाग गया। अपनी कुटिल मुस्कान के साथ वे बोले- मुझे पता है, आपको नहीं पता होगा। आप जब इस देस में रहते हुए भी अगला-पिछला कुछ जानते नहीं, फिर अगूंठा-छापों की श्रेणी में आ जाओ। सुनिए हाल ही के दिनों में भीड़ के हाथों बढ़ रहे क़त्ल के लिए लिंचिंग शब्द प्रचलन में आया है। हाय जुनैद, इतनी बड़ी बात और ये सब नहीं जानते!
वर्षों पहले गीतकार मजरुह सुलतानपुरी ने गुरुजी की किसी बात पर लिखा था- ‘कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना’। नाजुक दिलों को ऐसे और वैसे तीर कुछ ज्यादा ही घायल करते हैं। इस तश्वीर का दूसरा पहलु यह भी है कि रोजाना ऐसे अगूंठे देखने वालों का दिल मजबूत हो जाता है। वे कठोर, निष्ठुर ऐसे घायल नहीं होते। कोई घायल बाद में गुरुजी के बारे में कह रहा था कि उनका मन था, मंच पर जाकर कुछ ऐसा पूछे जिसका जबाब गुरुजी के गुरुजी को भी नहीं आता हो। माना यह उनकी भ्रांति थी पर वे मन मार कर रह गए। ऐसा अगर तीर चल भी जाता तो क्या होता? गुरुजी का स्वभाव रहा है कि ऐसे पथभ्रष्ट चेलों को सार्वजनिक रूप से बदनाम कर दो। ऐसे नालायक चेलों की भ्रूण-हत्याएं गुरुजी बखूबी कर डालते हैं। ऐसे बांसों को वे जड़-मूल से नष्ट करने की कला में पारंगत हैं, इसलिए बांसुरी वही बजती है जिसके सुर सात होते हैं। कोर्स में आठवां सुर नहीं फिर कैसे कोई नया आलाप ले सकता है। यह निषेध है। विधि सम्मत नहीं।
पक्ष हो या विपक्ष, गुरु हो या शिष्य सभी की यही कामना होती है कि कोई ऐसा तीर मिल जाए जिससे कई निशाने एक साध सध जाएं। इश्यू बनाने पड़ते हैं, ढूंढ़ने पड़ते हैं। अब तो ‘एक साधै : सब सधे’ की तर्ज पर बस एक तीर को साधना चाहते हैं कि अगला-पिछला सब सध जाए। ऐसे साधक अपनी लाठियों को सलामत रखते हुए सांपों को मारने निरंतर अभ्यास करते हैं, पर इसका क्या किया जाए जब उनकी आस्तीनों में सांप पल रहे हो। ऐसे में सलामत लाठियों को खुद पर ही बरसाना होता है।
पंच काका कहते हैं- चोर-चोर मैसेरे भाई, कोई कुछ कहता-करता नहीं। आग लगानी तो सरल है पर बुझानी जरा कठिन। आंदोलन करना तो सरल है पर हिंसा रोकनी जरा कठिन। तीर चलाया तो जा सकता है पर उनके घाव मिटाना जरा कठिन है।
० नीरज दइया 
 

15 जुलाई, 2017

स्कूली-पाठ्यक्रम की जीवन में उपादेयता

    फेसबुक से जुड़ी अनेक कहानियां है। मैं एक छोटी-सी कहानी साझा करता हूं। जिन्हें कभी मैंने पढ़ाया था, वर्षों बाद फेसबुक की दुनिया में वे अनेक छात्र-छात्राएं मुझे मिले। यह जया की कहानी है। उसने अपने स्कूल-टाइम के टीचर यानी मुझ से एक सवाल किया- “सर, ये जो आपने हमें पढ़ाया था... साइन-कोस-टेन... वगैराह-वगैराह... वो हमें यूज कब करना है?” प्रश्न बड़ा गंभीर है कि गणित या फिर अन्य विषयों का स्कूली पाठ्यक्रम हमारे भविष्य के जीवन में कितनी उपादेयता रखता है। अगर कोई पाठ्यक्रम आगे के जीवन में उपादेयता नहीं रखता है तो उसके पीछे हम सुनहरा बचपन और युवावस्था को कोई बोझिल बनाते हैं?
    सभी शिक्षकों की मजबूरी होती है कि उन्हें पाठ्यक्रम पूरा करना होता है। जो पाठ्यक्रम में है, जैसा पाठ्यक्रम में है उन्हें उसे पढ़ाना होता है। नौकरी का असूल है कि दिया हुआ काम करो। कोई ऐसा-वैसा सवाल मत करो। पाठ्यक्रम निर्माण और ऐसी अनेक गंभीर बातें बड़े-बड़े नेताओं और शिक्षाविदों के बस की बातें हैं। उसे कोई गांव का या शहर का सामान्य शिक्षक नहीं समझ सकता। मैं भी जब विज्ञान-विद्यार्थी के रूप में स्कूल-कॉलेज में पढ़ रहा था, तब मेरे लिए भी यह रहस्य था- ‘हम क्यों पढ़ रहे हैं? यह हमारे आगे के जीवन में कब काम आएगा।’ मैं शिक्षक बनने का प्रशिक्षण ले रहा था, तब भी मन में ऐसे अनेक सवाल आते थे। सवालों का होना एक अच्छे अध्येता की निशानी है। ऐसे मेरे सवालों का जवाब मैंने खोजने और पूछने का प्रयास किया। कुछ विषयों और पाठ्यक्रम के कुछ हिस्से के बारे में तो कुछ बातें ठीक लगी पर इस सवाल का पूरा जबाब किसी ने नहीं दिया, कहीं नहीं मिला। बहुधा तो मेरे शिक्षक मेरे सवाल का जवाब ही अपने कुछ सवालों में देते थे। और उन दिनों कभी ऐसे जबाब मिलते थे कि मेरी समझ में नहीं आया था। अब भी मैं यदि अपने अनुभव से जवाब देने का प्रयास करूंगा तो वह अंतिम जबाब होगा ऐसा नहीं कह सकता। कुछ आंशिक जबाब ही सही इस बात पर जया के बहाने चर्चा की जानी चाहिए।
    शिक्षक के रूप में शिक्षा-नीतियों और पाठ्यक्रम आदि के बारे में आलोचना नहीं की जा सकती। किसी भी शिक्षक का ऐसा करना गलत है। दूसरे को इस बात से उनका सरोकार है नहीं, फिर इस पर चर्चा कौन करेगा। यह आलोचना नहीं वरन हमारे देश के भविष्य का प्रश्न है जिससे लाखों-करोड़ों की अभिलाषाएं और जीवन जुड़ा है। मुझे लगता है कि स्कूली पाठ्यक्रम के दौरान बच्चे जिस अवस्था में होते हैं वहां उनके माता-पिता, अभिभावकों अथवा शिक्षकों को यह जानकारी होना संभव नहीं कि बच्चा आगे चलकर क्या बनेगा। जब हमें मालूम नहीं विद्यार्थी आगे चलकर क्या करेगा, पाठ्यक्रम में समाहित सारी बातें जीवनोपयोगी हैं। स्कूली पाठ्यक्रम ऐसे विविध वितानों का समुच्चय है जिनके लिए बच्चे से हम उम्मीद करते हैं। यह ठीक किसी बीज में पेड़ होने का सपना देखने जैसा है। ऐसे में बहुत जरूरी है कि उन्हें वह सब कुछ पढ़ाया और सीखाया जाए जिसकी आगे चल कर किसी मार्ग पर उन्हें आवश्यकता पड़ सकती है। यह पहले जैसा सामज नहीं कि लड़की को चिट्ठी लिखनी-पढ़नी आ जाए तो बस हो गई पढ़ाई। आगे जाकर रोटियां बनाने वाली महिलाएं अब केवल रोटियां बनाने वाली नहीं रही हैं। उनकी उम्मीदे, सपने और सरोकार इस देस समाज को प्रभावित करते हैं।
    श्रेष्ठ शिक्षक जीवन पर्यंत शिक्षार्थी बना रहता है। मुझे मेरे शिक्षार्थी होने में गर्व और आनंद है। किसी भी सफल शिक्षार्थी की निशानी है कि उसके पास कुछ सवाल है। जया, त्रिकोणमिति में साइन-कोस-थीटा को बहुत अच्छे से समझ कर, मैंने इतने विद्यार्थियों को पढ़ाया कि वह पूरा अध्याय रट-सा गया है। दैनिक जीवन में त्रिभुज और पूरी त्रिकोणमिति का गहरा अभिप्राय संभव है। केवल तीन भुजाओं और तीन कोण के माध्यम से अनेक गूढ़ अर्थों को समझ सकते हैं। किसी भी विद्यार्थी की असली पढाई अपने पाठ्यक्रम को याद रखना और स्कूली जीबन के संस्कारों का पोषण करना है। किसी का गुण मानना है, किसी को याद रखना और अपने सांस्कृतिक मूल्यों को आने वाली पीढ़ियों को सौंपना ही संसार का नियम है। किसी गृहणी के जीवन में रोटी और सब्जी बनाते समय बेशक गणितीय शिक्षा के आधार-लंब और कर्ण आदि का कोई विशेष अर्थ नहीं होता। घर के बच्चों को पालते समय भी नहीं होता शायद, पर जब वे बच्चे स्कूल जाएंगे तब अर्थ होने लगेगा। अगर माता-पिता ‘साइन-कोस-टेनथीटा’ से परिचित हैं, तो वे बच्चों को संभाल सकते हैं। उनकी मदद कर सकते हैं, कुछ बता सकते हैं। जया तुम्हारे बच्चे इंजिनियन बनेंगे अथवा गणित-विज्ञान पढेंगे, तब थीटा तुम्हारे लिए कुछ काम का होगा। कोई एक आदमी केवल एक काम करता है पर देश में एक नहीं अनेक काम है और उन अनेक कामों की संभावनों से जुड़ी हमारी शिक्षा पद्धति है। स्कूली-पाठ्यक्रम की जीवन में उपादेयता इसी बात पर निर्भर करती है कि यह हमारी सामूहिकता और एकता का प्रतीक है। पूरे देश में समान पाठ्यक्रम इसी बात पर आधारित है।
नीरज दइया




13 जुलाई, 2017

निरे बुद्धू और गूगल बाबा

प्रतियोगिता परीक्षा के बाद बच्चे सवालों पर चर्चा करते हैं- कौनसा सही हुआ, कौनसा गलत। जो हुआ सा हो गया। पर नहीं, इनकों तो मेरे जैसे बुद्धिजीवियों की हालत दयनीय करनी होती है। पेशे से अध्यापक हूं और लेखक-कवि होने का वहम से खुद को बुद्धिजीवी मानने लगा हूं। यह कहने-सुनाने की बात नहीं है फिर भी यहां लिखना पड़ता है कि हम निरे बुद्धू हैं। हम से बड़ी-बड़ी उम्मीदें हैं। यह तो अच्छा हो गूगल बाबा का जो कुछ भी पूछो, जल्दी से बता देते हैं। यह एक गुप्त ज्ञान है। गूगल बाबा ने आधुनिक समाज में गुप्त-ज्ञान को सार्वजनिक ज्ञान की श्रेणी में कर दिया है। बच्चे ने पूछा- ‘तावान’ कहानी के लेखक कौन है? इसके साथ ही उसने चार कहानीकरों के नाम बता कर मेरा मुंह ताका। मुस्कुराता हुआ वह बोला- मुझे नहीं आता था इसलिए मैं प्रेमचंद का नाम देखकर, यही तुक्का चला आया हूं।
गूगल बाबा की जय हो कि तवान कहानी के कहानीकार प्रेमचंद ही हैं। काश! बात यहीं थम जाती तो ठीक थी। पर अगले सवाल से बुद्धिजीवी होने के वहम पर फिर गाज गिरी- ‘तावान’ का मतलब क्या होता है? एक बार फिर गूगल बाबा की जय बोलनी पड़ेगी। लाज रह गई, पर यह पक्का हो गया कि अब बिन गूगल के सब सून है। प्रेमचंदजी सरीखे लेखक भी क्या खूब थे! इतनी कहानियां लिखी कि नाम भी भला अटपटे और कठिन रख छोड़े हैं। बड़ी गलती पेपर-सेटर की है। भला यह भी क्या सवाल हुआ कि फलां कहानी किसकी है, और फलां कहानीकार की कहानी निम्न में से कौनसी? अब ये खामियाजा तो आने वाली पीढ़ियों के साथ-साथ हमको भुगतना होगा।
तावान यानी हर्जना, मुआवज़ा, क्षतिपूर्ति, अर्थदंड आदि शब्द अभी विस्मृति में पहुंचे ही नहीं थे कि हमारे शहर में एक हादसा हो गया। फटाखा गोदाम में हुई दुर्घटना ने इस बुद्धिजीवी के सामने फिर से बड़ी समस्या खड़ी कर दी। जान-माल का बड़ा नुकसान हुआ, इसका गम होने से अधिक दिखाने की कला हमें आनी चाहिए। ऐसी किसी भी घटना से अगर हमारी संवेदनशीलता आहत नहीं हो, तो हम काहे के बुद्धिजीवी? माना कि ऐसी घटना में कोई भरपाई यानी तावान संभव नहीं है। असली दर्द तो उसका है, जिसका घर-संसार उजड़ गया। गलती किसकी थी, कौन जिम्मेदार है, किसको सजा होगी? किसने अपनी ड्यूटी ठीक से नहीं की? यह सब फैसला तो होता रहेगा पर जिसकी जान गई उसका क्या होगा? ऐसी लाशों पर राजनीति और पार्टी की रोटियां सेकने वाले हमारे कितने हमदर्द है? बच्चे बड़े हो गए फिर भी सवाल करते हैं। ऐसे सवाल जिनका जबाब ना तो गूगल बाबा के पास है और ना निरे बुद्धू जी के पास। बच्चा जानना चाहता है कि एक मौत के पच्चीस लाख मुवावजा मांगने वाले ढाई लाख से राजी क्यों गए? यह भी जानना चाहता है कि ढाई लाख या पच्चीस लाख किसी मृतक के परिवार वाला सरकार को दे दे तो क्या उनका घर फिर आबाद हो जाएगा?
पंच काका कहते हैं कि ऐसी मौत की क्षतिपूर्ति संभव नहीं। कोई अर्थदंड ऐसे घावों को भर नहीं सकता। मौत के सामने हम सब लाचार होते हैं। वह किसके हिस्से कब-कहां-कैसे आएगी, इसकी खबर किसी खबरनवीश को भी नहीं होती। वैसे यह खबर है भी नहीं, यह तो परमात्मा का बड़ा व्यंग्य है। हम सब इस व्यंग्य के निशाने पर हैं। किसी का नंबर कभी भी लग सकता है।

* नीरज दइया 
 

10 जुलाई, 2017

कच्चे कान : पक्के कान

ठीक-ठीक इस विषय में कुछ कहा नहीं जा सकता कि कान पकड़ने की परंपरा का आरंभ कब हुआ और किसने किया। आदिकाल से कान दो प्रकार के पाए जाते रहे है। सजीव कान और निर्जीव कान। सभी सजीवों के कान सजीव कहलाते हैं, किंतु निर्जीव कान प्रायः दीवारों के होने के समाचार है। दीवारों के कान होते होंगे, पर आज तक किसी ने देखे नहीं। अनेक प्रमाणों के आधार पर पुष्ट होता है कि दीवारों के कान होते हैं।
    आधुनिक काल में कान को ठोक-बजाकर देखें तो कान की दो किस्में हैं- कच्चे कान और पक्के कान। कहते हैं कि अफसर के कान कच्चे होते हैं। वे किसी भी बात पर जल्दी भरोसा कर लेते हैं। खासकर अपने मेल स्पूनों और फीमेल स्पूनों द्वारा दूसरों के बारे में कही गई बातों को वे आंखें मूंद कर भरोसा कर लेते हैं। कर्मचारी के विषय में शोध के परिणाम आए हैं कि उनके कान पक्के होते हैं अथवा पक्के हो जाते हैं। कर्मचारी जब कर्मचारी के रूप में सेवा आरंभ करते हैं तब उनके कान अधपक्के होते हैं। जैसे ही प्रोबेशन पूरा होता है वे पक्के हो जाते हैं। अफसर के श्रीमुख से आरंभ में कर्मचारी इतना कुछ सुन चुका होता है कि उसके कान पकने लाजमी है। अफसर का काम होता है- कहना और कर्मचारी का बंधा-बंधाया काम है- सुनना। जब अफसर जब बार-बार कहता है तो समझ लिजिए कि साहब के कान कुछ ज्यादा ही कच्चे हो गए हैं।
    अफसर चाहता है कि वह कर्मचारियों के कानों को पकड़ कर रखे। अफिस के कर्मचारी भी भला कहां कम होते हैं, वे भी अफसर से भिन्न विचार नहीं रखते हैं। जब सभी के विचार अफसरी-विचार हो जाते हैं तो कान पकड़म-पकडाई का खेल आरंभ होता है। कौन मूर्ख सीधा सीधा कान पकड़ता है। इस खेल का असूल है कि कान पकड़ा तो जाए पर उसे जरा घुमाकर पकड़ा जाए। प्रत्यक्ष में सीधा-सीधा यह नहीं लगना चाहिए कि कान पकड़ा गया है।
    सीधा कान पकड़ना निगाहों में आ जाता है, घूमाकर पकड़ा हुआ कान निगाहों में नहीं आता। सुनते हैं कि सरकार सभी नौकरीपेशा कर्मचारियों को खूब पगार देती थी और तिस पर सातवां वेतन आयोग भी दे दिया गया है। जनता का मानना है कि सरकारी दामादों के तो व्यारे-न्यारे हो गए। पर कर्मचारियों के श्रीमुख से सुना जा रहा है कि क्या दिया, कुछ नहीं! इधर दिया, उधर ले लिया। वृद्धि के नाम पर बढ़ी हुई पगार देने के साथ ही भरपाई के लिए कर यानी टेक्स से सरकार ने सभी के कान पकड़ लिए हैं। 
    पंच काका कहते हैं कि जब किसी का कान सीधा-सीधा पकड़ना संभव नहीं हो तो दूसरे-तीसरे अथवा चौथे विकल्प पर विचार ही नहीं करना चाहिए। देखिए ना पहले हमारे जमाने में गुरुजी का साप्ताहिक कार्यक्रम होता था- बच्चों के दो-च्यार बार कान पकड़ना और कान के नीचे हाथ जमाना। कभी कभी उनकी मरजी होती तो वे कान घुमाने का प्रयास भी किया करते थे। कान घूमने में सीमा यह थी कि शिष्य की आंखें छल-छला आए और गुरुजी की मुस्कान- जा बैठ बेटा! अब गुरुजी कान पकड़ने और कान के नीचे दो च्यार हाथ जमाने के सपने भी नहीं देख सकते। ऐसे में अफसरों और कर्मचारियों को आचार-संहिता का पालन करना चाहिए। यह जान लें कि भलाई इसी में है कि ये कान-कान खेल बंद ही कर दिया जाए।     
० नीरज दइया

 

02 जुलाई, 2017

राजस्थानी व्यंग्य विधा के परसाई : बुलाकी शर्मा / डॉ. नीरज दइया

डॉ. नीरज दइया प्रख्यात व्यंग्यकार बुलाकी शर्मा के साथ
राजस्थानी के प्रख्यात लेखक विजयदान देथा का कथन था कि बुलाकी शर्मा राजस्थानी का परसाई है। इसका कोई लिखित साक्ष्य नहीं है। मित्रों के बीच यह कथन चर्चा में रहा है। यह अभिधा में की गई कोई टिप्पणी है अथवा व्यंजना में? प्रश्न यहां यह भी किया जाना चाहिए कि क्या केवल दो राजस्थानी व्यंग्य संग्रह- ‘कवि, कविता अर घरआळी’ (1987) और ‘इज्जत में इजाफो’ (2000) यानी 32 व्यंग्य के आधार पर उन्हें परसाई कहना उचित है? माना कि बहुत रचनाएं उनकी प्रकाशित हुई हैं जो संग्रह के रूप में नहीं आ सकी है अथवा अनेक अप्रकाशित राजस्थानी व्यंग्य हैं फिर क्या यह अतिशयोक्ति जैसा नहीं लगता है?
संभवत: यहां अतिशयोक्ति इसलिए नहीं है कि राजस्थानी में व्यंग्य को विधा के रूप में स्थापित करने वालों में बुलाकी शर्मा का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। यह कथन उनके संख्यात्मक अवदान को लेकर नहीं व्यक्त हुआ है वरन इस क्षेत्र में उनके निष्ठा से सतत कार्य को देखते हुए विजयदान देथा ने कहा होगा। यहां मैं अपने हवाले से यह कह रहा हूं कि राजस्थानी व्यंग्य विधा के परसाई बुलाकी शर्मा हैं।
बुलाकी शर्मा ने व्यंग्य संग्रह ‘इज्जत में इजाफो’ के समर्पण में लिखा है- ‘राजस्थानी गद्य में व्यंग्य विधा नै ठावी ठौड़ दिरावणिया सांवर दइया री ओळूं नै’। यहां यह उल्लेखनीय है कि सांवर दइया और बुलाकी शर्मा ने व्यंग्य विधा में महत्त्वपूर्ण कार्य किया किंतु दइया के असामयिक निधन से उनकी व्यंग्य-यात्रा ‘इक्यावन व्यंग्य’ पुस्तक पर संपूर्ण हो गई।
राजस्थानी व्यंग्य विधा में बुलाकी शर्मा से बहुत अपेक्षाएं और उम्मीदें इसलिए भी हैं कि वे हिंदी के भी प्रमुख व्यंग्यकार हैं अत: निश्चय ही उनकी राजस्थानी व्यंग्य-यात्रा बहुत दूर तक जाने वाली है। जिस भांति परसाई ने व्यंग्य को विधा के रूप में स्थापित किया वैसे ही राजस्थानी में व्यंग्य विधा में गंभीरता से कार्य करने वालों में बुलाकी शर्मा का नाम अग्रिम पंक्ति में लिया जाता है।
बुलाकी शर्मा और अन्य व्यंग्यकारों में अंतर है कि शर्मा व्यंग्य की व्यापक प्रवृत्ति और भाषा से परिचित इसलिए रहे कि उन्होंने हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं का अध्ययन-चिंतन किया है। वे व्यंग्य अथवा व्यंग्य कहानी में प्रयोग करने का प्रयास करते रहे हैं। उन्होंने कई सफल प्रयोग शिल्प और भाषा के स्तर पर किए भी हैं। उन्होंने परंपरा को शक्ति के रूप में स्वीकार करते हुए आधुनिकता की दिशा को अपनाया। स्थानीयता और लौकिक सत्यों के साथ वे स्थिति के अनुसार कभी पाठक के पक्ष में और कभी विपक्ष में खड़े होने से गुरेज नहीं करते। उन्होंने अपनी स्थिति सदैव एक जैसी अथवा पूर्वनिर्धारित कभी नहीं रखी। उनमें जीवन के प्रति आकर्षण का भाव है। वे बचपन से लेकर बुढापे तक के जीवन में विनोद और विसंगतियों को ढूंढ़ लेने में सक्षम हैं। ऐसी अनेक विशेषताओं के रहते उन्हें राजस्थानी व्यंग्य के लिहाज से परसाई कहा जा सकता है। वे हिंदी में भी लिखते हैं किंतु हिंदी के संदर्भ में यह उक्ति विचारणीय नहीं है, हिंदी व्यंग्य का क्षेत्र व्यापक है और उसमें एक परसाई हुए हैं। वहां बुलाकी शर्मा को बस बुलाकी शर्मा ही होना है और वे हिंदी व्यंग्य के प्रमुख हस्ताक्षर हैं भी।
व्यंग्यकार के रूप में बुलाकी शर्मा ने सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार किए। राजनीति हो अथवा समाज-व्यवस्था उन्हें जहां कहीं गड़बड़-घोटाला नजर आया वे अपनी बात कहने से नहीं चूके। उनके व्यंग्य में उनके अनुभवों का आकर्षण उनकी भाषा और शिल्प में देखा जा सकता है। उन के व्यंग्य में शब्द शक्तियों का जादू इस रूप में साकार होता है कि वे अपने पाठ में कब अभिधा से लक्षणा और व्यंजना शब्द शक्ति का कमाल दिखाने लगते हैं पता ही नहीं चलता और जब पता चलता है तब तक हम उसमें इतने आगे निकल आए होते हैं कि पिछली सारी बातें किसी कथा-स्मृति जैसे हमें नए अर्थों और अभिप्रायों की तरफ संकेत करती हुई नजर आती है। ऐसे में विसंगतियों के प्रति संवेदनशीलता करुणा के रूप में हमारे भीतर प्रवाहित होती है।
‘कवि, कविता अर घरआळी’ शीर्षक व्यंग्य में कथात्मकता है तो संवादों का आनंद भी। यहां घर-समाज में कविता के अवमूल्यन की स्थितियां और विरोधाभास की व्यंजना प्रमुखता से देखी जा सकती है। साहित्य और खासकर कविता को लेकर कवियों के जीवन पर करारा प्रहार है। बुलाकी शर्मा इस सत्य को स्थापित करने में सफल हुए हैं कि कोई व्यक्ति हर समय कवि नहीं हो सकता है अथवा उसे हर समय कवि नहीं होना चाहिए। कवियों के कविताओं को लेकर किए जाने वाले जुल्म पर आपने हिंदी में भी कई रचनाएं दी हैंै।
उनके हिंदी व्यंग्य की बात चली है तो यहां यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि उनकी कुछ रचनाएं राजस्थानी से हिंदी और कुछ हिंदी से राजस्थानी में मौलिक रचनाओं के रूप में प्रस्तुत हुई है। जैसे इसी संग्रह की रचना ‘संकट टळग्यो’ को ‘दुर्घटना के इर्द-गिर्द’ नाम से दस वर्ष बाद इसी नाम से प्रकाशित व्यंग्य संग्रह में संकलित किया गया है। इसी भांति इस संग्रह का ‘ज्योतिष रो चक्कर’ व्यंग्य हिंदी में ‘अंकज्योतिष का चक्कर’ के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसी विषय को लेकर उनके राजस्थानी व्यंग्य संग्रह ‘इज्जत में इजाफो’ का शीर्षक व्यंग्य अखबार के राशिफल का रहस्य उद्घाटित करता है। वे अंधविश्वासों पर प्रहार करते हैं तो उसे कथात्मक उदाहरणों द्वारा पोषित करते हैं।
बुलाकी शर्मा अपने निजी जीवन में सरकारी नौकरी के तौर पर कार्यालयों से जुड़े रहे। अत: उनकी रचनाओं में दफ्तर के अनेक चित्र प्रस्तुत किए गए हैं। ‘दफ्तर’ नामक व्यंग्य में नए अफसर को काबू में करने की एक कहानी है तो ‘दफ्तर-गाथा’ में चार लघुकथाओं के माध्यम से चार चित्रों की बानगी कार्यालय में होने वाली अनियमितताओं की तरफ संकेत करती है। बुलाकी शर्मा के व्यंग्य में समय, समाज और देश छोटी-छोटी घटनाओं-प्रसंगों के माध्यम से अपने बदलते रूप में हमारे सामने आता है। वे बदलते समाज को जैसे शब्दों में बांधते हुए अनेक प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष संकेत करते हैं।
‘नेतागिरी रो महातम’ में बदलती राजनीति और राजनीति से पोषित होते छोटे-बड़े नेताओं को लक्षित किया है तो ‘मिलावटिया जिंदाबाद’ में जैसा कि व्यंग्य के शीर्षक से ही स्पष्ट है कि मिलावट पर व्यंग्य किया है। यहां मिलावट पर व्यंग्य लिखते हुए उन्होंने जिस पाचक घी को लक्षित किया है उससे भी सधे हुए शिल्प में उन्होंने हिंदी में एक व्यंग्य लिखते हुए पाचक दूध को लेते हुए मिलावट और बदलते समय पर करारा प्रहार किया है।
बुलाकी शर्मा को आरंभिक प्रसिद्धि व्यंग्य ‘बजरंगबली की डायरी’ से मिली जो उनके हिंदी व्यंग्य संग्रह ‘दुर्घटना के इर्द-गिर्द’(1997) में संकलित है। इसी व्यंग्य का परिवर्तित-परिवद्र्धित रूप उनके व्यंग्य संग्रह ‘इज्जत में इजाफो’ (2000) में भी देखा जा सकता है। इसी क्रम में यहां उल्लेखनीय है कि उनकी प्रसिद्ध व्यंग्य-कथा ‘प्रेम प्रकरण पत्रावली’ व्यंग्य और कहानी दोनों रूपों में संकलित है। दो विधाएं हैं तो इनके दोनों के अपने अपने अनुशासन भी हैं किंतु बुलाकी शर्मा इन दोनों के मध्य के यात्री हैं। वे अक्सर कहानी में व्यंग्य लिखते हैं और व्यंग्य में कहानी। इस का अनुपम उदाहरण उनका व्यंग्य ‘पूंगी’ है। वे आरंभ तो इसे निबंध के रूप में करते हैं-‘साब अर सांप री रासी एक है, बियां ई दोनां री तासीर ई एकसरीखी हुवै।’ किंतु बहुत जल्द वे इसे साहब और उनके चापलूस कर्मचारी की कहानी में बदल देते हैं। अत: कहना चाहिए कि कहानी उनके अनुभव में है और व्यंग्य उनके विचार में है। उनका यह रूप किसी पाठक को नहीं अखरता। जब उन्हें विधाओं के खानों में स्थिर करने का प्रयास किया जाता है तब भी वे वहां स्थिर नहीं किए जा सकते हैं। कहानी उनसे व्यंग्य-निबंध के प्रभाव से मुक्त होने की अभिलाषा रखती है और व्यंग्य की यह अपेक्षा है कि वे कथात्मकता से मुक्त होकर निबंध में हाथ आजमाएं। फिलहाल वे इन दोनों ही स्थितियों से परे स्वयं को कहानी और व्यंग्य के साझा क्षेत्र में स्वयं को पाते हैं।
कहानीकार मालचंद तिवाड़ी ने लिखा है- ‘पूंगी अपने समग्र प्रभाव में एक बेधक और मारक व्यंग्य होते हुए भी अपनी रोचकता आख्यानात्मकता के बल पर कहानी के शिल्प में बुलाकी शर्मा की गहरी पकड़ का साक्ष्य है। बुलाकी शर्मा की राजस्थानी रचनाएं पढ़ते हुए रूसी कथाशिल्पी अंतोन चेखव और हिंदी के कालजयी व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई याद आते हैं तो उसका कारण यही है कि विडम्बना या ‘आयरनी’ की पहचान और उसके रचाव का प्रत्यक्ष विकास बुलाकी शर्मा छोटे-छोटे आख्यानों के जरिये सामने रखते हैं।’
‘इज्जत में इजाफो’ में राजस्थानी भाषा, साहित्य और साहित्यकारों पर व्यंग्य लिखे गए हैं। बुलाकी शर्मा के लेखन-संसार में किसी को कोई माफी नहीं है वह भले वे खुद हों या अन्य कोई। ‘थे चिंता करो’ में राजस्थानी भाषा की मान्यता से जुड़े मसले को लेखक ने तटस्थता से देखा है और जहां कमियां और न्यूनताएं हैं उन पर बेबाकी से जैसे अपना मत भी प्रस्तुत किया है। यह सारी चिंता और चिंतन व्यंग्य के स्तर पर उनका अपनी भाषा और साहित्य के प्रति प्रेम ही है। ‘सियाळो अर साहित्यकार’, ‘गुपतज्ञान’, ‘टाळवीं रचना भेजूं !’ अथवा ‘साहित्य सूं सरोकार’ व्यंग्य हों, वे अपने और समकालीन लेखकों की प्रवृत्तियों को जिस भाषा में एक एक कर उधेडऩा आरंभ करते हैं, वह देखते ही बनता है। व्यंग्य ‘सियाळो अर साहित्यकार’ की इस पंक्ति को देखें- ‘अबकी तो थांरी लाऊ-झाऊ टक्कर में है।  लागै बाजी मार लेसी।’ एक लेखक दूजै रै काळजै रो ऑपरेशन करर साची बात काढण सारू मिठास री सूंघणी सुंघावै।
यहां बुलाकी शर्मा का भाषिक चमत्कार है कि वे पुस्तक का नाम लाऊ-झाऊ और फिर आगे पांगळी जैसे प्रस्तुत करते हुए प्रवृत्ति की सांकेतिकता को जोड़ देते हैं। एक लेखक ने दूसरे लेखक के कलेजे से सच निकालने के लिए मिठास की सूंघनी और ऑपरेशन जैसे घटक व्यंग्य की मूल व्यंजना को जैसे द्विगुणित कर देते हैं। उनकी अन्य व्यंग्य रचनाओं में गुरु-टीचर, पुरातन-नवीन संस्कार, भक्ति-दर्शन-पुराण आदि के साथ बुद्धिजीवियों का चिंतन भी केंद्र में रहा है।
संपादक-कवि नागराज शर्मा सच ही कहते है- बुलाकी शर्मा व्यंग्य विधा के महारथी, राजस्थानी के सारथी और मानव-मनोविज्ञान के पारखी हैं।
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