10 दिसंबर, 2017

राजस्थान की साहित्यिक पत्रकारिता

डॉ. नीरज दइया
    साहित्यिक पत्रकारिता के विकास में राजस्थान का महत्त्वपूर्ण योगदान इस रूप में रहा है कि यहां न केवल हिंदी, वरन राजस्थानी, उर्दू, सिंधी व अन्य भाषाओं की साहित्यिक पत्रिकाएं भी प्रकाशित हुई है। वर्तमान में भी अनेक पत्र-पत्रिकाएं राजस्थान के साहित्यिक वातावरण को गतिशील किए हुए है। कहा जा सकता है कि राजस्थान के संपादकों-पत्रकारों ने इस तथ्य को समझा है कि साहित्य की समाज में अहम भूमिका होती है। भारतीय साहित्य में अगर हम विविध विधाओं के विकास और संवर्द्धन की बात करें तो यहां के साहित्य का पर्याप्त मूल्यांकन नहीं हो सका है। यहां के रचनाकारों की दोहरी भूमिका उल्लेखनीय है कि उन्होंने साहित्य लेखन के साथ साहित्यिक पत्रिकाओं का प्रकाशन भी किया है। वैसे साहित्यिक पत्रकारिता के मूल में मुख्य आधार वही सफल हुए हैं जहां संगठित होकर प्रयास किए गए हैं। फिर भी सरकारी और गैर सरकारी साहित्यिक संस्थाओं के अतिरिक्त अनेक व्यक्तिगत प्रयासों की भी सराहना करनी होगी कि जिनके अथक प्रयासों से यह परंपरा पोषित होती रही है। अधिकांश पत्रिकाओं का संपादन अवैतनिक और अव्यवसायिक रहा है।
    साहित्यिक पत्रकारिता में स्थितियां भले कभी कुछ लाभ की नहीं रही हो किंतु यह घर फूंक कर तमाशा देखना एक मिशन की बात है। आज तकनीकी विकास और आधुनिकता के दौर में साहित्यिक पत्रकारिका के संबंध में रहीम जी की पंक्तियां स्मरणीय हैं- रहिमन देखि बड़ेन को, लघु न दीजिए डारि। जहां काम आवे सुई, कहा करे तरवारि। राजस्थान की पत्रकारिता के संदर्भ में यह बात कुछ अधिक प्रासंगिक हो जाती है। राजस्थान के इतिहास में जाएं तो कहना होगा कि शौय-वीरता की इस धरती पर राजपूताना रियासतों के समय पत्रकारिता का आगाज हुआ। तत्कालीन समाज में राजनैतिक और समाजिक चेतना की जागृति हेतु समाचार पत्रों की महती भूमिका रही है। यहां की जनता पर राष्ट्रीय समाचार पत्रों का विशेष योगदान रहा, वहीं अजमेर, ब्यावर और जयपुर से अनेक समाचार पत्र प्रकाशित हुए। विभिन्न स्वतंत्रता सेनानियों जिनमें विजय सिंह पथिक, रामनारायण चौधरी, जयनारायण व्यास, सेठ जमनालाल बजाज आदि के नाम विशेष उल्लेखनीय है जिनका योगदान राजस्थान केसरी, नवीन राजस्थान, तरुण राजस्थान, प्रजा सेवक, अखंड भारत व आगीवाण जैसे पत्रों को प्रकाशित करने में रहा। साथ ही उन्होंने अनेक ने कविताओं और आलेखों के माध्यम से जनचेतना का संचार कर आजादी की अलख जगाने का प्रसार किया।
    पुस्तक ‘राजस्थान में जन-जागरण एवं पत्रकारिता’ के लेखक डॉ. रामचन्द्र रूण्डला अपनी शोध-खोज के आधार इस पर इस बात पर सहमत होते हैं कि राजस्थान में पत्रकारिका का आरंभिक दौर मनोरंजन और सुधारवादी दृष्टिकोण पर आधारित रहा। भारत में जहां पहला समाचार पत्र 1780 में प्रारंभ हुआ तो राजस्थान में 1949 में भरतपुर के शासक द्वारा हिंदी-उर्दू द्विभाषी पत्र ‘मजहरूल सरूर’ आरंभ हुआ। इस मासिक पत्र को राजपूताना का प्रथम पत्र माना जाता है। डॉ. कृष्णबिहारी मिश्र अपनी कृति ‘हिंदी पत्रकारिता’ में जातीय चेतना और खड़ी बोली साहित्य के निर्माण की भूमि तलाश करते हुए विभिन्न तथ्यों को उजागर करते हैं। किंतु राजस्थान की पहली साहित्यिक पत्रिका के विषय में अब भी शोध शेष है। इस दिशा में स्वतंत्र कार्य किए जाने की आवश्यकता है।
    आजादी के बाद प्रांतीय सरकारों ने साहित्य के विकास और उत्थान को ध्यान में रखते हुए अकादमियों की स्थापना की। इसी क्रम में राजस्थान में भी अकादमियां स्थापित हुई। आरंभ में राजस्थान साहित्य अकादमी (संगम) के नाम से वह हिंदी के साथ राजस्थानी भाषा के लिए कार्य करती रही थी प्रकारांतर में राजस्थानी के लिए पृथक से राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी, बीकानेर की स्थापना हुई। वर्तमान में राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर की मासिक पत्रिका मधुमति की सक्रियता इस रूप में है कि यह पत्रिका नियमित प्रकाशित हो रही है। सरकारी पत्रिकाओं का स्वरूप और रूपरेखा उसके संपादक और यहां कहा जाना चाहिए कि अध्यक्ष के बदल जाने से परिवर्तित होती है। देश में प्रकाशित होने वाली इस प्रकार की पत्रिकाओं में प्रायः जो सरकारी ढंग की एकरूपता-एकरसता को देखा जा सकता है उससे यह अकादमी भी अछूती नहीं है। नए अध्यक्ष और संपादक जो कुछ करना चाहते हैं अथवा करते हैं वह कुछ गतिशील होता है कि उनका समय समाप्त हो जाता है। नए चेहरे बाजय काम को देखने के पुराने चेहरों के काम को नकारते हुए अपने ढंग से कोइ नया काम करने की चेष्टा में फिर से नई पारी का आरंभ करते हैं।
    इस विषय का एक पक्ष यह भी है कि साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादक पत्रकारिता से जुड़ कर भी पत्रकार कहलाने के अधिकारी नहीं हैं। समाचार पत्रों के पत्रकार साहित्यिक पत्रिकाओं के संपादकों को पत्रकार की श्रेणी में नहीं मानते हैं। ऐसे संपादक-पत्रकार सदैव प्रकाशन संकट से जूझते, सीमित संसाधनों में पत्रिका निकालते हैं। वे रचनाकारों को मानदेय नहीं दे पाते हैं, रचनाकार भी अपनी वरियताओं के रहते इन्हें रचनाएं देने का अपना क्रम रखते हैं।
    कहने को तो अन्य प्रांतों की भांति राजस्थान से बहुत अधिक साहित्यिक पत्रिकाएं प्रकाशित हुई अथवा हो रही हैं किंतु ये अपने जिले-प्रांत की सीमाओं से बाहर निकल कर कुछ रचनात्मक पहचान बनाए तभी इनकी सार्थकता है। साहित्यिक पत्रिका के संपादक जो लेखक-कवि हैं ने पत्रकारिता को एक जरिया बनाने का प्रयास किया है जिससे कि वे स्वयं और अपने मित्रों को महान सिद्ध करने का उपक्रम सिद्ध कर सकें। साहित्य में कुछ लाभ लेने-देने के दृष्टिकोण से आरंभ की गई ऐसी पत्रिकाओं का प्रकाशन ऐसी सिद्धियों के बाद रोक दिया जाता है। कहना होगा कि खरी और सच्ची पत्रिकाएं बहुत कम है, जिनसे राजस्थान का नाम वर्तमान परिदृश्य में गर्व से लिया जा सके। खैर जैसे भी स्थितियां और हालात रहे हों किंतु इन साहित्यिक पत्र-पत्रिकाओं का वातावरण निर्माण और नए लेखकों को मंच देने में महत्त्वपूर्ण योगदान रहा है। भाषा, साहित्य तथा संस्कृति के क्षेत्र में साहित्यिक पत्रिकाओं का अतुलनीय योगदान स्वीकारा गया है।
    राजस्थान के अनेक दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक समाचार पत्र साहित्य को प्रमुखता देते हुए अपने परिशिष्ट प्रकाशित करते हैं। साहित्यिक लघु पत्र-पत्रिकाओं के सम्बन्ध में कहा जा सकता है कि ’लहर‘, ’बिन्दु‘, ’वातायन‘ ‘कृति ओर’ और ’पुरोवाक‘ आदि अनेक पत्रिकाओं ने हिन्दी जगत में अपनी पहचान बनाई। लघु संसाधनों के बावजूद भी इन पत्रिकाओं ने बड़े पाठक वर्ग तक अपनी पहुंच का दायरा बनाया।
    वैसे तो राजस्थान से अनेक लघु पत्र पत्रिकाएं प्रकाशित हुई और हो रही है किंतु यहां कुछ प्रमुख पत्रिकाओं की चर्चा इस आश्य से कर रहा हूं कि इस दिशा में व्यापक शोध-खोज से नए तथ्य प्रकाश में आएंगे। यहां किसी पत्रिका अथवा संपादक के कार्य का मूल्यांकन कम या अधिक के आधार पर नहीं किया जा रहा है, यह तो बस एक विहंगम परिदृश्य को देखने देखाने का प्रयास भर है।
अक्सर : त्रैमासिक रूप में प्रकाशित होने वाली इस पत्रिका के संपादक प्रख्यात कवि हेतु भारद्वाज है। जयपुर राजस्थान से प्रकाशित इस पत्रिका के अपने खास तेवर हैं। इस पत्रिका में जहां हिंदी साहित्य की विविध गतिविधियों और घटनाक्रम को समाहित किया जाता है वहीं परंपरा बोध के परिपेक्ष्य में साहित्यिक आलेख और अन्य सामग्री दी जाती है। गहरी सूझ-बूझ और विचारोत्तेजकता देख सकते हैं।
अनुकृति : यह त्रैमासिक पत्रिका जयश्री शर्मा के संपादन में जयपुर से प्रकाशित होती है।
अनुक्षण- प्रयास संस्थान चूरू की त्रैमासिक पत्रिका अनुक्षण के संपादक उम्मेद सिंह गोठवाल हैं। वर्ष 2015 में आरंभ हुई इस पत्रिका में कविता, कहानी, साक्षात्कार, संस्मरण आदि विधाओं को शामिल कर इसे भरा पूरा बनाए जाने के प्रयास किए जा रहे हैं।
अभिनव संबोधन- इसका प्रवेशांक हाल ही में आया है। इसमें दो अनुभवी रचनाकार जुड़े हुए हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि इनके द्वारा बेहतर काम होगा। प्रसिद्ध संपादक कमर मेवाड़ी पत्रिका के सलाहकार संपादक हैं तथा कहानीकार-कवि माधव नागदा संयुक्त संपादक है।
अरावली उद्घोष : इसका मासिक प्रकाशन उदयपुर से होता है। इसके संपादक बी पी वर्मा पथिक हैं। आदिवासी मीडिया व साहित्य के लिए समर्पित यह पत्रिका उल्लेखनीय है।
इतवारी पत्रिका : यह राजस्थान पत्रिका का प्रकाशन था, जिसमें प्रति रविवार साहित्य के अतिरिक्त समाज,देश और राजनीति पर साहित्यिक दृष्टिकोण से सजग साहित्यकारों के वैचारिक आलेख प्रकाशित होते थे। बड़े प्रकाशन समूह से जुड़े होने के बाद भी इतवारी पत्रिका ने व्यवसायिकता के साथ साहित्यिक दृष्टिकोण से लंबा सफर तय किया।
उत्पल : बोधि प्रकाशन द्वारा साहित्यिक पत्रिका प्रकाशन के क्रम में ‘उत्पल’ पत्रिका आरंभ की गई। कवि-संपादक और प्रकाशक मायामृग ने पत्रिका बड़े साज-सज्जा के साथ निकाली किंतु इसे नियमित नहीं रखा जा सका। इसके अंक संग्रहणीय कहे जा सकते हैं।
एक और अंतरीप : जयपुर से अजय अनुरागी इस पत्रिका को पिछले 23 वर्षों से प्रकाशित कर रहे हैं। इसका ताजा अंक अप्रैल-जून, 2017 को वरिष्ठ लेखक हेतु भारद्वाज पर केन्द्रित किया गया है।
कथारंग- युवा नाटककार-कवि हरीश बी. शर्मा ने बीकानेर शहर और संभाग में कथा साहित्य की परंपरा में तेजी से आए बदलावों को केंद्रित करते हुए अनेक कहानीकारों को कथारंग पत्रिका के माध्यम से मंच दिया है। यह एक अनुपम उदाहरण है कि किसी क्षेत्र विशेष में इतनी संख्या में कथाकार हो सकते हैं। इसका नया और तीसरा अंक लघुकथा पर केंद्रित आया है।
कथाराज- श्रीडूंगरगढ़ जब चूरू जिले में था तब यह कहानी केंद्रित पत्रिका चेतन स्वामी के संपादन में प्रकाशित होती थी। राजस्थान में नई कहानी के दौर में इस पत्रिका की अहम भूमिका रही है। 
कालबोध : प्रख्यात लेखक यादवेन्द्र शर्मा ‘चंद्र’ ने बीकानेर से कालबोध पत्रिका का प्रकाशन आरंभ किया। विशेष रूप से यह गद्य साहित्य और कथा केंद्रित पत्रिका कही जाती थी। बाद में 1957-58 के आस पास ‘नई चेतना’ नाम से पत्रिका का प्रकाशन किया गया।
किरसा : सूरतगढ़ से युवा साहित्यकार सतीश छिम्पा ने इस अनियतकालीन पत्रिका के तीन चार अंक प्रकाशित हुए। इसमें युवा रचनाशीलता के साथ संपादक की गहरी सूझ-बूझ देखी जा सकती है।
कुरजा संदेश : पत्रकर लेखक ईश मधु तलवार के संपादन में इस पत्रिका के अनेक विशेषांकों से कीर्तिमान स्थापित किया है। इसके सभी विशेषांक बेहद चर्चित रहे हैं। फिलहाल राजस्थानी कहानी पर केंद्रित भव्य और विशाल विशेषांक चर्चा के केंद्र में है।
कृति ओर- वरिष्ठ कवि विजेंद्र और डॉ. रमाकांत शर्मा के संयुक्त प्रयासों से इस पत्रिका ने कविता और आलोचना के क्षेत्र में अपना महत्त्वपूर्ण स्थान बनाया है। अपनी सुदीर्घ यात्रा में यह पत्रिका रुकी पर कभी झुकी नहीं। लंबे अंतराल पर भी अपने पाठकों-लेखकों का विश्वास बनाए रखा। इस पत्रिका का “लोकधर्मी कविता विशेषांक” अंक 60-61 विशेष चर्चा में रहा। इसका नया अंक 83-84 जनवरी-जून, 2017 विजेंद्र के निर्देशन में संपादक अमीरचंद वैश्य द्वारा प्रकाशित किया गया है।
खोजो और जाने : यह पत्रिका विद्या भवन उदयपुर की है जो शिक्षा जगत और समाजिक वैचारिकता पर केंद्रित है।
चर्चा : जोधपुर के कवि योगेन्द्र दवे ने लंबे समय तक कविता के विविध रूपों पर केंद्रित इस पत्रिका को चलाया। चर्चा के कवि और कविता पर केंद्रित अनेक अंक चर्चा में रहे।
तटस्थ : सीकर के शोध विद्वान डॉ. कृष्णबिहारी सहल ने इस त्रैमासिक पत्रिका को लघुपत्रिकाओं के निराशाजनक दौर में चालीस से अधिक वर्ष सतत सक्रिय बनाए रखा। यह बहुत पुरानी पत्रिका है जिसमें रचनात्मकता व विविधता किसी व्यवसायिक पत्रिका से कमतर नहीं है।
दृष्टिकोण : यह पत्रिका नरेन्द्र कुमार चक्रवर्ती कोटा से प्रकाशित कर रहे हैं।
नई गुदगुदी- जयपुर से प्रकाशित होने वाली इस पत्रिका का आकार भले छोटा हो किंतु हास्य और व्यंग्य के क्षेत्र में इसका बहुत नाम है। वर्षों से सक्रिय इस पत्रिका ने अनेक लेखकों और व्यंग्यकारों को जहां मंच दिया, वहीं सही और सच्ची बात करने से भी कभी गुरेज नहीं किया।
नजरिया : युवा कवि दिनेश चारण ने 2013 में इस पत्रिका को आरंभ किया और अब तक के प्रकाशित अंकों के आधार पर वे संभावनाओं से भरे संपादक के रूप में छवि बना चुके हैं। नजरिया में भाषा, साहित्य और संस्कृति के साथ समग्र कला माध्यमों को एक नजरिये से देखने-परखने और प्रस्तुत करने का साहस देखा जा सकता है। एक पुस्तक पर अनेक समीक्षकों से मूल्यांकन और भारतीय भाषाओं की रचनाओं को हिंदी में प्रस्तुत करना इसकी अन्य विशेषता कही जा सकती है। 
नया शिक्षक : शिक्षा विभाग राजस्थान की इस द्विभाषी पत्रिका का प्रकाशन त्रैमासिक होता था। इसका शिक्षा जगत में बड़ा नाम रहा है। इसमें साहित्यिक पुस्तकों की समीक्षा का अपना स्तर था। 
परंपरा- राजस्थानी शोध संस्थान जोधपुर की इस शोध पत्रिका ने अपनी सुदीर्घ यात्रा में राजस्थान और राजस्थानी को केन्द्र में रखा। इसके अनेक अंक आज भी स्मरणीय और धरोहर के रूप में याद किए जाते हैं। प्राचीन, मध्यकालीन साहित्य और अप्रकाशित साहित्य भंडार पर उल्लेखनीय कार्य हुआ।
पुरोवाक- पीयूष दईया के संपादन का यह उनकी पत्रकारिता का पहला आस्वाद था। इसमें निर्मल वर्मा और कृष्ण बलदेव बैद सरीखे लेखकों के साथ राजस्थान के कला जगत को और आधुनिक दृष्टिकोण को केंद्र में रखा गया था। एक दो अंकों के बाद इसका प्रकाशन स्थगित हो गया।
प्रतिलिपि : कवि गिरिराज किराडू ने इसे आरंभ में इंटरनेट पर और बाद में प्रिंट रूप में प्रकाशित किया। विशेष चयन दृष्टि और कुछ प्रिय लेखकों-कवियों के रचना-संसार में एक नए लेखक की उत्सुकता और सम्मान की दृष्टि यहां देखी जा सकती है। वर्तमान में भी अपनी वेव साइट और प्रिंट अंकों से कुछ खास रुचि के रचनाकारों पर इनका कार्य मंथर गति से चल रहा है।
प्रतिश्रुति : इसे जोधपुर से साहित्यकार रामप्रसाद दाधीच ने त्रैमासिक प्रकाशित किया। मरुधर मृदुल द्वारा संपादित यह पत्रिका लगभग दस वर्षों तक राजस्थान की रचनाशीलता को व्यापक परिदृश्य में स्थापित करती रही।
बनास : संपादक पल्लव ने उदयपुर से ’बनास‘ का प्रकाशन आरंभ में अनियतकालीन रखा। अब यह दिल्ली से प्रकाशित हो रही है। यह साहित्य में व्यक्ति और साहित्य केंद्रित उपक्रम से अपने हर अंक में एक नयी और जीवंत बहस को स्थापित करने वाली पत्रिका है। ‘काशी का अस्सी‘ के बहाने इस पत्रिका ने हिन्दी उपन्यास के स्वरूप पर गंभीर बहस कर साहित्यकारों एवं पाठकों का ध्यान खींचा। समकालीन रचनाशीलता पर किसी कृति अथवा कृतिकार पर अंक प्रकाशित करना संपादक की जिद और जनून है, जिसके रहते वे हर बार असंभव दिखने वाला कार्य संभव कर दिखाते हैं।
बाल वाटिका- प्रख्यात बाल साहित्यकार भैरूंलाल गर्ग ने बाल साहित्य के क्षेत्र में अनुपम काम कर दिखया है। अब तक दो सौ पचास से अधिक अंकों में बाल वाटिका राजस्थान ही नहीं वरन देश की ऐसी पत्रिका है जिसे बाल साहित्य के क्षेत्र में किसी भी प्रकार की चर्चा से पृथक नहीं किया जा सकता है। बाल साहित्य की विविध विधाओं और आलोचना के साथ विचार-विमर्श में संपादक भैरूंलाल गर्ग की गहरी सूझ-बूझ और प्रखर दृष्टि देखी जा सकती है।
बालहंस (पाक्षिक) राजस्थान पत्रिका के इस प्रकाशन ने बाल पाठकों में अपना गहरा स्थान बनाया है। यह पत्रिका राष्ट्रीय स्तर भी चर्चित और लोकप्रिय पत्रिका रही है।
मधुमति- राजस्थान सहित्य अकादमी की मासिक पत्रिका मधुमति की सुदीर्घ यात्रा रही है। यह उदयपुर से नियमित प्रकाशित हो रही है। वर्तमान में डॉ. इन्दुशेखर ‘तत्पुरुष’ अपनी साहित्यिक दृष्टि से इस पत्रिका को एक नया स्वरूप देने में संलग्न हैं।
मरूदीप - बीकानेर से प्रकाशित होने वाली इस पत्रिका में मक्खन जोशी का योगदान रहा। चौथा सप्तक के कवि आलोचक डॉ. नंदकिशोर आचार्य की ख्याति संपादक-पत्रकार के रूप हुई जिसमें इस पत्रिका का स्मरण किया जाता हैं। अपने वैचारिक आलेखों और रचनात्मकता से मरूदीप ने अपने समय में पूरे देश का ध्यान आकृषित किया।
मरूभारती- बिड़ला एज्यूकेशन ट्रस्ट, पिलानी की यह पत्रिका लंबे समय तक प्रकाशित होती रही। इसने शोध-खोज की दिशा में सराहनीय कार्य किया।
मारवाड़ी डाइजेस्‍ट : इसके संपादक रतन जैन, पडि़हारा (चूरू) हैं। यह नियमित प्रकाशन है।
लहर- प्रकाश जैन के संपादन में प्रकाशित होने वाली इस पत्रिका का साहित्यिक पत्रकारिता के क्षेत्र में बड़ा नाम रहा है।
वरदा- राजस्थान साहित्य समिति बिसाऊ की यह शोध पत्रिका डॉ. मनोहर शर्मा के संपादन में देश-दुनिया में चर्चित रही है। प्रचानी और मध्यकालीन साहित्य पर इस पत्रिका ने विशद कार्य किया है।
वातायन- बीकानेर के कवि हरीश भादाणी ने अपने संघर्ष के दिनों में अपने मित्रों के साथ तत्कालीन हिंदी साहित्य में इसे वरेण्य पत्रिका बना दिया था। वातायन चर्चा और विचार विमर्श के साथ समकालीन रचनाशीलता की प्रमुख पत्रिका रही। लंबे अर्से बाद इसका पुनर्प्रकाशन भी हुआ किंतु फिर से इसे बंद करना पड़ा। सूर्यप्रकाशन मंदिर के सूर्यप्रकाश बिस्सा ने भी वातयन के पुनर्प्रकाशन का दायित्व संभाला किंतु यह नियमित नहीं हो सकी।
विकल्प- बीकानेर के अजीत फाउंडेशन द्वारा प्रकाशित इस पत्रिका में वैचारिक आलेख, शोध और समीक्षा आदि प्रकाशित होती है।
शबनम ज्योति : इस अनियतकालीन पत्रिका का संपादन अब्दुल समद राही सोजत सिटी से करते हैं। वे पिछले तीस वर्षों से पत्रकारिता से जुड़े हैं। इस पत्रिका में राजस्थान के लेखकों की विविध विधाओं की रचनाओं को महत्त्व दिया जा रहा है। प्रतिष्ठ रचनाकारों के साथ नए और उदयीमान रचनाकारों के उत्थान में इस पत्रिका का सराहनीय योगदान रहा है।
शिविरा- शिक्षा विभाग राजस्थान की बीकानेर से प्रकाशित होने वाली इस शैक्षिक पत्रिका के प्रत्येक अंक में पुस्तक समीक्षाएं प्रकाशित होती है। इसका प्रचार-प्रसार पूरे राजस्थान के गांव गांव ढाणी ढाणी में है क्यों कि इसमें शिक्षा विभाग के आदेश प्रकाशित होते हैं। विगत वर्षों से सितम्बर महिने का अंक साहित्य की विविध विधाओं पर केंद्रित किया जा रहा है जिसमें राजस्थान के सृजनशील कर्मचारियों की रचनाशीलता को देखा जा सकता है।
शेष : त्रैमासिक पत्रिका के रूप में हसन जमाल ने इसे राजस्थान की सीमाओं से बाहर पाकिस्तान तक में लोकप्रिय बनाया है। वे इसे जोधपुर से विगत 16 वर्षों से प्रकाशित करा रहे हैं। इस पत्रिका में शोध-खोज के साथ विषय केंद्रित विशेषांक अपनी पूरी गरिमा और गंभीरता के साथ प्रकाशित किए गए हैं।
संबोधन- यह त्रैमासिक पत्रिका कमर मेवाड़ी के संपादन में कांकरोली (राजसमंद) से प्रकाशित हो रही है। पिछले 44 वर्षों से नियमित प्रकाशित हो रही इस लघु पत्रिका ने अनेक कीर्तिमान स्थापित किए हैं। इसके अनेक महत्त्वपूर्ण विशेषांकों को राजस्थान की हिंदी पत्रिकारित के क्षेत्र में उल्लेखनीय कहे जा सकते हैं। इसमें विविधतापूर्ण रचनाओं का प्रकाशन होता है। विविध विधाओं और स्थापित रचनाकारों के साथ नए लेखकों को स्थान मिलता रहा है। कुछ ऐसे भी विशेषांक आए है जिनका संपादन संपादन ने राजस्थान के बाहर के रचनाकारों को सौंप कर इस पत्रिका की गरिमा को बढ़ाया है।
संस्कृति-मीमांसा : इसमें चिंतनपरक सांस्कृतिक लेखों और टिप्पणियों के साथ ही सृजनात्मक पक्षों को भी यथोचित स्थान दिया जाता है। समान्तर संस्थान जयपुर से आलोचक राजाराम भादू ने इसे विचारोत्तेजक आलेख और संवाद की पत्रिका के रूप में लोकप्रिय बनाया है।
समय माजरा : यह मासिक प्रकाशन है जिसका प्रकाशान राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, हिन्दी भवन, जयपुर से होता है। यह विगत 17 वर्षों से प्रकाशित हो रही है। विचार, सृजन और जनसरोकारों की इस पत्रिका के संपादक ओम सैनी हैं। 
साहित्य समर्था- नीलिमा टिक्कू इस पत्रिका की संस्थापक और संपादिका हैं। वे एक रचनाकार के साथ-साथ स्पंदन महिला साहित्यिक संस्थान जयपुर की अध्यक्ष के रूप में भी सक्रिय हैं। विगत 6 वर्षों से प्रकाशित होने वाली इस त्रैमासिक पत्रिका के वरिष्ठ महिला रचनाकारों पर केंद्रित अंक चर्चा में रहे हैं। पद्मश्री सम्मान से सम्मानित लेखिका डॉ. सुनीता जैन के रचनाकर्म पर केंदित अंक अप्रैल-जून 2016 आदि साहित्य समाज में व्यापक चर्चा का विषय रहे हैं। इसके प्रत्येक अंक को विख्यात साहित्यकारों पर केंद्रित कर उनके अवदान पर चर्चा की जाती है।
सिम्पली जयपुर : इस पत्रिका में पुस्तक समीक्षा और साहित्यिक विषय पर आलेख के अतिरिक्त वर्तमान सरोकारों के साथ समय, समाज और राजनीति की चर्चा विशेष रहती है।
सुजस- सूचना एवं जनसंपर्क निदेशालय, राजस्थान जयपुर की इस पत्रिका को साहित्यिक नहीं कहा जा सकता किंतु जिस लकदक साज-सज्जा और रंग-रूप में यह प्रकाशित होती है वह उल्लेखनीय है। इसमें साहित्य, कला व संस्कृति के विविध घटकों को समाहित किया जाता है।
सृजन कुंज : विगत चार वर्षों से श्रीगंगानगर से पत्रकार और व्यंग्यकार कृष्णकुमार आशु इस पत्रिका का त्रैमासिक प्रकाशन कर रहे हैं। सृजन कुंज सीमित संसाधनों के उपरांत भी महत्त्वपूर्ण कार्य कर रहा है। इन दिनों इस पत्रिका का ‘महिला लेखन अंक’ चर्चा में है।
    कहना होगा कि हिन्दी भाषी व्यापक समाज में इन और ऐसी लघुपत्रिकाओं की आवश्यकता सदा बनी हुई है और आलोच्य पत्रिकाओं के साथ सैकडों छोटी-बडी पत्रिकाएँ यह दायित्व पूरा भी कर रही है। राजस्थान में अनेक पत्रिका प्रकाशित हुई, बंद हुई। कुछ का स्मरण यहां अपनी सीमाओं के कारण नहीं हो सका है उसके लिए लेखक खेद व्यक्त करता है। ऐसे छूटे हुए संपादक इसे अन्यथा नहीं लेंगे। जो पत्रिकाएं अपने संसाधनों से प्रकाशित हो रही हैं, वे निसंदेह सम्मान की अधिकारी हैं।
    वर्तमान में प्रतिलिपि, अपनी माटी, हस्ताक्षर आदि अनेक ई-पत्रिकाएं नई तकनीक से जुड़ते हुए इस कार्य में नई संभावनाओं के साथ सामने आ रही है। अनेक दैनिक समाचार पत्र नियमित रूप से अथवा साप्ताहिक रूप से साहित्य पर केंद्रित अपने परिशिष्टों से अनेक रचनाकारों को सक्रिय बनाए हुए हैं, वहीं साहित्यिक परिदृश्य को विकासित करने में दूरदर्शन और आकाशवाणी का भी सराहनीय योगदान है। यह आलेख राजस्थान की साहित्यिक पत्रकारिता का एक आइना भर है, इस विषय में अनेक तथ्यों और संभावनाओं को जोड़ा जाना शेष है। यह तो बस एक आगाज है, इसका अंजाम आपके सहयोग से ही होगा।
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लालित्य ललित की व्यंग्य-यात्रा - डॉ. नीरज दइया

     “किसी पर ऐसे मजाक कर जाना, जो किसी को चुभे भी नहीं और अपना काम भी कर जाए।” यह आत्मकथन हमें लालित्य ललित के पहले व्यंग्य संग्रह के लिए लिखे उनके आरंभिक बयान ‘मेरी व्यंग्य-यात्रा’ में मिलता है। उनके दोनों व्यंग्य संग्रह ‘जिंदगी तेरे नाम डार्लिंग’ (2015) और ‘विलायतीराम पांडेय’ (2017) इस आत्मकथन पर एकदम खरे उतरते हैं। यह कथन उनकी इस यात्रा की संभवानाओं और सीमाओं का भी निर्धारण करने वाला है। यहां यह भी उल्लेख आवश्यक है कि दोनों व्यंग्य संग्रह की भूमिका प्रख्यात व्यंग्यकार प्रेम जनमेजय ने लिखी है। जनमेजय ने प्रशंसात्मक लिखते हुए अंत में रहस्य उजागर कर दिया कि वे नए व्यंग्यकार लालित्य ललित के प्रथम व्यंग्य संग्रह का नई दुल्हन जैसा स्वागत कर रहे हैं। ‘उसकी मुंह-दिखाई की, चाहे कितनी भी काली हो, प्रशंसा के रूप में शगुन दिया और मुठभेड़ भविष्य के लिए छोड़ दी। ललित यदि इस प्रशंसा से कुछ अधिक फूल गए तो यह उनके साहित्यिक स्वास्थ्य के लिए खतरनाक होगा।’ जाहिर है कि अब मुठभेड़ होनी है और यह भी देखा जाना है कि उनका साहित्यिक स्वास्थ्य फिलहाल कैसा है क्यों कि उनका दूसरा व्यंग्य संग्रह भी आ चुका। दूसरे संग्रह ‘विलायतीराम पांडेय’ में भूमिका लिखते हुए प्रेम जनमेजय ने ‘दिवाली का सन्नाटा’ व्यंग्य रचना को लालित्य ललित की अब तक की रचनाओं में सर्वश्रेष्ठ कहा है। पहले व्यंग्य संग्रह को अनेक आरक्षण दिए जाने के उपरांत दूसरा संकलन जिस कठोरता और किंतु-परंतु के साथ परखे जाने की कसौटी के साथ ही आलोचना के विषय में भी अनेक संभावनाएं और सीमाओं का उल्लेख करते हुए मेरा काम आसान कर दिया है। साथ ही व्यंग्यकार लालित्य ललित ने अपने बयान में अपने व्यंग्यकार के विकसित होने में अनेक व्यंग्य लेखकों का स्मरण और आभार ज्ञाप्ति करते हुए पूरी प्रक्रिया को स्पष्ट करने का प्रयास किया है। वहीं पहले संग्रज के फ्लैप पर ज्ञान चतुर्वेदी, यज्ञ शर्मा, डॉ. गिरिजाशरण अग्रवाल, सुभाष चंदर, हरीश नवल और गौतम सान्याल की टिप्पणियों को देख कर बिना व्यंग्य रचनाएं पढ़े ही लालित्य ललित को महान व्यंग्यकार कहने का मन करता है।
    मन को नियंत्रण में लेते हुए दोनों पुस्तकों में संग्रहित 66 व्यंग्य रचनाओं का गंभीरता से पाठ आवश्यक लगता है। यह गणित का आंकड़ा इसलिए भी जरूरी है कि दोनों व्यंग्य संग्रह में रचनाएं का जोड़ 67 हैं पर एक व्यंग्य ‘पांडेजी की जलेबियां’ दोनों व्यंग्य संग्रहों में शामिल है। यहां यह कहना भी उचित होगा कि इन दोनों व्यंग्य संग्रह में लालित्य ललित ने व्यंग्य के नाम पर कुछ जलेबियां पेश की है। वैसे भी व्यक्तिगत जीवन में आप स्वाद के दीवाने हैं और संग्रह के अनेक व्यंग्य आपके इसी स्वाद के रहते जरा स्वादिष्ठ हो गए हैं। जाहिर है कि आपकी इन जलेबियों में आपके अपने निजी स्वाद की रंगत और कलाकारी है जो आपको अन्य व्यंग्यकारों से अलग सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है। कलाकारी इस अर्थ में कि लालित्य ललित कवि के रूप में जाने जाते हैं और संख्यात्मक रूप से भी आपकी कविताओं की किताबों का कुल जमा आंकड़ा डराने वाला है। अपनी धुन के धनी ललित का 32 वां कविता संग्रह "कभी सोचता हूं कि" आ रहा है। ऐसे में बिना पढ़े-सुने उन्हें कवि-व्यंग्यकार मानने वाले बहुत है तो जाहिर है उनके व्यंग्यकार की पड़ताल होनी चाहिए जिससे वास्तविक सत्य उजागर हो सके। उनके कवि की बात फिर कभी फिलहाल व्यंग्यकार की बात करे तो गद्य को कवियों का निकष कह गया है। निबंध गद्य का निकष कहा जाता है, इसमें व्यंग्य को भी समाहित ही नहीं विशेष माना जाना चाहिए। अस्तु कवि-कर्म को कसौटी व्यंग्य भी है।
    लालित्य ललित के व्यंग्य की तुलना किसी अन्य व्यंग्यकार ने इसलिए नहीं की जा सकती कि उन्होंने स्वयं की एक शैली विकसित करने का प्रयास किया है। उनके व्यंग्य किसी अन्य व्यंग्यकार या हिंदी व्यंग्य की मुख्य धारा से अलग अपने ही तरह के व्यंग्य लेखन का परिणाम है। उनकी यह मौलिकता उनकी निजता भी है जो उन्हीं के आत्मकथन मजाक करने में उनकी अपनी सावधानी कि किसी को चुभे नहीं और अपना काम कर जाए की कसौटी के परिवृत में समाहित है। उनकी रचनाओं का औसत आकार लघु है और कहना चाहिए कि आम तौर पर दैनिक समाचार पत्रों को संतुष्ट करने वाला है। जहां उन्होंने इस लघुता का परित्याग किया है वे अपने पूरे सामर्थ्य के साथ उजागर हुए हैं। साथ ही यह भी कि वे व्यंग्यकार के रूप में भी अनेक स्थलों पर अपने कवि रूप को त्याग नहीं पाए हैं। सौंदर्य पर मुग्ध होने के भाव में उनकी चुटकी या पंच जिसे उन्होंने मजाक संज्ञा के रूप चिह्नित किया है चुभे नहीं की अभिलाषा पूरित करता है।
    व्यंग्य का मूल भाव ‘दिवाली का सन्नाटा’ में इसलिए प्रखरता पर है कि उन्होंने करुणा और त्रासदी को वहां चिह्नित किया है। इस व्यंग्य के आरंभ में पैर और चादर का खेल भाषा में खेलते हुए वे चुभते भी है और अपना काम भी करते हैं। मूल बात यह है कि उनका यह चुभना अखरने वाला नहीं है। उनकी व्यंग्य-यात्रा में कुछ ऐसे भी व्यंग्य हैं जहां उनका नहीं चुभना ध्यनाकर्षक का विषय नहीं बनता है। यहां यह भी कहना आवश्यक है कि इसी व्यंग्य का बहुत मिलता जुलता प्रारूप इसी संग्रह में संकलित अन्य व्यंग्य ‘महंगाई की दौड़ में पांडेयजी’ में देखा जा सकता है। जाहिर है मेरी यह बात चुभने वाली हो सकती है पर अगर इसने अपना काम किया तो आगामी संग्रहों में ऐसा कहने का अवसर किसी को नहीं मिलेगा। सवाल यहां यह भी उभरता है कि विलायतीराम पांडेय ने क्या सच में अपने परिवार की खुशी के लिए किडनी का सौदा कर लिया है। यह हो सकता है कहीं हुआ भी हो किंतु यहां मूल भाव ऐसा किया जाने में जो करुणा है वह रेखांकित किए जाने योग्य है। आधुनिक जीवन में घर-परिवार और बच्चों की फरमाइशों के बीच पति और पिता का किरदार निभाने वाला जीव किस कदर उलझा हुआ है। लालित्य ललित की विशेषता यह है कि वे इस पिता और खासकर पति नामक जीव की पूरी ज्यामिति वर्तमान संदर्भों-स्थितियों में उकेरने की कोशिश करते हैं।
    उनका मुख्य पात्र विलायतीराम पांडेय दोनों संग्रहों में सक्रिय है और दूसरे में तो वह पूरी तरह छाया हुआ है। धीरे धीरे उसकी पूरी जन्म कुंडली हमारे सामने आ जाती है। नाम- विलायतीराम पांडेय, पिता का नाम- बटेशरनाथ पांडेय, माता का नाम- चमेली देवी, पत्नी- राम प्यारी यानी दुलारी और दोस्त- अशर्फीलाल जैसे कुछ स्थाई संदर्भ व्यंग्यकार ने अपने नाम करते हुए विगत चार-पांच वर्षों का देश और दुनिया का एक इतिहास इनके द्वारा हमारे समाने रखने का प्रयास किया है। यहां दिल्ली और महानगरों में परिवर्तित जीवन की रंग-बिरंगी अनेक झांकियां है तो उनके सुख-दुख के साथ त्रासदियों का वर्णन भी है। पति-पत्नी की नोक-झोंक और प्रेम के किस्सों के साथ एक संदेश और शिक्षा का अनकहा भाव भी समाहित है। कहना होगा कि लालित्य ललित मजाक मजाक में अपना काम भी कर जाते हैं। यहां व्यंग्य का मूल केवल कुछ पंक्तियों में निहित नहीं है, वरन व्यंग्य का वितान जीवन के इर्द-गिर्द दिखाई देता है। स्वार्थी और मोल-भाव करने वाले प्राणियों के बीच इन रचनाओं का नायक विलायतीराम पांडेय कहीं-कहीं खुद व्यंग्यकार लालित्य ललित नजर आता है तो कहीं-कहीं उनके रंग रूप में पाठक भी स्वयं को अपने चेहरों को समाहित देख सकते हैं। आज का युवा वर्ग इन रचनाओं में विद्यमान है। उसके सोच और समझ को व्याख्यायित करते हुए एक बेहतर देश और समाज का सपना इनमें निहित है।
    यहां लालित्य ललित की अब तक की व्यंग्य-यात्रा के सभी व्यंग्यों की चर्चा संभव नहीं है फिर भी उनके दोनों संग्रहों से कुछ पंक्तियां इस आश्य के साथ प्रस्तुत होनी चाहिए कि जिनसे उनके व्यंग्यकार का मूल भाव प्रगट हो सके। पहले व्यंग्य संग्रह से कुछ उदाहरण देखें- ‘आप भारतीय हैं यदि सही मायनों में, तो पड़ोसी से जलन करना, खुन्नस निकालना आपका जन्मसिद्ध अधिकार है।’ (पृष्ठ-15); ‘जमाना चतुर सुजानों का है। मक्खन-मलाई का है, हां-जी, हां-जी का है, अगर आप यह टेक्नीक नहीं सीखोगे तो मात खा जाओगे, दुनियादारी से पिछड़ जाओगे।’ (पृष्ठ-20); ‘मगर यह बॉस किसिम के जीव जरा घाघ प्रजाति के होते हैं, जो न आपके सगे होते हैं और संबंधी तो बिल्कुल नहीं।’ (पृष्ठ-29); ‘सांसारिक लोगों का हाजमा होता ही कमजोर है।’ (पृष्ठ-37); ‘इन दिनों बड़ा लेखक छोटे को कुछ नहीं समझता तो छोटा लेखक बड़े को बड़ा नहीं समझता, हिसाब-किताब बराबर।’ (पृष्ठ-52); ‘जो लेते हैं मौका, वही माते हैं चौका।’ (पृष्ठ-58); ‘यह हिंदुस्तान है, यहां कुछ भी हो सकता है। अंधे का ड्राइविंग लाइसेंस बन सकता है। मृत को जीवित बनाया जा सकता है।’ (पृष्ठ-65);  ‘यही तो भारतीय परंपरा है- हम एक बार किसी से कुछ उधार लेते हैं तो देते नहीं।’ (पृष्ठ-92) आदि
    कुछ उदाहरण दूसरे व्यंग्य संग्रह से- ‘विलायतीराम पांडेय ने सोचा पल्ले पैसा हो तो साहित्यकार क्या, मंच क्या, अखबार क्या कुछ भी मैनेज किया जा सकता है।’ (पृष्ठ-21); ‘घूस देना आज राष्ट्रीय पर्व बन चुका है। अपने दी, आपकी फाइल चल पड़ी और नहीं दी तो आपका काम अटक गया, भले ही आप कितने बड़े तोपची हों।’ (पृष्ठ-24); ‘एक वो जमान था, एक अब जमाना है। बच्चे पहले तो सुन लेते थे, पर अब लगता है जैसे हम भैंक रहे हैं और वह अनसुना करने में यकीन करते हैं।’ (पृष्ठ-28); ‘कामवाली बाई भी वाट्सअप पर बता देती है, आज माथा गर्म है, मेमसाब, नहीं आ पाऊंगी, वेशक पगार काट लेना। (पृष्ठ-30); ‘बाजार में नोटबंदी के चलते कर्फ्यू-सा माहौल था।’ (पृष्ठ-38); ‘अब देश के नेता बाढ़ में जाने के बजाय अपना दुःख ट्विटर पर व्यक्त कर देते हैं।  (पृष्ठ-66); ‘मंदी ने बजाया आज सभी का बाजा, लेकिन राजनेताओं का कभी नहीं बजता बाजा, पता नहीं वो दिन कब आएगा।’ (पृष्ठ-80); ‘नंगापन क्या समाज के लिए अनिवार्य योग्यताओं में शामिल एक महत्त्वपूर्ण कड़ी है। कितने पोर्न पसंदीदा हो गए हम।’ (पृष्ठ-92); आदि उदाहरणो से जाहिर है कि उनके यहां विषय की विविधा के साथ समसामयिक स्थितियों से गहरी मुठभेड भी है। वे साहित्य और समाज के पतन पर चिंतित दिखाई देते हैं और साथ ही जनमानस की बदलती प्रवृतियों और लोक व्यवहार को रेखांकित करते हुए कुछ ऐसे संकेत छोड़ते हैं जिन्हें पाठकों को पकड़ना है। वे अपनी बात पर कायम है कि उनका कोई भी मजाक हिंसक नहीं है वरन वे अहिंसा के साथ उस रोग और प्रवृत्ति को स्वचिंतन से बदलने का मार्ग दिखलाते हैं।
    लालित्य ललित के पास गद्य का एक कौशल है जिसके रहते वे किसी उद्घोषक की भांति अपनी बात कहते हुए आधुनिक शव्दावली में अपने आस-पास के बिम्ब-विधान के साथ नए रूपकों को निर्धारित करने का प्रयास करते हैं। काफी जगहों पर हम व्यंग्य में कवि के रूप में ‘यमक’ और ‘श्लेष’ अलंकारों पर उनका मोह भी देख सकते हैं। एक उदाहरण देखें- ‘बॉस यदि शक्की है तो आपको ‘ऐश’ हो सकती है, बच्चन वाली ‘ऐश’ नहीं। नहीं तो अभिषेक की ठुकाई के पात्र बन सकते हैं।’ (‘जिंदगी तेरे नाम डार्लिंग’, पृष्ठ-35) वे व्यक्तिगत जीवन में खाने और जायकों के शौकीन हैं तो उनके व्यंग्य में ऐसे अनेक स्थल हैं जहां उनकी इस रुचि के रहते हमें मजेदार परांठों और पकौड़ों के बहुत स्वादिष्ट अनुभव ज्ञात होते हैं। नमकीन और मिठाई पर उनकी मेहरबानी कुछ अधिक मात्रा में है कि वे अपनी पूरी बिरादरी का आकलन भी प्रस्तुत करते हैं- ‘शुगर के मरीज लेखक लगभग अस्सी पर्सेंट हैं पर मुफ्त की मिठाई खाने में परहेज कैसा!’ (‘विलायतीराम पांडेय’, पृष्ठ-16)
    विलायतीराम पांडेय उनके लिए सम्मानित पार है और वे उसे यत्र-तत्र ‘नत्थू’ बनने की प्रविधियों में बचाते भी हैं। भारतीय पतियों और पत्नियों के संबंधों में मधुता होनी चाहिए इस तथ्य की पूर्ण पैरवी करते हुए भी पतियों और पत्नियों की कुछ कमजोरियों को भी वे बेबाकी के साथ उजागर भी करते हैं। जैसे संग्रह ‘जिंदगी तेरे नाम डार्लिंग’ के दो उदाहरण देखिए- ‘अधिकतर मर्द जिनकी प्रायः बोलती घरों में बंद रहती है, यहां नाई की दुकान पर उनकी जबान कैंची की तरह चलती है।’ (पृष्ठ-78); ‘शादी-शुदा है यानी तमान बोझों से लदा-फदा एक ऐसा आदमी, जिसकी न घर में जरूरत है और न समाज में।’ (पृष्ठ-24) दूसरे संग्रह ‘विलायतीराम पांडेय’ से- ‘जिंदगी में क्या और किस तरह एक पति को पापड़ बेलने पड़ते हैं यह पति ही जानता है, जो दिन रात खटता है।’ (पृष्ठ-59); ‘हे भारतीय पुरुष ! तू केवल खर्चा करने को पैदा हुआ है। खूब कमा, पत्नियों पर खर्चा कर। बच्चों के लिए ए.टी.एम. बन।’ (पृष्ठ-74); ‘हद है यार, महिला दिखी नहीं कि छिपी हुई सेवा-भावना हर पुरुष की उजागर हो जाती है।’ (पृष्ठ-101)
    लालित्य ललित के व्यंग्यों में प्रतुक्त अनेक उपमाएं रेखांकित किए जाने योग्य है। वे परंपरागत उपमानों के स्थान पर नए और ताजे उपमान प्रयुक्त करते देखे जा सकते हैं। यह नवीनता बाजार की बदलती भाषा और रुचियों से पोषित है। वे एक ऐसे युवा चितेरे हैं जिन्हें अपनी परंपरा से गुरेज नहीं है तो साथ ही अतिआधुनिक समाज की बदलती रुचियों और लोक व्यवहार से अरुचि भी नहीं है। हलांकी वे कुछ ऐसे शब्दों को भी व्यंग्य में ले आते हैं जिनसे आमतौर पर अन्य व्यंग्यकार परहेज किया करते हैं अथवा कहें बचा करते हैं। ‘मेरा भारत महान, जहां मन हो थकने का और जहां मन हो मूतने का,कही कोई रूकावट नहीं है।’ (‘जिंदगी तेरे नाम डार्लिंग’, पृष्ठ-55) ये अति आवश्यक और सहज मानवीय क्रियाएं हैं। सभी का सरोकार भी रहता है फिर भी उनके यहां शब्दों की मर्यादा है और वे संकेतों में बात कहने में भी सक्षम है- ‘हम भारतीय इतने प्यारे हैं कि अपने शाब्दिक उच्चारण से किसी का भी बी.पी. यानी रक्तचाप तीव्र कर सकते हैं या आपकी चीनी घटा सकते हैं।’ (‘जिंदगी तेरे नाम डार्लिंग’, पृष्ठ-17);
    अंत में यह उल्लेखनीय है कि लालित्य ललित के व्यंग्य अपनी समग्रता और एकाग्रता में जो प्रभाव रचते हैं, वह प्रभावशाली है। ऐसा भी कहा जा सकता है कि वे संभवतः पृथक-पृथक अपनी व्यंजनाओं से हमें बेशक उतना प्रभावित नहीं करते भी हो किंतु धैर्यपूर्वक पाठ और उनकी सामूहिक उपस्थिति निसंदेह एक यादगार बनकर दूर तक हमारे साथ चलने वाली है। विविध जीवन स्थितियों से हसंते-हसंते मुठभेड करने वाला उन्होंने अपना एक स्थाई और यादगार पात्र रचा है। अब आप ही बताएं कि हिंदी व्यंग्य साहित्य की बात हो तो कोई भला विलायतीराम पांडेय को कैसे भूल सकता है।
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असंवेदनशील बयानों के बीच उलझती फिल्म / डॉ. नीरज दइया

 
कला के भीतर सतत साधना की मांग अंतर्निहित है। अन्य कला माध्यमों में अपेक्षाकृत सिनेमा के सर्वाधिक लोकप्रिय होने का श्रेय अथवा आधार सामूहिक रचनात्मक कहा जा सकता है। प्रत्येक कला माध्यम की अपने समाज के प्रति जबाबदेही होती है और होनी भी चाहिए। ऐसे में सिनेमा जैसे माध्यम में यह जिम्मेदारी और जबाबदेही सामूहिक है। संभवतः फिल्म ‘पद्मावती’ के निर्माण से जुड़े कलाकार दीपिका पादुकोण, शाहिद कपूर, रणवीर सिंह और निर्माता-निर्देशक इसलिए सामूहिक रूप से विवादों के घेरे में हैं। दोष किसी एक का नहीं फिर भी इसके सूत्रधार निर्देशन संजय लीला भंसाली हैं जिन्होंने फिल्म की पटकथा लिखी और साथ ही प्रकाश कपाड़िया जिनका नाम भी लेखक के रूप में दिया गया है। इस पूरे विवाद के बाद ताजा स्थिति में संजय लीला भंसाली का जबाब चर्चा में है- “फिल्म को लेकर सारा विवाद अफवाहों पर आधारित है। मैंने तथ्यों के साथ छेड़छाड़ नहीं किया है। फिल्म मलिक मुहम्मद जायसी के काव्य पर आधारित है।” यह उनका खुद को और फिल्म को बचने का एक संकट-द्वार है जिससे उम्मीद है कि वे इस प्रयास में बच सकते हैं। यदि मान भी लिया जाए कि इस फिल्म का आधार यह कृति है तो अब यह देखना होगा कि इनमें कितना साम्य है और कितने कहां बदलाव किए गए हैं। यह शोध-खोज का विषय है पर इतना जरूर है कि लोक विश्वास और ऐतिहासिक सत्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश करना जनभावनाओं को आहत कर सकता है। बिना पर्याप्त तथ्यों के काल्पनिक अथवा सपने में ऐसा कुछ दिखाया जाना मनोवैज्ञानिक आधार एवं गहरी सूझ-बूझ की अपेक्षा तो रखता ही है।
    वैसे सत्य यह भी है कि आज स्त्री-पुरुष समानता की बातें करने वाले हमारे भारतीय समाज में राजस्थान का भी अपना एक अध्यय रहा है जिसमें स्त्री को पर्दों में रखा जाता था। यहां तक कि उसे पैर की जूती के बाराबर दर्जा दिया हुआ था। स्त्री-चेतना और अस्मिता की बात करें तो हमारे समक्ष प्राचीनतम उदाहरण कन्नड़ कवयित्री अक्क महादेवी और उसके बाद मध्यकालीन समय में मीरा है। इन संदर्भों और यात्रा के बीच एक अध्याय और सुनहरा पन्ना अपनी अस्मिता के लिए रानी पद्मिनी ने जौहर की आग में कूद कर रचा। अपनी आन-बान और शान पर आंच नहीं आने देना का यह अनुपम उदाहरण है। कहना होगा कि यह स्त्री जाति का प्रवल प्रतिरोध है कि उनका प्राणोत्सर्ग गरिमामय है। नारी जाति और रानी पद्मिनी के प्रति जनता में यह सम्मान है कि संजय लीला भंसाली की फिल्म-प्रोमो देखकर वे उसके तामझाम और चकाचौंध में नहीं उलझे। रानी पद्मावती के प्रति इसे उनकी श्रद्धा और सम्मान माना जाना चाहिए कि वे न्याय के लिए वगावत पर आमादा हुए।
    एक दूसरा पक्ष यह भी ध्यान दिए जाने योग्य है कि फिल्म को सेंसर बोर्ड से पास होने पहले चयनित दर्शकों को दिखाना अनुचित है। माना कि फिल्म के विरोधियों को फिल्म के बारे में पर्याप्त और पूरी जानकारी नहीं है। उन्हें नहीं पता कि ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ हुई है या यह उनका भ्रम है। भीड़ और विरोधी शोर में शामिल जनता की अपेक्षाएं भी अनुचित हो सकती है। कहा जा रहा है कि इतिहासकारों और प्रचलित कहानियों के अनुसार पद्मिनी की कहानी में गोरा-बादल प्रमुख चरित्र है, जिन्होंने राणा रतन सिंह की मदद की थी। इस विषय पर प्रसिद्ध कथाकार यादवेंद्र शर्मा ‘चंद्र’ की ‘गौरा-बादल’ पुस्तिका और पं. नरेन्द्र मिश्र की कविता बेहद लोकप्रिय है। वहीं पद्मावती की कहानी और संदर्भ ‘भारत एक खोज’ (जवाहर लाल नेहरू) में भी आता है। जिसे पर्दे पर दिखाया भी जा चुका है। उनमें कहीं विवाद नहीं हुआ तो फिर ऐसा इस फिल्म में क्या है जिस पर इतना विवाद हो रहा है। रानी पद्मिनी (पद्मावती) विषय लोक आस्था यह है कि चित्तौड़ की औरतों से दो विकल्पं से जौहर को चुना। उन्हें विजयी सेना के समक्ष अपमानित होने को अस्वीकार किया। सभी महिलाओं की एक राय पर विशाल चिता सजाई गई और रानी पद्मिनी के बाद सारी औरतें धधकती अग्नि में स्वाभिमान के लिए कूद गईं और दुश्मन बाहर खड़े देखते रह गए। इस अविस्मरणीय जौहर का गौरव लोकगीतों और कथाओं में आज भी जीवित है।   
    अगर फिल्म कवि जायसी के प्रेमकाव्य पर आधारित है तो यह जानकारी अनिवार्य है कि यह एक लोकप्रिय कृति है जो अनेक विश्वविद्यालयों के हिंदी पाठ्यक्रमों में वर्षों से पढ़ाई जा रही है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल, विजयदेव नारायण साही सहित अनेक आलोचकों-रचनाकारों ने इस के संबंध में बहुत कुछ लिखा और कहा है। रानी पद्मिनी के जौहर की अमरगाथा से संबंधित अनेक तथ्य और प्रमाण राजस्थान के इतिहास में विभिन्न इतिहासकारों ने अभिव्यक्त किए हैं। ‘त्रिवेणी’ की भूमिका में आचार्य शुक्ल ने लिखा हैं- “जायसी का क्षेत्र तुलसी की अपेक्षा परिमित है, पर प्रेमवेदना अत्यंत गूढ़ है।” तो साही ने तो जायसी को हिंदी का पहला विधिवत कवि कह कर अपनी पुस्तक ‘जायसी’ में सम्मानित-चर्चित किया है। इस कृति में इतिहास और कल्पना का मणिकंचन योग स्वीकारा गया है। मूल कृति ‘पद्मावत’ में चित्तौड़ के राजा रत्नसेन और सिंहलद्वीप की राजकुमारी पद्मावती की प्रेमकथा है, जो सूफी मसनवी शैली में 57 खंडों में अभिव्यक्त हुई है। इसके पूर्वाद्ध को कल्पना और उत्तरार्द्ध को ऐतिहासिक आधार से युक्त स्वीकारा गया है। ‘पद्मावत’ महाकाव्य में रहस्यवाद और आध्यात्मिक रंग और संदर्भों की अपनी कहानियां हैं जिनको जाने-समझे बिना संजय लीला भंसली द्वारा दिया गया बयान संभवतः बहुत दूर तक नहीं चलेगा।
    गौर किए जाने वाली बात यह है कि किसी भी श्रव्य-माध्यम की रचना को जब दृश्य-श्रव्य-माध्यम में रूपांतरित करते हैं तो अनेक समस्याएं आती है। यदि मलिक मुहम्मद जायसी के इस काव्य पर आधारित यह फिल्म बनानी होती तो इसमें अनेक घटनाओं, तथ्यों और विवरणों के साथ देश-काल की सम्यक जानकारी आवश्यक थी। यह विवाद थमने वाला नहीं है क्यों कि श्री राजपूत करणी सेना के संरक्षक और संस्थापक लोकेंद्र सिंह काल्वी ने कहा था- “हम किसी भी कीमत पर फिल्म में विकृत तथ्यों को दिखाए जाने की अनुमति नहीं देंगे और यह सुनिश्चित करेंगे कि फिल्म भारत के आधे हिस्से में प्रदर्शित ना हो सके।” अब इस मुद्दे पर राज्य सरकार कानून और व्यवस्था की दुहाई पर सक्रिय हुई है। कोर्ट ने किसी भी प्रकार के फैसले को पहले देने से इंकार कर दिया है। ऐसी स्थिति में अभिनेत्री रवीना टंडन का अपना मत है कि ‘पद्मावती’ विवाद केवल राजनीतिक ड्रामा है और इलेक्शन खत्म होते ही सब ठीक हो जाएगा। वहीं इस फिल्म की अभिनेत्री दीपिका पादुकोण जो रानी पद्मिनी या चित्तौड़ की पद्मावती का किरदार निभा रही हैं का कहना ठीक लगता है कि बिना फिल्म देखे ही विरोध अनुचित है। कलाकारों से विरोध की प्रराकाष्ठा यह है कि उन्हें जान से मारने की धमकियां दी जा रही है और करणी सेना ने तो पादुकोण को यह धमकी दी है कि रामायण में जिस तरह शूर्पणखा की नाक काट दी गई थी, करणी सैनिक उसी तरह उनकी भी नाक काट सकते हैं। लोकतांत्रिक देश में ऐसा गर्व प्रदर्शन भी बेहद चिंताजनक और असंवेदनशील है। यहां संजय लीला भंसाली से यह भी कहना है कि अगर फिल्म जायसी के काव्य पर आधारित है तो इसका श्रेय और नाम क्यों नहीं दिया गया। ऐसी स्थिति में यह एक पटकथा लेखक और निर्देशक की असंवेदनशीलता कही जाएगी।
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नम्बर वन आऊंला (राजस्थानी बाल कविताएं)

 कवि : पवन पहाड़िया, प्रकाशक- नेम प्रकासण ग्रा.पो. डेह (नागौर) राज. 341022, पृष्ठ : 52 मूल्य : 100/- संस्करण : 2014   
   
    राजस्थानी भाषा और साहित्य के लिए विगत तीन दशकों से सक्रिय पवन पहाड़िया की पहचान एक कवि और राजस्थानी भाषा मान्यता हेतु संघर्षशील रचनाकार के रूप में है। अपनी मातृभाषा के लिए ऐसे अनेक रचनाकारों की अपनी निष्ठाएं और आस्थाएं हैं, जिनके रहते वे अनेक मोर्चों पर स्वयं खड़े होने के लिए विवश हैं। पवन पहाड़िया भी एक कवि-लेखक के साथ-साथ जनचेतना और साहित्य के प्रचार-प्रसार-प्रकाशन हेतु सक्रिय है। इसके अतिरिक्त वे राजस्थानी भाषा के नए रचनाकारों को प्रेरित और प्रोत्साहित करने के लिए भी पहचाने जाते हैं। उन्होंने अनेक भामाशाहों को प्रेरित कर साहित्य पुरस्कार आरंभ किए हैं।
     ‘नम्बर वन आऊंला’ संग्रह पर पवन पहाड़िया को साहित्य अकादेमी का बाल साहित्य पुरस्कार (राजस्थानी) वर्ष 2017 का अर्पित किया गया है। यह बाल कविताओं का संग्रह उन्होंने प्रख्यात राजस्थानी साहित्यकार बी.एल. माली की प्रेरणा से लिखा है और यह संग्रह उन्हें ही समर्पित किया गया है। इस संग्रह की भूमिका में कविताओं में वर्णित विषयों और भावबोध का खुलासा करते हुए आलोचक डॉ. गजेसिंह राजपुरोहित लिखते हैं- ‘‘एक अबोध बाल का मन सदैव आगै बढ़ने की चाहत रखता है। यही चाहत उसे सदैव सफलता के शिखर तक ले जाती है। उसी चाहत को कवि अपनी रचनाओ- नम्बर वन आऊंला के मार्फत बालकों में जाग्रत करता है। चेतना को ललकारता है कि वह किसी से कम नहीं है, वह सदा सत्य के मार्ग चलते हुए एक नया इतिहास रचेगा। यही चाहना ही उसे सफलता दिलाती है, सर्वश्रेष्ठ बनाती है।’’
    आरंभ में अपनी बात ‘मेरा दर्द’ शीर्षक से व्यक्त करते हुए कवि पवन पहाड़िया लिखते हैं- “नई पीढ़ी से मेरा आग्रह है कि वे चाहे अंग्रेजी में पढ़े-लिखें या हिंदी में पर घर में अपनी मातृभाषा को काम में लेंवे।” घर-परिवार और समाज में भाषा को संस्कार बनाएं रखने और जाग्रत करने के प्रमुख धेय से ही कवि ने इस संग्रह की 41 कविताएं लिखी है। पुस्तक की पहली कविता वंदना के रूप में करतार से अरदास है तो दूसरी बाल कविता ‘तिंरंगो’ में देश-भक्ति की भावना उजागर होती है। संग्रह में बालकों के आत्मीय और निजी संबंधों यथा मां, बहन आदि के महत्त्व को भी उजागर किया गया है। कवि कविताओं में श्रम के महत्त्व को प्रतिपादित करते हुए संदेश भी देता है कि पढ़ने-लिखने के साथ-साथ खेलना-कूदना भी जीवन में उतना ही आवश्यक और अनिवार्य है। शिक्षा और चरित्र निर्माण की भावना इन कविताओं में प्रमुखता से उभर कर सामने आती हैं।
    संग्रह की अनेक कविताएं प्रेरणादायी है जिनमें बालकों से पानी के महत्त्व और वृक्षारोपण जैसे अनेक मुद्दों पर सीधा संवाद है। कवि मौसम की बात करते हुए गर्मी, सर्दी और वर्षा के मौसमों के विविध रंगों को कविताओं में शब्दबद्ध कर अनेक बिंब रखते हुए सुंदर चित्रों को जैसे चित्रित करते हुए बालकों को समोहित करता है। कविताओं में बालकों को प्रिय लागने वाली तितलियों और बिल्लियों की दुनिया के साथ अन्य पशुओं-पक्षियों को भी वर्णित विषय बनाया गया है। इन कविताओं से बालकों में भारतीय त्यौहारों का हर्ष-उल्लास एक झलक के रूप में प्रस्तुत होता है। होली, दीपावली, अक्षय तृतीया और मकर सक्रांति जैसे पर्वों के माध्यम से बालकों को संस्कारित करने का प्रयास भी हुआ है।
    संग्रह की शीर्षक कविता में राजस्थान सरकार द्वारा प्रतिभावान विद्यार्थियों को ‘लेपटोप’ दिए जाने को केंद्र में रखते हुए उन्हें प्रेरित करने हेतु एक बाल मन के उद्गार कवि ने लयबद्ध अभिव्यक्त किए हैं। मूल कविता की आरंभिक पंक्तियां हैं- ‘लेपटोप घर में ल्याऊंला / मां म्हैं नंबर वन आऊंला / बैगो दिनगै म्हनै उठाज्यै,/ दांतण करियां पाठ पढ़ाज्यै।’ बच्चों के द्वारा बच्चों को संदेश देना अधिक प्रेरक और प्रभावशाली है।
    बाल साहित्य के लिए कवि पवन पहाड़िया का सक्रिय होना सुखद है पर भाषिक संरचनागत कुछ बातों का भी यहां विशेष ध्यान रखा जाना आवश्यक है। बालक जो भाषा सीख रहा है उसके समक्ष भाषा की अनेक चुनौतियां भी होती है। उदाहरण के लिए पुस्तक के आवरण पृष्ठ पर ‘नम्बर’ लिखा गया है जबकि संग्रह में कविता के शीर्षक में ‘नंबर’ शब्द प्रयुक्त हुआ है। पंचमाक्षर का यह रूपभेद समरूपता की मांग यहां रखता है। कविताओं के साथ प्रयुक्त चित्रों को केवल कंप्यूटर के भरोसे नहीं छोड़ते हुए किसी कलाकार के माध्यम से अधिक मेहनत के साथ प्रस्तुत किए जाने की संभवाना बनी हुई है। ऐसी कुछ बातों के बावजूद यह संग्रह अपनी सरलता, सहजता, गेयता के कारण मनोहक और प्रभावशाली है। कवि को बाल मनोविज्ञान की गहरी समझ और भाषा की गहरी सूझ-बूझ है। उनके छंद-ज्ञान से संग्रह की इन बाल कविताओं को बल मिला है। 

     डॉ. नीरज दइया

08 दिसंबर, 2017

खर, दूषण का भाई प्रदूषण

सच में मैं ड्रामा नहीं कर रहा। मेरी आंखें जल रही है। देखिए जलते जलते लाल हो गई है। मैं सांस नहीं ले पा रहा हूं पॉल्यूशन मास्क पहन लिया है फिर भी मुझे तकलीफ हो रही है। पूरा शरीर ढक कर रखता हूं सन स्ट्रोक से मुझे खतरा है। सन रेज आजकल कितनी खतरनाक है कि स्किन का सत्यानाश हो जाता है। कुछ लोग समझते हैं यह फैशन है। कुछ भी समझे मेरी बला से, मुझे क्या फर्क पड़ता है। पानी भी साथ लेकर चलता हूं। बाहर का पानी नहीं पी सकते। मिनरल वाटर की कंपनियां भी ऐसी है कि हम कोई भरोसा नहीं कर सकते हैं। सुबह सुबह ही उबाल कर दो-तीन बोलत भर लेता हूं। मजबूरी है कि बाहर निकलना पड़ता है। नहीं तो घर से सेफ जगह भला कौनसी है। बाहर निकलते ही पहला डर तो यही कि कोई किडनेप ना कर ले। गली गली में चोर उच्चके घूमते हैं। किसी का क्या भरोसा कि क्या कुछ कर जाए। बड़ा संभल कर रहना पड़ता है। जनाब यह जिंदगी की खर खर है। जीवन की गाड़ी कभी भी जबाब दे सकती है। इसका कोई भरोसा नहीं। ऐसी जिंदगी से मौत भली यह जिंदगी नहीं है। छोड़ो यह सब, इतनी सावधानियों की जरूरत ही नहीं है। अरे भैया, जिंदगी हंसने-गाने का नाम है।
इन सब स्थितियों को देखते हुए हंसते-गाते हुए हमने भारत को स्वच्छ करने का प्रयास जोर-शोर से आरंभ कर दिया हैं। भगवान श्री राम ने खर और दूषण का वध किया था और हम सब को मिलकर उनके बड़े भाई प्रदूषण का वध जरूर करेंगे। पर हमारे समाने समस्या यह है कि वध कैसे करेंगे? रामजी के पास तो तीर-कमान था, अब आप और हम मिलकर कौनसा तीर चलाएंगे? भला हो सरकार का कि सरकार ने इवन-ओड का चक्कर चलाने का प्रयास किया पर उसमें भी घोचेवाजी और मीन-मेख बहुत हुई हैं। समझते नहीं कि हमारे पूरे देश ही नहीं दुनिया भर में रावण के भैया पधार चुके हैं और स्थिति यह है कि अभी रामजी का अता-पता नहीं है। यह पक्का है कि वे भी जरूर आएंगे। पर फिलहाल उनका इंतजार कर रहे हम क्या करें। हमें भी तो कुछ करना चाहिए कि खाली इंतजार ही करते रहें। दिल्ली में प्रदूषण है इसका सब को पता है और पहले से ही पता था कि हां भाई दिल्ली में प्रदूषण है। पर यह फिरोज़ शाह कोटला स्टेडियम में टेस्ट मैच में श्रीलंकाई खिलाड़ी पॉल्यूशन मास्क पहन अपना मुंह छिपा रहे हैं कि प्रदूषण भैया कहीं हमें देख ना ले। अरे देख भी लेगा तो क्या कर लेगा प्रदूषण। हम सब खड़े हैं ना सीना ताने। यह बेवजह मुद्दे को भड़का रहे हो भैया। लंकाधिपति के देश से पधारे खिलाड़ियों तुम्हें सलाम! जीत-हार तो खेल में होती ही रहती है, पर इतना ड्रामा।
पंच काका कहते हैं कि दिल्ली में रविवार का एयर क्वालिटी इंडेक्स चारों ओर से समंदर के घिरे श्रीलंका में प्रदूषण के स्तर से काफी कम था। पूछना यह है कि भैया यह ड्रामा हार के डर का नतीजा है या फिर सच में खर-दूषण के बड़े भैया प्रदूषण से आपने सांकेतिक घूंघट रखने का नया रिवाज निकाला है।
 नीरज दइया
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06 दिसंबर, 2017

टांय टांय फिस्स / नीरज दइया

   बड़े-बूढ़ों के साथ रहना सच में बहुत बड़ी मुसिबत का काम है। वे बात बात पर हमारी कमियां निकालते रहते हैं। ऐसा लगता है कि जैसे भगवान ने उनके हाथ में परमानेंट कोई आइना दे दिया हो और वे बात-बात पर हमें आइना दिखाते रहते हैं। हम अपनी असलियत को स्वीकारते हुए सकुचाते हैं। अब देखिए मैं जो कुछ भी जैसा भी लिखता हूं, वह एकदम नया और मौलिक होता है। पंच काका को क्या पड़ी है कि वे कमियां निकालते रहते हैं। हर बार हर रचना पर वे मुझे टोकते हैं! कहते हैं- बात बनी नहीं।
    हमारी किसी बात पर हमें कोई पराया ऐसा-वैसा कहे तो उतना बुरा नहीं लगता, जितना अपना कोई सागा कहे तो लगता है। आप समझ रहे हैं ना, मैं क्या कहना चाहता हूं। पूरा उल्टा हिसाब है, पूरी दुनिया जिसे वाह-वाह करती है वह घर के जोगी जोगना हैं। कभी कभी तो ऐसा लगता है कि काका की नजर ही कमजोर नहीं हुई साहित्य को समझने की समझ ही कमजोर हो गई है। ऐसा कहने में यदि आपत्ति है तो इसको घुमाकर कहा जा सकता है- काका की साहित्यिक समझ इतनी विकसित हो गई है कि उन्हें अच्छी से अच्छी रचना जमती नहीं।
    अगर मेरी हर रचना का विषय पुराना यानी बासी है तो ताजा कहां से लाना है। माना कि आप बड़े हैं, अनुभवी है और आपको कहने का हक है। जब ऐसा कुछ कहते हो तो इसका इलाज भी तो बताओ। आप जिसे नया और उम्दा मानते हैं उसके बारे में कोई संकेत तो कीजिए। यह क्या हुआ कि मैं हिम्मत रखते हुए फिर-फिर प्रयास करता हूं। यकीन कीजिए मैं दुगने जोश-होश से प्रयास करता हूं। मैं हर बार सोचता हूं अबकी विषय नया और निर्वाहन नया है, काका दाद देंगे पर उनके आगे हमेशा मेरी टांय टांय फिस्स। इस टांय टांय फिस्स से टकरा-टकरा कर मेरे लेखन की गति सुस्ता गई है।
    पंच काका कहते हैं- जीवन की गाड़ी जब तक चल रही है चल रही है, ना जाने किस दिन टांय टांय फिस्स हो जाए। इस जीवन का परम सत्य टांय टांय फिस्स है।
    कोई बात जब नई नई होती है तो अच्छी लगती है। एक ही बात बीस बार सुनते हैं तो बोरियत होने लगती है। काका ने जैसे टांय टांय फिस्स को तकिया कलाम बना लिया है। कोई बात कहो-करो वे कहीं न कहीं से जैसे तैसे इस फिस्स तक पहुंच ही जाते हैं। कबीर दासजी ने कहा था- ‘चलती चाकी देखकर दिया कबीरा रोय, दो पाटन के बीच में साबुत बचा न कोय।’ मेरे लिए पहला पाट पंच काका है अर दूसरा टांय टांय फिस्स। लगता है काका और उस तकिया कलाम से जल्दी ही मेरी टांय टांय फिस्स होने वाली है।
    मैंने एक प्रयोग किया। जब काका को मेरे लिखे में खोट ही खोट दिखाई देता है तो उनकी पारखी नजर की परख भी हो जाएगी और हो सकता है कि कोई रास्ता ही मिल जाए। मैं काका के सामने प्रेमचंदजी की कहानी कफन मेरी बना कर ले गया।
    बोला- काका कहानी लिखी है। नाम रखा है- ‘कफन’।
    काका बोले रख दे मैं पढ़ कर बात करूंगा। मैं कहानी छोड़ कर आ गया। काका ने जैसे ही कहानी को पूरा किया तो मुझे आवाज लगाई। मैं गया और मन ही मन डर रहा था कि कहीं यह ना कह दे कि कहानी चुरा कर लाया है। पूरी की पूरी चोरी हुई कहानी देकर मुझे मूर्ख बनाता है। पर नहीं, काका शायद पकड़ नहीं पाए थे। पकड़ने वाले होते तो कहानी का नाम ‘कफन’ सुनते ही उनके दिमाग की बत्ती जलती और प्रेमचंद का नाम क्लिक होता। नए कहानीकारों की बात तो अलग यहां तो बड़े बड़े कहानीकारों को अभी तक लोगों ने पढ़ा नहीं। काकाजी के पढ़ने में जब प्रेमचंद सरीखे रचनाकार का यह हाल है, तो दूसरे रचनाकार की तो बात ही क्या करें!
    काका कहने लगे कि तेरी यह कहानी ठीक से जमी नहीं। मैं मन ही मन बोला- जमी नहीं, अरे इस कहानी से प्रेमचंदजी की दुकान अब तक जमी हुई है और आप कहते हैं कि जमी नहीं। काका ने उलटे सवाल किया- तूने कफन के चंदे से बाप-बेटे को शराब पीते दिखाया सो तो ठीक है पर वे क्या जंगल में रहते थे। यदि नहीं तो गांव में आस-पास या दूर दराज कोई औरतें नहीं थी क्या? एक स्त्री को ऐसे तड़फता दिखाय है। जापे में तो स्त्रियां एक दूसरे का सहयोग करने दूर दूर से चली आती हैं। यह कोई त्वरित घटना तो होती नहीं फिर और ऐसे काम में तो अनजान भी मदद करते हैं। किसी भी घर का दरवाजा बजाने की देर थी उन्हें मदद मिल जाती।
    काका के श्रीमुख से इतनी बातें सुनकर मेरे पैर कच्चे पड़ गए और मेरा खेल टांय टांय फिस्स। मैंने कह दिया- यह कहानी तो प्रेमचंदजी ने लिखी थी। आपको भूलवश मेरी कहानी की जगह उनकी दे दी थी।
    काका ने हंसते हुए कहा- मुझे क्या मूर्ख समझ रखा है। मैं जानता था कि तुम ऐसा करोगे । तुम इतनी महान और बारीक कहानी जिंदगी भर लिखोगे तब भी नहीं लिख सकोगे। लेखकों में फर्क बस इतना ही है कि प्रेमचंद कम गलती करते थे और तुम हो जो गलतियों की खान हो। कहानी या कोई भी रचना हो मुंह बोलनी चाहिए। तुम्हारे यहां तो दो लाइन पढ़ो और जांच करो तो टांय टांय फिस्स। रचना का उठाव अच्छा होना चाहिए। अब देखो यह कहानी प्रेमचंदजी की। इसमें माना कि कुछ छोटी मोटी कमियां है पर उठाव जबरदस्त है। एकदम पठनीय और सधी हुई भाषा। मैं समझता हूं कि इस कहानी में जो कमजोरियां मैंने बताई है वे ही इस कहानी का नयापन है। नया यानी जो जैसा हम नहीं जानते वही तो मौलिक हुआ। कफन से स्त्रियों को प्रेरणा मिलेगी कि ऐसी विकट स्थितियों में वे उनके पास रहे। अरे माना कि धीसू और माधव ने नहीं बुलाया तो क्या यह उनका धर्म नहीं था।
    बे बोल रहे थे और मैं सुन रहा था। ऐसी टांय टांय सुनना सच, बड़ी मुसिबत है! फिस्स....। और कमरा दुर्गंधमय हो गया।
००००
 
 
 

02 दिसंबर, 2017

अंगुली की अमरकथा


वे दिन लद गए जब एक हाथ से ताली नहीं बजा करती थी। अरे भैया, अब इन पुराने जमाने की बातों को भूल जाओ, एक हाथ और दो हाथ को छोड़ कर बस एक अंगुली को सलामत रखो। अब तो बस एक बटन दबाओ और जितनी चाहो तालियां रिमोट से बज सकती है। एक अंगुली की महिमा निराली है। सच्चाई तो यह है कि आजकल सारी करामात बस एक अंगुली की है। सुनते हैं कि बड़े-बड़े देशों ने ऐसे-ऐसे हथियार बना रखें है कि एक बटन दबाओ और दुश्मन देश तबाह हो सकता है। अंगुली के इशारे से काम करने और कराने वालों की बड़ी पूछ है। सब को काम ऐसा चाहिए कि उस पर कोई अंगुली नहीं उठा सके। जो अंगुली के रहस्य को समझते हैं वे जानते हैं कि कोई काम सीधी अंगुली नहीं करवाया जा सकता है उसके लिए अंगुली टेढ़ी करते कितनी देर लगती है।
अंगुलियां समझदारी में सबसे आगे हैं। देखिए किसी की तरफ एक अंगुली करते ही तीन अंगुलियां खुद हमारे समाने हो जाती है। अर्थात हम अधिक सजग और जागरूक हो जाते हैं। खुद अपने भीतर तीन सवालों के जबाब लेकर चलने वाला किसी से एक सवाल करेगा तो कभी मात थोड़े खाएगा। हाथ में लकीरें होती हैं तो अंगुलियों पर पर्वत होते हैं। हाथ तो केवल दो होते हैं और अंगुलियां दस होती है। फिर पैरों की अंगुलियां शामिल करें तो बीस का आकाड़ा काफी होता है। पैर की अंगुलियां तो अंगुलियां ही कहलाती है और पैरों को तो हम हाथ मान नहीं सकते हैं। कुदरत का खेल किसी के इक्कीस और बाईस तक अंगुलियां होती है। सबसे बड़ी बात अंगुलियों की प्रजाति में अंगूठा भी होता है जो बड़े काम का होता है। अंगूठे के काम उम्र के मुताबिक बदलते रहते हैं।
रिश्ता कोई भी हो उसमें एक बंधन होता है। बंधन है किसी डोर अथवा धागे की कल्पना भी होती है। ऐसे में डोर और धागे कभी टूट जाते हैं या उलझने लगते हैं तो रिश्ते टूटे उससे पहले उन्हें सुलझाने का काम तेज तर्राट अंगुलियों के बस की बात है। अपने दो हाथ ताली बजा सकते हैं तो दो अलग अलग हाथ रिश्तों के बंधनों में बंधते हैं तब भी अंगुलियां ही हाथ मजबूती से उन्हें पकड़ और कसावट देने में सहायक सिद्ध होती हैं। सास कहती हैं कि बहू बेटे को अंगुलियों पर नचवा रही हैं और बहू कहती है कि सास ने बेटे को अंगुली पकड़ा कर अभी तक बच्चा बना रखा है। मां की अंगुली पकड़ कर बेटा आखिर कब तक चलेगा? ऐसे ताने सुन सुन कर बेटा मां की अंगुली छोड़ कर अपनी पत्नी की अंगुली पकड़ लेता है। बच्चों और पुरुषों का स्वभाव है कि वे अंगुली पकड़ कर ही बांह पकड़ते हैं। अंगुली के महत्त्व की प्राचीनतम कथा अंगुलीमाल की है। उसे एक शनक थी कि लोगों को लूटता था और उन्हें मार कर उसकी एक ऊंगली काट कर अपनी माला में पिरोता था। गुरु द्रोण ने मोटी अंगुली यानी अंगूठे को मांग कर अपना प्रेम प्रगट किया था। लोग भोले थे जो लूटते थे और अंगुली-अंगूठा दे देते थे, अब भी लोग भोले हैं। अंगुलीमालों और द्रोणाचार्यों ने रणनीतियां बदल ली हैं। शब्दों के जादू से वे लोगों को पहले बहलाते-फुसलाते हैं फिर इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन पर अंगुली का खेल करवा कर सब कुछ अपने नाम करवा लेते हैं।
डॉ. नीरज दइया 
००००

29 नवंबर, 2017

समस्या-समाधन गीता

 आज देश में समस्याएं बहुत सारी है। यहां मैं समस्याएं गिनाने लगूं तो गिनाते-गिनाते रात हो जाएगी। इतना समय ना आपके पास है और ना मेरे पास। आपका बस थोड़ा सा समय लूंगा। अधिक कुछ कहने या सुनने की यह बात भी नहीं है। बात बस इतनी सी है जो मैं कहना चाहता हूं कि अगर आज ढेरों समस्याएं है तो उनके लिए ढेरों समाधान ढूंढ़ने की जरूरत ही नहीं है। आप कहेंगे ऐसा कैसे? तो भाइयों और बहनों ऐसा ही है। इतनी सारी समस्याओं जब भगवान ने इस संसार में बनाई है तो वे अंतर्यामी हैं। उन्होंने इन सब का समाधन पहले बनाया है। आज पढ़े-लिखे लोग धर्म से कटते जा रहे हैं। अरे मनुष्य है तो उसका अपना धर्म भी है। बिना धर्म के कोई आदमी हो ही नहीं सकता। धर्म की बात करते ही विपक्ष वाले शोर करते हैं, कुछ लोग इसे धार्मिक कट्टरता कहते हैं। मेरा कहना है कि ऐसा बिल्कुल नहीं है। हम सब भाई-भाई है। यह देश हम सब भाइयों का है तब अगर किसी को यहां रहना है तो वे भाई बनकर रहें। अगर यह बात भी जिनके गले नहीं उतरती वे गद्दार है। छोड़िए इन सब बातों को फिर कभी.... अभी तो मैं मुद्दे की बात बता रहा हूं। मुद्दा यह है कि हमारी सारी समस्याएं एक तरफ और एक तरफ गीता। आज के दौर में हमें बचना है या कहें संभलना है तो बस एक समाधान है गीता। हमारा हाथ थामने या हमें बचाने के लिए कोई बाहर से नहीं आएगा। हमें बस गीता ही बचा सकती है। और पूरा पांडाल करतल ध्वनी से गूंज उठा।
माननीय नेता जी फिर गीता-रहस्य समझाने लगे। मैं कहना चाहता हूं- आप और हम गीता को भूलाकर कभी आगे बढ़ ही नहीं सकते। हमें आगे बढ़ना है और देश को आगे बढ़ना है तो गीता ही हल है। प्रगति का पथ है गीता। आपको और हमको किसी दूसरे तीसरे की तरफ झांकने या मुंह करने की जरूरत नहीं है। क्या समझे, हमारी सारी समस्याएं सारे झगड़े और जो भी कुछ है उन सब का समाधान है गीता। कुछ लोग फिर इसे राजनीति का रंग देंगे। भाइयों और बहनों इसमें कोई राजनीति नहीं है। इसमें दूर दूर तक राजनीति नहीं है। पर यह सारी राजनीति का भी समाधान है। जिन समस्याओं की बात हम कर रहे हैं उनमें राजनीति भी एक समस्या है। अब समय आ गया है कि हमें खुल कर बोलना होगा। मैं आप सब के भले की बात कर रहा हूं। अपना भला ही देश का भला होता है। यह स्वार्थ नहीं है। भैया जब यहां का आम आदमी तरक्की करेगा तभी तो देश तरक्की करेगा। आम आदमी की सारी समस्याओं का हल है गीता। चलिए आप में से कोई आदमी खड़ा हो जाए और वह कोई एक समस्या यहां रखें तो अभी हल हो जाता है।
आम आदमी एक खड़ा होकर हाथ जोड़ते हुए बोला- ब्लू व्हेल.... उसका इतना कहना था कि पांडाल तालियों से गूंज उठा। नेताजी के चेहरे पर चिर मुस्कान कुछ अधिक ही फैलने लगी। वे बनावटी हंसी के साथ फिर कहने लगे- ब्लू व्हेल जैसे खेल के विनाश से गीता ही बचा सकती है।... बच्चे और बड़े-बूढ़े सब अपनी अपनी समस्या का समधान गीता में खोज सकते हैं। कहीं आने-जाने या फिर किसी से कहने-सुनने की जरूरत नहीं है।...भाषण जारी था, यह समाधान रहस्य लिए लौट आया। अब समस्याओं के समाधन गीता में खोज रहा हूं।
० डॉ. नीरज दइया
 

22 नवंबर, 2017

हम बड़े गली संकरी

यह समझना इतना आसान नहीं है कि देखा और समझ आ जाए। बड़े और छोटे का खेल निराला है। लो इधर देखो, यह लाइन देखो और बताओ यह छोटी है या बड़ी? क्या बोले, तुम इसे छोटी लाइन कहते हो भैया। नहीं भैयाजी देखो.... और उन्होंने उस लाइन के पास एक दूसरी लाइन खींच कर उसे छोटी लाइन को बड़ा साबित कर दिया। वे मुस्कुराते हुए बोले- यह मायाजाल है, दुनिया का भ्रम है। धोखा है। भैया, वास्तव में कोई छोटा-बड़ा होता ही नहीं है। सब अपने अपने कर्मों का लेखा-जोखा है कि यहां कोई छोटा दिखाई देता है और कोई बड़ा। ध्यान से सुनो, बताता हूं- बहुत बड़े-बड़े लोग, खूब पैसे टक्के कमाने वाले बड़े लोग... क्या समझते हैं- हम बड़े गली संकरी। पर भैया टेम-टेम की बात है, आज जो गली संकरी लग रही है वो समय बदलने पर बड़ी भी लग सकती है और ऐसा भी हो सकता कि बिल्कुल छोटी हो जाए। नाली जैसी। नहीं समझे.... उन्होंने कहा और मैंने अपना आपा खो दिया- नहीं तो ये सब बातें आप मुझे क्यों समझा रहे हैं। आप अपना ज्ञान अपने पास रखिए। मेरे पास खुद अपना ही ज्ञान बहुत है, मुझे क्या समझ रखा है? अपना काम करो।
फिर वे मुस्कुराते हुए बोलने लगे- नहीं भाई, तुम तो नाराज हो गए। तुम लेखक हो और ऐसी गहन गंभीर बातों पर तुम नाराज नहीं हो सकते। तुम्ही तो हो जो रहस्य समझ सकते हो। भाई साहब ऐसे तमतमाओ मत। चलो बताओ, मुझे कुछ पूछने-जानने का तो अधिकार है ना? तो मैं उसी अधिकार के नाते तुमसे जानना चाहता हूं कि कबीरजी ने लिखा था- ‘प्रेम गली अति सांकरी, जा में दो न समाय!’ यह शब्द संकरी है या सांकरी? माना की संकरी और सांकरी का एक ही अर्थ है और मात्रा से कोई विशेष अंतर नहीं पड़ता। पर मात्रा से अंतर तो पड़ता है ना मेरे भाई। जैसे नर में मात्रा बढ़ाओ तो नारी बन जाता है। अरे केवल अ को आ की मात्रा में बदलने का मजा देखो कि गली से शब्द गाली बन जाता है।...
- नहीं तो जब मैंने कह दिया कि आप ज्ञानी हो और मुझे आपका ज्ञान नहीं चाहिए। फिर आप जबरदस्ती क्यों लादते जा रहे हैं। माना कि यह आपका अधिकार है कि कोई सवाल पूछ सकते हैं, पर यह क्या ऊट-पटांग जो जी में आता है, बकते जा रहे हो। लाइन छोटी-बड़ी और फिर कबीर... ये सब क्या है? मुझे क्यों परेशान कर रहे हो? उनके चेहरे की मुस्कान पर कोई ब्रेक नहीं लगा। उनकी मधुर मुस्कान और बकबक जारी रही। वे कह रहे थे- मेरा उद्देश्य आपको परेशान करना कतई नहीं है भैयाजी। मैं एक चिंतनशील प्राणी हूं और जाहिर है कि आप लेखक हैं तो आप भी चिंतनशील प्राणी हैं। जब दो चिंतनशील प्राणी मिल-बैठे तो आस-पास वालों को लगना चाहिए कि कोई गंभीर विषय पर चर्चा हो रही है। क्या मैं गलत कह रहा हूं...?
मैंने हाथ जोड़ते हुए कहा- भैया मेरे लेखक के पास बहुत सारी समस्याएं और चिंतन के विषय पहले से है। आप नाहक परेशान हो रहे हैं, आपको जो करना है करें और मुझे जो करना है वह मैं करता हूं। वे फिर बीच में बोल पड़े- अरे जब सब अपना-अपना काम करेंगे तो यह चिंतन-मनन-मंथन कौन करेगा। शब्द तो ब्रह्म है। हमारी इस विरासत और देश का क्या होगा?... वे बोलते चले जा रहे थे।
डॉ. नीरज दइया


14 नवंबर, 2017

गिनीज़ विश्व कीर्तिमान की कढ़ी

अरे जनाब, जब पूरा देश दौड़ में शामिल है फिर आप पीछे कैसे रह सकते हैं। आपको भी दौड़ना होगा। हम आपका भ्रम तोड़ देंगे। फिर यह नाम दर्ज करवाने की दौड़ है। गिनीज बुक में नाम दर्ज करवाने के लिए लोग क्या-क्या नहीं करते। आपको भी लालायित होना चाहिए। वैसे मेरा मानना है- यह हो नहीं सकता। आप जरूर भीतर ही भीतर लालायित हैं, पर अपनी लालायित-लालिमा को प्रगट नहीं कर रहे। चलिए देश में खिचड़ी बनी और एक कीर्तिमान अर्जित हो गया। वैसे हमारे यहां खिचड़ी पहली बार नहीं पकी, रिकार्ड के लिए तो लोग वर्षों से खिचड़ी पकाते रहे हैं। यह अब सार्वजिक हो गया कि हम खिचड़ी बड़े स्तर पर पका सकते हैं। ऐसी अनेक सफलताएं हम अर्जित करेंगे और पूरे गिनीज विश्व कीर्तिमान की कढ़ी कर देंगे। कढ़ी से याद आया हम खिचड़ी की तुलना में कढ़ी बनाने में ज्यादा उस्ताद हैं।
कुछ लोग वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाने में जी-जान लगा देते हैं और हमें तो जी-जान लगाने की जरूरत नहीं है। इसका एक कारण यह भी है कि हमारा ‘जी’ तो टीवी और न्यूज वालों ने ले चुरा लिया है। अब हमारी ‘जान’ बिना ‘जी’ के है। हमारी किसी को परवाह नहीं है। यह पूरा सत्य नहीं है। क्यों कि जान है तो जहान है। फिर जान-जहान में हम योग गुरु जो ठहरे। हमने माननीय प्रधानमंत्री जी को आगे किया और राजपथ पर योग कर डबल गिनीज़ वर्ल्ड रिकॉर्ड बनाया। पहला तो 35 हज़ार से ज़्यादा लोगों के एक साथ योग करवाने का और दूसरा 84 देशों के नागरिकों के एक साथ एक जगह योग करवाने का। काश! हम खिचड़ी खाने के लिए भी 84 देशों के नागरिकों को आमंत्रित कर लेते तो यह भी डबल हो जाता। हम यह कसर कढ़ी बनाते वक्त पूरी करेंगे।
हमारे कढ़ी प्रोग्राम में जिनको नहीं आना उनके लिए बता दें कि हमने जब दुनिया में सबसे बड़ी जलेबी और इमरती बनाकर रिकॉर्ड बनाया था तब भी आपको बुलाना भूल गए थे। इसलिए कढ़ी के कार्यक्रम में आप जरूर पधारें। वैसे नहीं आ सकें तो चिंता भी नहीं करें। हम रुकने वाले नहीं। फिर मौका देंगे। हमारे पास खूब विचार है। हम विचारों की खान हैं। हम आपको टांग खींचने का रिकॉर्ड बनाते वक्त याद करेंगे। वैसे तो हम यहां दूर बैठे हुए भी आपकी टांग खींच सकते हैं। आपकी इज्जत उतार सकते हैं। इज्जत की बात पर याद आया कि इटली के सिल्वियो साबा ने महज 30 सेकेंड में 13 अंडरवियर पहनकर अपना नाम गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड में दर्ज करा लिया। हमें इतनी उछल कूद की जरूरत नहीं। भारत का वर्ल्ड रिकॉर्ड यह भी है कि पढ़ने वाले और देखने-सुनने वालों में अंडरवियर जैसे विषयों में अपरोक्ष रुचि बड़े शर्म के साथ हम दर्शाते हैं। पहले हमारे यहां ऐसे विषयों पर प्रतिबंध था, अब हमने भी सारे पर्दे हटा दिए हैं।
० डॉ. नीरज दइया

12 नवंबर, 2017

पांच कविताएं ० नीरज दइया


अंजाम

सत्य वचन है श्रीमान
यूज एंड थ्रो आइटम हूं मैं
यह बाजार है श्रीमान
मुझे यूज करें....

जानता हूं मैं
मेरा अंजाम
फिर भी कहता हूं-
श्रीमान! यूज करें मुझे..

‘थ्रो’ से पहले
क्या यह स्मृति काफी नहीं
‘यूज’ किया गया मैं
श्रीमान के द्वारा!
००००

अधूरी कहानी

चलता जा रहा हूं मैं
जैसे चलती है पेन की रिफिल
लिखता जा रहा हूं मैं
जैसे कोई कहानी....

और एक दिन
यानी किसी आखिरी दिन
पेन से नहीं लिख सकूंगा मैं
कैसे करूंगा पूरी कहानी...
००००

निवेदन

जीवन के दो छोर हैं-
‘यूज’ और ‘थ्रो’।

मेरे ‘यूज’ में तुम साथ रहे,
‘थ्रो’ से ठीक पहले
नजर बचा के निकल जाना
थोड़ी देर के लिए ही सही
मैं तुम्हें दुखी नहीं देख सकूंगा।
००००

एक जैसी बातें नहीं

‘यूज’ किया तुमने मुझे
‘यूज’ हुआ मैं तुम्हारे द्वारा
दोनों एक जैसी बातें नहीं है।

तुमने मुझे ‘थ्रो’ किया
मैं ‘थ्रो’ हुआ तुम्हारे द्वारा
दोनों एक जैसी बातें नहीं है।

तुम्हें भ्रम है
मुझे भी भ्रम है
दोनों एक जैसी बातें नहीं है।

तुमने मुझे प्रेरणा दी
मैंने तुमसे प्रेरणा ली
दोनों एक जैसी बातें नहीं है।
००००

तिल भर जगह
 
किसे बचा कर रखूं
क्या बचा कर रखूं
रखने को कोई कोना नहीं मेरा
यहां तिल भर जगह भी नहीं है मेरी
सब कुछ है तुम्हारा....
००००
राजस्थान पत्रिका समूह के प्रतिष्ठित हिंदी दैनिक ‘डेली न्यूज़’, जयपुर के 12-11-17 रविवारीय साहित्य पृष्ठ 'हमलोग' में
 

11 नवंबर, 2017

भटकती आत्माएं

प आत्मा में विश्वास करें या ना करें। मुझे तो पूरा विश्वास है कि आत्मा होती है। मेरी आत्मा है और मुझ को मेरी आत्मा में आस्था है। आप क्या कहते हैं, क्या मानते हैं या मानते भी है कि नहीं मानते, इस से मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं अपनी आस्था पर अडिग हूं। अडिग होना बड़ा कठिन काम है। पूरा पार्टी इतिहास देखेंगे तो पता चलेगा कोई किसी पार्टी में अडिग नहीं रहा है। वे अस्थिर होते हैं, कहते हैं- बदलाव प्रकृति का नियम है। अडिग रह कर क्या झंडे गाड़ने हैं। अडिग तो यह जीवन भी नहीं। सब चला चली का दो दिन का खेला है। इस खेले में जितन हंस खेल लें, खा-पी लें वही बस अपना है। बंद मुठ्ठी आए थे और खाली हाथ जाना है। ये इतनी ज्ञान की बातें करने वाले बड़े स्याणे होते हैं। बाते बड़ी बड़ी करते हैं और हरकतें छोटी-छोटी। मुंह में राम और बगल में छुरी की बातें ऐसे महानुभाव ही पुष्ट करते हैं। इन के लिए कुछ कहना खतरा मोल लेना है। इसलिए अपनी तो चुप है जी।
    हां तो मैं बता रहा था कि मेरा मानना है- आत्माएं होती हैं और वे भटकती रहती हैं। आपको सच कह रहा हूं कि भटकती आत्माएं बेचैन होती है। भटकन और बेचैनी परस्पर एक दूसरे को हस्ट-पुष्ठ करती है। अगर इस बीमारी को चैन मिल जाए तो वे सुखी हो जाए। सुख में भला कौन भटकता है। दुनिया में सारा खेल बस सुख-चैन का है। जिसको सुख-चैन मिला की ठहर कर बैठ जाते हैं। सुख में सुमरिन भी कहां होता है। दुखी और बेचैन भटकता भटकता भी सुमरिन करता है। उसे जिस जिस की याद आती है वह उस उस के पास भटकता भटकता पहुंच जाता है इसलिए उसे भटकती आत्मा कहा जाता है। जगत में रावण की आत्मा भटकने में विख्यात है। एक रावण दस सिर और उसकी आत्माएं कितनी थी यह पता नहीं। फिर उसके भाई-बंधु और वंशज भी तो उसी नस्ल की आत्मा को लिए हुए थे।
    रावणी आत्माओं का आजादी के इतने वर्षों बाद भी इलाज नहीं हुआ तो अब क्या होगा! रामजी भी रुष्ठ हो गए हैं कि अबकी बार जब माननीय प्रधानमंत्री जी ने रावण के सामने धनुष की प्रत्यंचा से निशाना साधाने का प्रयास किया तो बिना आवाज के वह टूट गया। विपक्ष की आत्माओं अट्टहास हुआ। अदृश्य आत्माएं और मौन अट्टहास। प्रत्यक्ष में तो इस टूटने पर पास खड़े पूरे व्यवस्था-विभाग को सांप सूंध गया। निकट खड़े पूर्व प्रधानमंत्री जी को वर्तमान प्रधानमंत्री जी ने देख हल्की सी स्मित विखेरी और कहा- रावण को नहीं छोड़ेंगे। उन्होंने तीर को भाले की तरह रावण की दिशा में फेंका। बात बस इतनी थी। रावणी आत्माओं को मौका मिल गया। बात का बतंगड़ बना। जाने खबरों और अपवाहों का जाल कैसे रचा, किसने रचा। पर आजाद देशवासियों ने इस घटना को तूल दिया। इसे सफेद बालों वाले 56 इंची छाती से संपन्न युवा नरेंद्र के हाथों रावण का मरने से इनकार बताते हुए, अनिष्ट और अपशकुन का प्रमाण बताया गया। पंच काका कहते हैं- राजस्थानी में एक कहावत है- रांडे रोती रहेंगी और जवांई जीमते रहेंगे। भटकती आत्माएं रांडे हैं जिनको रोना है और जवांई कौन है यह कहने की जरूरत नहीं है। थोड़ी बहुत समझ तो रखते हैं आप। अब सब कुछ काका के मुंह से ही सुनोगे कि अपना मुंह भी कुछ खोलोगे...। 
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08 नवंबर, 2017

परख / पंच काका के जेबी बच्चे

यशवंत कोठारी
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कवि-आलोचक नीरज दइया इन दिनों व्यंग्य में सक्रिय है। इस पोथी में उनके ताजा व्यंग्य संकलित है जो उन्होंने विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं हेतु लिखे हैं। इन व्यंग्य रचनाओं के बारे में सुपरिचित व्यंग्यकार-संपादक सुशील सिद्धार्थ ने एक लंबा, सचित्र ब्लर्ब लिखा है जो उनके फोटो के साथ अवतरित हुआ है। संकलन में नीरज के चालीस व्यंग्य हैं, भूमिका महेश चंद्र शर्मा ने लिखी है जो स्वयं एक बड़े संपादक हैं। वर्तमान की विसंगतियों पर नीरज की पैनी नजर है, वे चीजों को बहुत ध्यान से देखते हैं फिर पूरी शालीनता के साथ व्यंग्य के रूप में रियेक्ट करते हैं, यहीं आज के व्यंग्य की मूलभत आवश्यकता है, जिसे लेख लिखने वाले भूल जाते हैं, मगर कविमना नीरज सब कुछ संजो कर पाठकों के साथ ताल मेल बिठा कर अपनी बात कहते हैं। व्यंग्य की यही विशेषता होती है। पाठक आपको मिल जाए।
अधिकांश रचनाएं कलेवर में छोटी है, काश नीरज पूरी लंबाई की रचना लिखते फिर संपादित कर अखबारों को देते , क्योंकि अखबारों में आजकल जगह खत्म, लेख खत्म, प्रभारी ज्यादा मेहनत नहीं करते। नीरज पाठकों को गुमराह नहीं करते, वे सीधा संवाद करते हैं। वे लंबी-चौड़ी नहीं हांकते, बस काम की बात करते हैं। लगभग सभी रचनाओं में पंच काका उपस्थित है, यह पंच हिंदी का तो है ही अंग्रेजी का भी पंच है। हर रचना में पंच है जो पाठक को झकझोर देता है। मास्टरजी का चोला इस संकलन का सबसे अच्छा व्यंग्य है। सेल्फी पर भी लेखन ने अच्छा लिखा है। लेखक का वर्तमान परिवेश से अच्छा नाता है, वे बार-बार समाज में व्याप्त विसंगतियों पर प्रहार करते हैं।
दाढ़ी पर भी उन्होंने खूबसूरत व्यंग्य लिखा है। नीरज का कवि रूप भी इन रचनाओं में विचरता रहता है। साहित्य संबंधी व्यंग्यों में कटु यथार्थ के दर्शन होते हैं। नीरज के इन व्यंग्यों में बिम्ब है, प्रतीत है, वक्रता है, वे इन औजारों का जम कर इतेमाल करते हैं। ‘अपने अपने भूत’ ऐसा ही व्यंग्य है। काश वे कुछ और रचनाओं को शामिल करते, पुस्तक का कलेवर छोट है, मूल्य अधिक।
पुस्तक का शीर्षक व्यंग्य- पंच काका के जेबी बच्चे कुछ आत्म व्यंग्य की तरह शुरू होता है फिर जाकर सार्वजनिक हो जाता है। यह कला कम ही लेखक साध पाते हैं। नीरज ने यह कर दिखाया है। कई जगहों पर राजस्थानी मुहावरे हैं, जो मन को खुश कर देते हैं पिताजी के जूते ऐसा ही व्यंग्य है।
अमुख, प्रमुख और आमुख लेखक एक साहित्यिक व्यंग्य है जिसे लगभग हर लेखक ने जिया है। मानदेय हर सच्चे लेखक की दुखती रग है। साहित्यिक मेलों प्र भी लेखक ने कलम तोड़ कर रख दी है। कुल मिलाकर सुधि पाठक इस संकलन का स्वागत करेंगे। अब कुछ बात कालम लेखक की। नीरज के ये व्यंग्य किसी कॉलम की मर्यादा के साथ चलते हैं, कॉलम का अनुशासन या संपादक का अनुशासन मानना ही पड़ता है लेखक को अपनी मजबूरियों को नजर अंदाज कर कॉलम की मजबूरियों के साथ जीना पड़ता है या जीना सिखना पड़ता है। यही है वो कारण जो एक क्लासिक रचना को रोक देता है।
मैं इस रचना का स्वागत करता हूं। वे खूब लिखें। पुस्तक का कवर प्रतीकात्मक है मगर सुंदर है। इस संकलन को पढ़ने के बाद यह कहा जा सकता है कि राजस्थान का हिंदी व्यंग्य लेखन का भविष्य उज्ज्वल है। वे रांगेय राघव, अशोक शुक्ल, भगवती लाल व्यास की परंपरा को आगे बढ़ाएंगे। आमीन।
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पंच काका के जेबी बच्चे / डॉ. नीरज दइया / व्यंग्य संग्रह / वर्ष 2017 / मूल्य 200/- / पृष्ठ 96 / सूर्य प्रकाशन मंदिर, बीकानेर-334001
(मधुमती : अक्टूबर, 2017)

06 नवंबर, 2017

सच और झूठ की लड़ाई

डॉ. नीरज दइया
राम और रावण की लड़ाई सच और झूठ की लड़ाई थी। कौरवों और पांडवों की लड़ाई भी सच और झूठ की लड़ाई थी। किंतु ये बहुत पुरानी कहानियां है। सच और झूठ की ऐसी अनेक कहानियां है। कहानियां अब भी चल रही है, पर समस्या यह है कि सच और झूठ की जो लड़ाई की ये कहानियां नई-नई है। कहानियां अभी चल रही है इसलिए कोई फैसला देना जल्दबाजी होगा। सच और झूठ की ये कहानियां अब चुनाव चिह्नों के साथ जुड़ गई है। अपने पायदे के लिए कोई सच-झूठ भी पार्टी बदल सकता है। बदल रहे हैं। भीड़ का क्या है, आज सच के साथ है सच को जिंदाबाद कहती है, कल सच को झूठ से टिगट मिल गया तो उसके अनुगामी झूठ के साथ हो जाएंगे और दम लगाकर कहेंगे- झूठ जिंदाबाद।
असल में यह छद्म युद्ध है। यहां नाम-काम सब दाम के सहारे अदल-बदल होते हैं। ऐसी चालें और घातें पहले नहीं थी। जिसे देखो सच का झूठ और झूठ का सच करने में लगा है। दोनों का चेहरा इतना बदल गया है कि इन्हें आम आदमी अब पहचाना ही नहीं सकता। वह अपनी धुन में रहता है। सच आम आदमी के पास गया और बोला- मैं सच हूं। आम आदमी ने कहा- मैं क्या करूं? वह बोला- बस यूं ही बता रहा हूं। आप को ध्यान होना चाहिए कि मैं सच हूं। मुझे वोट देना। आम आदमी ने रूखाई से कहा- मुझे किसी से कोई मतलब नहीं। मैं आम आदमी हूं और मेरा वोट गोपनीय है। मैं अपना काम करूंगा, तुम अपना करो। फिर झूठ भी आम आदमी के पास पहुंचा और बोला- मैं झूठ हूं। वोट मुझे देना। आम आदमी ने रटा-रटाया जबाब दिया- मैं क्या करूं? मेरा वोट गोपनीय है। झूठ ने प्रतिवाद किया- अभी तुम्हारे पास जो आया था, वह क्या कह रहा था? आम आदमी ने सिर नीचे किए रखा, उसे सिर उठाने की फुर्सत नहीं थी। उसने उसकी तरफ देखे बिना ही कहा- मुझे किसी से कोई मतलब नहीं। तुम जब मतलब होता है तभी आते हो। तुम जा सकते हो।
आम आदमी की त्रासदी है कि उसने सच और झूठ दोनों को नहीं देखा। वे भेस बदल बदल कर उसे प्रभावित करते रहे हैं। उसे अब अरुचि हो गई है। वह बस चाहता है कि उसे दाल-रोटी मिल जाए। उसे इन पड़पंचों में नहीं उलझना। उसे ना इस से सरोकार है ना उस से तकरार है। वह हर बार सुनता है कि जबरदस्त मुकाबला चल रहा है। कोई उससे कहता है कि यह लड़ाई आम आदमी के लिए है, कोई उसे कहता है देखना अब हालात बदल जाएंगे। वह सुनता है कि वह यानी आम आदमी जिसे चाहेगा वह जीतेगा। आम आदमी एक फीकी मुस्कान के साथ इस पंचवर्षीय योजना में मूक बना हुआ है।
पंच काका कहते हैं- यह तो अच्छा है कि आम आदमी अपने कामों में खोया है। उसे फुर्सत नहीं है कि वह पार्टियों के सच-झूठ को देखे-सुने और फैसला करे। अगर देख भी लेगा तो वह क्या कर सकता है? उसके पास कुछ नहीं है बस केवल एक वोट है। सच और झूठ की लोकतांत्रिक लड़ाई में खेल-भावना का बड़ा महत्त्व है। अंत में सब गले मिलते हैं और फिर शीत-समाधि के बाद समय आने पर ही मोर्चा संभालते हैं। आम आदमी की जान इस मुखौटा-युग में सही सलामत रह जाए यही बहुत है।
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