16 अगस्त, 2017

111 कविताएँ कवि : सुधीर सक्सेना

पुस्तक समीक्षा /  डॉ. नीरज दइया
    हिंदी कविता में विगत चार दशकों से सक्रिय कवि सुधीर सक्सेना की पुस्तक ‘111 कविताएं’ उनके सात पूर्व प्रकाशित कविता-संग्रहों- ‘कुछ भी नहीं अंतिम’, ‘समरकन्द में बाबर’, ‘रात जब चन्द्रमा बजाता है बाँसुरी’, ‘किताबें दीवार नहीं होती’, ‘किरच किरच यकीन’, ‘ईश्वर- हां... नहीं... तो’ एवं ‘धूसर में बिलासपुर’ से चयनित कविताएं है। संग्रह में इन सात कविता-संकलनओं से चयनित कविताएं कवि के इंद्रधनुषी सफर को प्रस्तुत करती हैं, वहीं इन सात रंगों में अनेक रंगों और वर्णों की आभा भी सुसज्जित नजर आती है। कहना होगा कि एक लेखक-कवि और संपादक के रूप में सुधीर सक्सेना की रचनाशीलता के अनेक आयाम हैं। वे किसी एक शहर अथवा आजीविका से बंधकर नहीं रहे, साथ ही वे विविध विधाओं में सामान्य और औसत लेखन से अलग सदैव कुछ अलग और विशिष्ट करने के प्रयास में आरंभ से ही कुछ ऐसा करते रहे हैं कि उनकी सक्रिय उपस्थिति को रेखांकित किया गया है। उनका कविता-संसार एक रेखीय अथवा सरल रेखीय संसार नहीं है कि जिसमें बंधी-बंधाई और किसी एक लीक पर चलने वाली कविताएं हो। जाहिर है यह चयन और संकलन उनकी इसी विविधता और बहुवर्णी काव्य-सरोकारों को जानने-समझने का मजीद अहमद द्वारा किया गया एक उपक्रम है। सुधीर सक्सेना की काव्य-यात्रा के विषय में संपादक के कथन- ‘उनकी कविओं की शक्ति, सुन्दरता के आयामों की विविधता ही कवि को समकालीन हिंदी कविता की अग्रिम पंक्त में ला खड़ा करती है।’ से निसंदेह पाठकों और आलोचकों की सहमति पुस्तक के माध्यम से भी होती है।
    पुस्तक के आरंभ में कवि सुधीर सक्सेना की काव्य-यात्रा पर प्रकाश डालती सुधी आलोचक ओम भारती की विस्तृत एवं महत्त्वपूर्ण भूमिका है। साथ ही वरिष्ट कवि-आलोचक नरेन्द्र मोहन का कवि सुधीर सक्सेना की काव्य-साधना पर एक पत्र पुस्तक में ‘मंतव्य’ के अंतर्गत दिया गया है। इससे यह पुस्तक शोधार्थियों और सुधी पाठकों के लिए विशेष महत्त्व की हो गई है। कविता-यात्रा के विविध पड़ावों पर यह गंभीर अध्ययन-मनन कविताओं के विविध उद्धरणों के माध्यम से नवीन दृष्टि और दिशा देने वाले हैं। इन आलेखों में जहां कवि के साथ अंतरंग-प्रसंगों को साझा किया गया है वहीं समकालीन कविता और सुधीर सक्सेना की कविता को लेकर विमर्श में हिंदी कविता में सुधीर सक्सेना का योगदान भी रेखांकित हुआ है। संग्रह में संकलित कविताओं में जहां कवि के काव्य-विकास और संभावनाओं की बानगी है, वहीं उनके सधे-तीखे तेवर और निजता में अद्वितीय अभिव्यंजना का लोक भी उद्घाटित हुआ हैं। इसी को संकेत करते ओम भारती लिखते हैं- ‘सुधीर की कविता बरसों का रियाज, सधे-सुरों और सहज आलाप समेटती पुरयकीन कविता है। इसमें व्यंजना का रचाव है,तो लक्ष्णा का ठाठ भी है।’
    संकलित कविताएं वर्तमान जीवन के यथार्थ-बोध के साथ कुछ ऐसे अनुभवों और अनुभूतियों का उपवन है जिसमें हम उनकी विविध पक्षों के प्रति सकारात्मकता, सार्थकता और आगे बढ़ने-बढ़ाने की अनेक संभवनाएं देख सकते हैं। कविताओं में कवि की निजता और अंतरंगता में प्रवाह है तो साथ ही पाठक को उसके स्तर तक पहुंच कर संवेदित करने का कौशल भी है। वे कविताओं के माध्यम से जैसे एक संवाद साधते हैं। कविताओं में कवि की उपस्थिति अथवा अनुपस्थिति से अधिक उल्लेखनीय उनकी सहजता, सरलता और सादगी में अभिव्यंजित होती विचारधारा है। जिसके रहते वे विषय और उसके प्रस्तुतीकरण के प्रति सजग-सचेत और हर बार नई भंगिमाओं की तलाश में उत्सुकता जगाते हुए अपने पाठकों को हर बार आकर्पित करते हैं। ‘कुछ भी नहीं अंतिम’ संग्रह के नाम को सार्थक करता यह संकलन अपनी यात्रा में बहुत बार हमें अहसास करता है कि सच में कवि के लिए कविता का कोई प्रारूप अंतिम और रूढ़ नहीं है। ‘समरकंद में बाबर’ के प्रकाशन के साथ ही हिंदी कविता में सुधीर सक्सेना को बहुत गंभीरता से लिया जाने लगा। वे जब ईश्वर के विषय में फैले अथवा बने हुए संशयों को कविता में वाणी देते हैं तो अपने अंतःकरण के निर्माण में अपने इष्ट मित्रों और साथियों की स्मृतियों-अनुभूतियों को भी खोल कर रखते हैं। ‘ईश्वर- हां... नहीं... तो’ और ‘किताबें दीवार नहीं होती’ जैसे संग्रहों की कविताएं सुधीर सक्सेना को हिंदी समकालीन कविता के दूसरे हस्ताक्षरों से न केवल पृथ्क करती है वरन यह उनके अद्वितीय होने का प्रमाण भी है। प्रेम कविताएं हो अथवा निजता के प्रसंगों की कविताएं सभी में उनकी अपनी दृष्टि की अद्वितीयता प्रभावशाली कही जा सकती है। ये कविताएं कवि के विशद अध्ययन-मनन और चिंतन की कविताएं हैं जिन में विषयों की विविधता के साथ ऐसे विषयों को छूने का प्रयास भी है जिन पर बहुत कम लिखा गया है। कवि को विश्वास है- ‘वह सुख/ हम नहीं तो हमारी सततियां/ तलाश ही लेंगी एक न एक दिन/ इसी दुनिया में।’ वे अपनी दुनिया में इस संभावना के साथ आगे बढ़ते हैं।
    ‘धूसर में बिलासपुर’ लंबी कविता इसका प्रमाण है कि किसी शहर को उसके ऐतिहासिक सत्यों और अपनी अनुभूतियों के द्वारा सजीव करना सुधीर सक्सेना के कवि का अतिरिक्त काव्य-कौशल है। कविता की अंतिम पंक्तियां है- ‘किसे पता था/ कि ऐसा भी वक्त आयेगा/ बिलासपुर के भाग्य में/ कि सब कुछ धूसर हो जायेगा/ और इसी में तलाशेगा/ श्वेत-श्याम गोलार्द्धों से गुजरता बिलासपुर/ अपनी नयी पहचान।’ अस्तु कहा जा सकता है कि जिस नई पहचान को संकेतित यह कविता है वैसी ही हिंदी कविता यात्रा की नई पहचान के एक मुकम्मल कवि के रूप में सुधीर सक्सेना को पहचाना जा सकता है।
    अच्छा होता कि इस संकलन में संग्रहों और कविताओं के साथ उनका रचनाकाल भी उल्लेखित कर दिया जाता जिससे हिंदी कविता के समानांतर सज्जित इन कविता यात्रा को काल सापेक्ष भी देखने-परखने का मार्ग सुलभ हो सकता था। साथ ही यहां यह भी अपेक्षा संपादक से की जा सकती है कि वे अपना और कवि का एक संवाद इस पुस्तक में देते अथवा कवि सुधीर सक्सेना से उनका आत्मकथ्य इस पुस्तक में शामिल करते। इन सब के बाद भी यह एक महत्त्वपूर्ण और उपयोग कविता संचयन कहा जाएगा। सुंदर सुरुचिपूर्ण मुद्रण और आकर्षक प्रस्तुति से कविताओं का प्रभाव द्विगुणित हुआ है।
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111 कविताएँ / कवि : सुधीर सक्सेना चयन एवं संपादन : मजीद अहमद प्रकाशक- लोकमित्र, 1/6588, पूर्व रोहतास नगर, शाहदरा, दिल्ली पृष्ठ : 224 मूल्य : 395/- संस्करण : 2016  
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11 अगस्त, 2017

असत्य के प्रयोग

    बापू की आत्मकथा का नाम है। सत्य के प्रयोग। उन्होंने बताया जो मैं पहले से जानता था, पर नई बात यह थी कि वे किताब लिख रहे हैं- असत्य के प्रयोग। केवल किताब ही नहीं लिख रहे, उन्होंने कहा कि वे प्रयोग भी कर रहे हैं। उनका मानना है कि सत्य से भला क्या प्रयोग करना? जो सत्य है, वह तो सत्य है। प्रयोग का विषय तो असत्य है। अब जमाना सत्य का नहीं, केवल और केवल असत्य का ही जमाना है। अब तो झूठों का बोलबाला और सच्चे का मुंह काला वाली अनेक बातें और स्थितियां हमारे समाने हैं। वे महाश्य मुंह खोल कर खड़े थे और बीच-बीच में बोल रहे थे- मुझसे मुंह मत खुलवाओ, आपको सबको पता है कि कहां क्या-क्या हो रहा है। मैंने उन्हें टोका- मुझे कुछ भी नहीं पता कि कहां क्या-क्या हो रहा है?
    उन्होंने मुझे ऊपर से नीचे तक घूरते हुए कहा- अखबार नहीं पढ़ते हो या समाचार नहीं सुनते हो। छोड़िए इन दोनों को, क्या चौक में नहीं बैठते हो। आस-पास की गप्प-गोष्ठी का आनंद तो लेते ही हो। फिर भी भोले बनते हो। क्या आप भी मेरी तरह असत्य का कोई प्रयोग मुझ पर करने लग गए हो? देखिए, यह आपका विषय नहीं है। मैंने इसे खोजा है और इस पर मुझे काम करने दो। मेरी किताब छप जाए फिर देखना सबकी आंखें खुल जाएगी। मुझे फिर उनको टोकना पड़ा- जनाब आंखें तो सभी की खुली हुई है।
    वे तनिक गुस्से से बोले- आप सब कुछ समझकर भी नादान बनते हैं, उसका कोई क्या कर सकता है! आंखें तो खुली हुई है, पर फिर भी खुली हुई नहीं है। इसे ऐसे समझ सकते हैं कि हमारा आदर्श वाक्य है- सत्यमेव जयते। जानते हैं ना? मैंने गर्दन स्वीकृति में हिलाई तो वे बोले- मेरी किताब पढ़ने के बाद वही वाक्य नए रूप में दिखाई देने लग जाएगा। आज सत्य की जीत कहां हो रही है। झूठ बेचा जा रहा है, खरीदा जा रहा है। चारों तरफ झूठे लोग भरे पड़े हैं। जिसे देखो- झूठ बोलते हैं और सरासर झूठ बोलते हैं। सफेद झूठ को रंग-बिरंगे लुभावने रंगों में सजा कर पेश किया जा रहा है। नहीं समझें? मैं विज्ञापनों की बात कर रहा हूं। वस्तुओं की कीमत की बात कर रहा हूं। दो रुपये के माल को बीस रुपये में बेचने वाले एम.आर.पी. के नाम पर भोली भाली जनता को ठग रहे हैं।
    मैंने बीच में पूछना मुनासिब समझा कि असत्य के प्रयोग किताब में क्या इन्हीं सब बातों पर प्रवचन मिलेंगे? वे हंसने लगे और बोले- आप भी ना कितने भोले हैं। देखिए मैं प्रयोग कर रहा हूं। किताब लिखने की बात कर रहा हूं और अगर किताब लिख दी तो फिर यह असत्य, कैसे असत्य रहेगा? बात को समझा करो, मैं सच में असत्य के प्रयोग कर रहा हूं। मैंने उन्हें प्रणाम कर बस इतना ही कहा- धन्य हैं आप। धन्य है आपकी धरा और धन्य जननी। जैसे उन्हें मेरे इसी धन्य का इंतजार था। वे मुडे और चल दिए।
    मैं उन्हें मंथर गति से जाते हुए देख रहा था कि पंच काका आ पहुंचे, बोले- ये पागल क्यों आया था। इसकी ज्यादा मत सुना करो। सबके पास ऊल-जलूल बातें करता फिरता है। यह अच्छा किया इसे घर में नहीं बैठाया। इसके घरवाले भी इससे परेशान है। इस से होता कुछ नहीं, इसे करना कुछ नहीं। बस फालतू बातें करता रहता हैं। इसका काम लोगों के दिमाग खराब करना है।
० नीरज दइया 
 

31 जुलाई, 2017

एक तीर : कई निशानें

मारे आदि-आयुध तीर-कमान रहें हैं। समय ने प्रगति की और अनेकानेक आयुधों के इस दौर में हम उन्हें भूल गए हैं। तीखे तीर से राम ने रावण को मारा। वैसे तीर की क्षमता उसकी तीक्ष्णता पर निर्भर नहीं करती है, यह कमाल तो हाथ और अंगूठा दिखाता है। हमारे सामने कोई तीर ताने यह सहनीय है, पर हमें कोई अंगूठा दिखाए.... यह असहनीय है! गुरु द्रोण के समय से ही अगूंठा देखने की हमारी आदत बिगड़ी हुई है। अब तो शिष्यों ने बिना मांगे ही गुरुओं को अगूंठें देने आरंभ कर दिए हैं। अगूंठा देना और दिखाना भी एक कला है, ठीक वैसे ही जैसे कि तीर चलाना और तीर झेलना कला है।
गुरुजी भी कम नहीं, वे भी अब अगूंठा मांगते नहीं, बहुत हो चुका वे अब सरेआम अगूंठा-छाप घोषित करते हैं। कल की ही बात लो, भरी सभा में गुरुजी ने बोलते हुए सवाल दागा- ‘लिंचिंग’ का मतलब किसी को पता है? सारे चुप! यह लिंचिंग बीच में कहां से आ गया। वे बोल तो ब्लीचिंग पाउडर पर थे और बीच में उनका अहम जाग गया। अपनी कुटिल मुस्कान के साथ वे बोले- मुझे पता है, आपको नहीं पता होगा। आप जब इस देस में रहते हुए भी अगला-पिछला कुछ जानते नहीं, फिर अगूंठा-छापों की श्रेणी में आ जाओ। सुनिए हाल ही के दिनों में भीड़ के हाथों बढ़ रहे क़त्ल के लिए लिंचिंग शब्द प्रचलन में आया है। हाय जुनैद, इतनी बड़ी बात और ये सब नहीं जानते!
वर्षों पहले गीतकार मजरुह सुलतानपुरी ने गुरुजी की किसी बात पर लिखा था- ‘कहीं पे निगाहें, कहीं पे निशाना’। नाजुक दिलों को ऐसे और वैसे तीर कुछ ज्यादा ही घायल करते हैं। इस तश्वीर का दूसरा पहलु यह भी है कि रोजाना ऐसे अगूंठे देखने वालों का दिल मजबूत हो जाता है। वे कठोर, निष्ठुर ऐसे घायल नहीं होते। कोई घायल बाद में गुरुजी के बारे में कह रहा था कि उनका मन था, मंच पर जाकर कुछ ऐसा पूछे जिसका जबाब गुरुजी के गुरुजी को भी नहीं आता हो। माना यह उनकी भ्रांति थी पर वे मन मार कर रह गए। ऐसा अगर तीर चल भी जाता तो क्या होता? गुरुजी का स्वभाव रहा है कि ऐसे पथभ्रष्ट चेलों को सार्वजनिक रूप से बदनाम कर दो। ऐसे नालायक चेलों की भ्रूण-हत्याएं गुरुजी बखूबी कर डालते हैं। ऐसे बांसों को वे जड़-मूल से नष्ट करने की कला में पारंगत हैं, इसलिए बांसुरी वही बजती है जिसके सुर सात होते हैं। कोर्स में आठवां सुर नहीं फिर कैसे कोई नया आलाप ले सकता है। यह निषेध है। विधि सम्मत नहीं।
पक्ष हो या विपक्ष, गुरु हो या शिष्य सभी की यही कामना होती है कि कोई ऐसा तीर मिल जाए जिससे कई निशाने एक साध सध जाएं। इश्यू बनाने पड़ते हैं, ढूंढ़ने पड़ते हैं। अब तो ‘एक साधै : सब सधे’ की तर्ज पर बस एक तीर को साधना चाहते हैं कि अगला-पिछला सब सध जाए। ऐसे साधक अपनी लाठियों को सलामत रखते हुए सांपों को मारने निरंतर अभ्यास करते हैं, पर इसका क्या किया जाए जब उनकी आस्तीनों में सांप पल रहे हो। ऐसे में सलामत लाठियों को खुद पर ही बरसाना होता है।
पंच काका कहते हैं- चोर-चोर मैसेरे भाई, कोई कुछ कहता-करता नहीं। आग लगानी तो सरल है पर बुझानी जरा कठिन। आंदोलन करना तो सरल है पर हिंसा रोकनी जरा कठिन। तीर चलाया तो जा सकता है पर उनके घाव मिटाना जरा कठिन है।
० नीरज दइया 
 

15 जुलाई, 2017

स्कूली-पाठ्यक्रम की जीवन में उपादेयता

    फेसबुक से जुड़ी अनेक कहानियां है। मैं एक छोटी-सी कहानी साझा करता हूं। जिन्हें कभी मैंने पढ़ाया था, वर्षों बाद फेसबुक की दुनिया में वे अनेक छात्र-छात्राएं मुझे मिले। यह जया की कहानी है। उसने अपने स्कूल-टाइम के टीचर यानी मुझ से एक सवाल किया- “सर, ये जो आपने हमें पढ़ाया था... साइन-कोस-टेन... वगैराह-वगैराह... वो हमें यूज कब करना है?” प्रश्न बड़ा गंभीर है कि गणित या फिर अन्य विषयों का स्कूली पाठ्यक्रम हमारे भविष्य के जीवन में कितनी उपादेयता रखता है। अगर कोई पाठ्यक्रम आगे के जीवन में उपादेयता नहीं रखता है तो उसके पीछे हम सुनहरा बचपन और युवावस्था को कोई बोझिल बनाते हैं?
    सभी शिक्षकों की मजबूरी होती है कि उन्हें पाठ्यक्रम पूरा करना होता है। जो पाठ्यक्रम में है, जैसा पाठ्यक्रम में है उन्हें उसे पढ़ाना होता है। नौकरी का असूल है कि दिया हुआ काम करो। कोई ऐसा-वैसा सवाल मत करो। पाठ्यक्रम निर्माण और ऐसी अनेक गंभीर बातें बड़े-बड़े नेताओं और शिक्षाविदों के बस की बातें हैं। उसे कोई गांव का या शहर का सामान्य शिक्षक नहीं समझ सकता। मैं भी जब विज्ञान-विद्यार्थी के रूप में स्कूल-कॉलेज में पढ़ रहा था, तब मेरे लिए भी यह रहस्य था- ‘हम क्यों पढ़ रहे हैं? यह हमारे आगे के जीवन में कब काम आएगा।’ मैं शिक्षक बनने का प्रशिक्षण ले रहा था, तब भी मन में ऐसे अनेक सवाल आते थे। सवालों का होना एक अच्छे अध्येता की निशानी है। ऐसे मेरे सवालों का जवाब मैंने खोजने और पूछने का प्रयास किया। कुछ विषयों और पाठ्यक्रम के कुछ हिस्से के बारे में तो कुछ बातें ठीक लगी पर इस सवाल का पूरा जबाब किसी ने नहीं दिया, कहीं नहीं मिला। बहुधा तो मेरे शिक्षक मेरे सवाल का जवाब ही अपने कुछ सवालों में देते थे। और उन दिनों कभी ऐसे जबाब मिलते थे कि मेरी समझ में नहीं आया था। अब भी मैं यदि अपने अनुभव से जवाब देने का प्रयास करूंगा तो वह अंतिम जबाब होगा ऐसा नहीं कह सकता। कुछ आंशिक जबाब ही सही इस बात पर जया के बहाने चर्चा की जानी चाहिए।
    शिक्षक के रूप में शिक्षा-नीतियों और पाठ्यक्रम आदि के बारे में आलोचना नहीं की जा सकती। किसी भी शिक्षक का ऐसा करना गलत है। दूसरे को इस बात से उनका सरोकार है नहीं, फिर इस पर चर्चा कौन करेगा। यह आलोचना नहीं वरन हमारे देश के भविष्य का प्रश्न है जिससे लाखों-करोड़ों की अभिलाषाएं और जीवन जुड़ा है। मुझे लगता है कि स्कूली पाठ्यक्रम के दौरान बच्चे जिस अवस्था में होते हैं वहां उनके माता-पिता, अभिभावकों अथवा शिक्षकों को यह जानकारी होना संभव नहीं कि बच्चा आगे चलकर क्या बनेगा। जब हमें मालूम नहीं विद्यार्थी आगे चलकर क्या करेगा, पाठ्यक्रम में समाहित सारी बातें जीवनोपयोगी हैं। स्कूली पाठ्यक्रम ऐसे विविध वितानों का समुच्चय है जिनके लिए बच्चे से हम उम्मीद करते हैं। यह ठीक किसी बीज में पेड़ होने का सपना देखने जैसा है। ऐसे में बहुत जरूरी है कि उन्हें वह सब कुछ पढ़ाया और सीखाया जाए जिसकी आगे चल कर किसी मार्ग पर उन्हें आवश्यकता पड़ सकती है। यह पहले जैसा सामज नहीं कि लड़की को चिट्ठी लिखनी-पढ़नी आ जाए तो बस हो गई पढ़ाई। आगे जाकर रोटियां बनाने वाली महिलाएं अब केवल रोटियां बनाने वाली नहीं रही हैं। उनकी उम्मीदे, सपने और सरोकार इस देस समाज को प्रभावित करते हैं।
    श्रेष्ठ शिक्षक जीवन पर्यंत शिक्षार्थी बना रहता है। मुझे मेरे शिक्षार्थी होने में गर्व और आनंद है। किसी भी सफल शिक्षार्थी की निशानी है कि उसके पास कुछ सवाल है। जया, त्रिकोणमिति में साइन-कोस-थीटा को बहुत अच्छे से समझ कर, मैंने इतने विद्यार्थियों को पढ़ाया कि वह पूरा अध्याय रट-सा गया है। दैनिक जीवन में त्रिभुज और पूरी त्रिकोणमिति का गहरा अभिप्राय संभव है। केवल तीन भुजाओं और तीन कोण के माध्यम से अनेक गूढ़ अर्थों को समझ सकते हैं। किसी भी विद्यार्थी की असली पढाई अपने पाठ्यक्रम को याद रखना और स्कूली जीबन के संस्कारों का पोषण करना है। किसी का गुण मानना है, किसी को याद रखना और अपने सांस्कृतिक मूल्यों को आने वाली पीढ़ियों को सौंपना ही संसार का नियम है। किसी गृहणी के जीवन में रोटी और सब्जी बनाते समय बेशक गणितीय शिक्षा के आधार-लंब और कर्ण आदि का कोई विशेष अर्थ नहीं होता। घर के बच्चों को पालते समय भी नहीं होता शायद, पर जब वे बच्चे स्कूल जाएंगे तब अर्थ होने लगेगा। अगर माता-पिता ‘साइन-कोस-टेनथीटा’ से परिचित हैं, तो वे बच्चों को संभाल सकते हैं। उनकी मदद कर सकते हैं, कुछ बता सकते हैं। जया तुम्हारे बच्चे इंजिनियन बनेंगे अथवा गणित-विज्ञान पढेंगे, तब थीटा तुम्हारे लिए कुछ काम का होगा। कोई एक आदमी केवल एक काम करता है पर देश में एक नहीं अनेक काम है और उन अनेक कामों की संभावनों से जुड़ी हमारी शिक्षा पद्धति है। स्कूली-पाठ्यक्रम की जीवन में उपादेयता इसी बात पर निर्भर करती है कि यह हमारी सामूहिकता और एकता का प्रतीक है। पूरे देश में समान पाठ्यक्रम इसी बात पर आधारित है।
नीरज दइया


13 जुलाई, 2017

निरे बुद्धू और गूगल बाबा

प्रतियोगिता परीक्षा के बाद बच्चे सवालों पर चर्चा करते हैं- कौनसा सही हुआ, कौनसा गलत। जो हुआ सा हो गया। पर नहीं, इनकों तो मेरे जैसे बुद्धिजीवियों की हालत दयनीय करनी होती है। पेशे से अध्यापक हूं और लेखक-कवि होने का वहम से खुद को बुद्धिजीवी मानने लगा हूं। यह कहने-सुनाने की बात नहीं है फिर भी यहां लिखना पड़ता है कि हम निरे बुद्धू हैं। हम से बड़ी-बड़ी उम्मीदें हैं। यह तो अच्छा हो गूगल बाबा का जो कुछ भी पूछो, जल्दी से बता देते हैं। यह एक गुप्त ज्ञान है। गूगल बाबा ने आधुनिक समाज में गुप्त-ज्ञान को सार्वजनिक ज्ञान की श्रेणी में कर दिया है। बच्चे ने पूछा- ‘तावान’ कहानी के लेखक कौन है? इसके साथ ही उसने चार कहानीकरों के नाम बता कर मेरा मुंह ताका। मुस्कुराता हुआ वह बोला- मुझे नहीं आता था इसलिए मैं प्रेमचंद का नाम देखकर, यही तुक्का चला आया हूं।
गूगल बाबा की जय हो कि तवान कहानी के कहानीकार प्रेमचंद ही हैं। काश! बात यहीं थम जाती तो ठीक थी। पर अगले सवाल से बुद्धिजीवी होने के वहम पर फिर गाज गिरी- ‘तावान’ का मतलब क्या होता है? एक बार फिर गूगल बाबा की जय बोलनी पड़ेगी। लाज रह गई, पर यह पक्का हो गया कि अब बिन गूगल के सब सून है। प्रेमचंदजी सरीखे लेखक भी क्या खूब थे! इतनी कहानियां लिखी कि नाम भी भला अटपटे और कठिन रख छोड़े हैं। बड़ी गलती पेपर-सेटर की है। भला यह भी क्या सवाल हुआ कि फलां कहानी किसकी है, और फलां कहानीकार की कहानी निम्न में से कौनसी? अब ये खामियाजा तो आने वाली पीढ़ियों के साथ-साथ हमको भुगतना होगा।
तावान यानी हर्जना, मुआवज़ा, क्षतिपूर्ति, अर्थदंड आदि शब्द अभी विस्मृति में पहुंचे ही नहीं थे कि हमारे शहर में एक हादसा हो गया। फटाखा गोदाम में हुई दुर्घटना ने इस बुद्धिजीवी के सामने फिर से बड़ी समस्या खड़ी कर दी। जान-माल का बड़ा नुकसान हुआ, इसका गम होने से अधिक दिखाने की कला हमें आनी चाहिए। ऐसी किसी भी घटना से अगर हमारी संवेदनशीलता आहत नहीं हो, तो हम काहे के बुद्धिजीवी? माना कि ऐसी घटना में कोई भरपाई यानी तावान संभव नहीं है। असली दर्द तो उसका है, जिसका घर-संसार उजड़ गया। गलती किसकी थी, कौन जिम्मेदार है, किसको सजा होगी? किसने अपनी ड्यूटी ठीक से नहीं की? यह सब फैसला तो होता रहेगा पर जिसकी जान गई उसका क्या होगा? ऐसी लाशों पर राजनीति और पार्टी की रोटियां सेकने वाले हमारे कितने हमदर्द है? बच्चे बड़े हो गए फिर भी सवाल करते हैं। ऐसे सवाल जिनका जबाब ना तो गूगल बाबा के पास है और ना निरे बुद्धू जी के पास। बच्चा जानना चाहता है कि एक मौत के पच्चीस लाख मुवावजा मांगने वाले ढाई लाख से राजी क्यों गए? यह भी जानना चाहता है कि ढाई लाख या पच्चीस लाख किसी मृतक के परिवार वाला सरकार को दे दे तो क्या उनका घर फिर आबाद हो जाएगा?
पंच काका कहते हैं कि ऐसी मौत की क्षतिपूर्ति संभव नहीं। कोई अर्थदंड ऐसे घावों को भर नहीं सकता। मौत के सामने हम सब लाचार होते हैं। वह किसके हिस्से कब-कहां-कैसे आएगी, इसकी खबर किसी खबरनवीश को भी नहीं होती। वैसे यह खबर है भी नहीं, यह तो परमात्मा का बड़ा व्यंग्य है। हम सब इस व्यंग्य के निशाने पर हैं। किसी का नंबर कभी भी लग सकता है।

* नीरज दइया 
 

10 जुलाई, 2017

कच्चे कान : पक्के कान

ठीक-ठीक इस विषय में कुछ कहा नहीं जा सकता कि कान पकड़ने की परंपरा का आरंभ कब हुआ और किसने किया। आदिकाल से कान दो प्रकार के पाए जाते रहे है। सजीव कान और निर्जीव कान। सभी सजीवों के कान सजीव कहलाते हैं, किंतु निर्जीव कान प्रायः दीवारों के होने के समाचार है। दीवारों के कान होते होंगे, पर आज तक किसी ने देखे नहीं। अनेक प्रमाणों के आधार पर पुष्ट होता है कि दीवारों के कान होते हैं।
    आधुनिक काल में कान को ठोक-बजाकर देखें तो कान की दो किस्में हैं- कच्चे कान और पक्के कान। कहते हैं कि अफसर के कान कच्चे होते हैं। वे किसी भी बात पर जल्दी भरोसा कर लेते हैं। खासकर अपने मेल स्पूनों और फीमेल स्पूनों द्वारा दूसरों के बारे में कही गई बातों को वे आंखें मूंद कर भरोसा कर लेते हैं। कर्मचारी के विषय में शोध के परिणाम आए हैं कि उनके कान पक्के होते हैं अथवा पक्के हो जाते हैं। कर्मचारी जब कर्मचारी के रूप में सेवा आरंभ करते हैं तब उनके कान अधपक्के होते हैं। जैसे ही प्रोबेशन पूरा होता है वे पक्के हो जाते हैं। अफसर के श्रीमुख से आरंभ में कर्मचारी इतना कुछ सुन चुका होता है कि उसके कान पकने लाजमी है। अफसर का काम होता है- कहना और कर्मचारी का बंधा-बंधाया काम है- सुनना। जब अफसर जब बार-बार कहता है तो समझ लिजिए कि साहब के कान कुछ ज्यादा ही कच्चे हो गए हैं।
    अफसर चाहता है कि वह कर्मचारियों के कानों को पकड़ कर रखे। अफिस के कर्मचारी भी भला कहां कम होते हैं, वे भी अफसर से भिन्न विचार नहीं रखते हैं। जब सभी के विचार अफसरी-विचार हो जाते हैं तो कान पकड़म-पकडाई का खेल आरंभ होता है। कौन मूर्ख सीधा सीधा कान पकड़ता है। इस खेल का असूल है कि कान पकड़ा तो जाए पर उसे जरा घुमाकर पकड़ा जाए। प्रत्यक्ष में सीधा-सीधा यह नहीं लगना चाहिए कि कान पकड़ा गया है।
    सीधा कान पकड़ना निगाहों में आ जाता है, घूमाकर पकड़ा हुआ कान निगाहों में नहीं आता। सुनते हैं कि सरकार सभी नौकरीपेशा कर्मचारियों को खूब पगार देती थी और तिस पर सातवां वेतन आयोग भी दे दिया गया है। जनता का मानना है कि सरकारी दामादों के तो व्यारे-न्यारे हो गए। पर कर्मचारियों के श्रीमुख से सुना जा रहा है कि क्या दिया, कुछ नहीं! इधर दिया, उधर ले लिया। वृद्धि के नाम पर बढ़ी हुई पगार देने के साथ ही भरपाई के लिए कर यानी टेक्स से सरकार ने सभी के कान पकड़ लिए हैं। 
    पंच काका कहते हैं कि जब किसी का कान सीधा-सीधा पकड़ना संभव नहीं हो तो दूसरे-तीसरे अथवा चौथे विकल्प पर विचार ही नहीं करना चाहिए। देखिए ना पहले हमारे जमाने में गुरुजी का साप्ताहिक कार्यक्रम होता था- बच्चों के दो-च्यार बार कान पकड़ना और कान के नीचे हाथ जमाना। कभी कभी उनकी मरजी होती तो वे कान घुमाने का प्रयास भी किया करते थे। कान घूमने में सीमा यह थी कि शिष्य की आंखें छल-छला आए और गुरुजी की मुस्कान- जा बैठ बेटा! अब गुरुजी कान पकड़ने और कान के नीचे दो च्यार हाथ जमाने के सपने भी नहीं देख सकते। ऐसे में अफसरों और कर्मचारियों को आचार-संहिता का पालन करना चाहिए। यह जान लें कि भलाई इसी में है कि ये कान-कान खेल बंद ही कर दिया जाए।     
० नीरज दइया

 

02 जुलाई, 2017

राजस्थानी व्यंग्य विधा के परसाई : बुलाकी शर्मा / डॉ. नीरज दइया

डॉ. नीरज दइया प्रख्यात व्यंग्यकार बुलाकी शर्मा के साथ
राजस्थानी के प्रख्यात लेखक विजयदान देथा का कथन था कि बुलाकी शर्मा राजस्थानी का परसाई है। इसका कोई लिखित साक्ष्य नहीं है। मित्रों के बीच यह कथन चर्चा में रहा है। यह अभिधा में की गई कोई टिप्पणी है अथवा व्यंजना में? प्रश्न यहां यह भी किया जाना चाहिए कि क्या केवल दो राजस्थानी व्यंग्य संग्रह- ‘कवि, कविता अर घरआळी’ (1987) और ‘इज्जत में इजाफो’ (2000) यानी 32 व्यंग्य के आधार पर उन्हें परसाई कहना उचित है? माना कि बहुत रचनाएं उनकी प्रकाशित हुई हैं जो संग्रह के रूप में नहीं आ सकी है अथवा अनेक अप्रकाशित राजस्थानी व्यंग्य हैं फिर क्या यह अतिशयोक्ति जैसा नहीं लगता है?
संभवत: यहां अतिशयोक्ति इसलिए नहीं है कि राजस्थानी में व्यंग्य को विधा के रूप में स्थापित करने वालों में बुलाकी शर्मा का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। यह कथन उनके संख्यात्मक अवदान को लेकर नहीं व्यक्त हुआ है वरन इस क्षेत्र में उनके निष्ठा से सतत कार्य को देखते हुए विजयदान देथा ने कहा होगा। यहां मैं अपने हवाले से यह कह रहा हूं कि राजस्थानी व्यंग्य विधा के परसाई बुलाकी शर्मा हैं।
बुलाकी शर्मा ने व्यंग्य संग्रह ‘इज्जत में इजाफो’ के समर्पण में लिखा है- ‘राजस्थानी गद्य में व्यंग्य विधा नै ठावी ठौड़ दिरावणिया सांवर दइया री ओळूं नै’। यहां यह उल्लेखनीय है कि सांवर दइया और बुलाकी शर्मा ने व्यंग्य विधा में महत्त्वपूर्ण कार्य किया किंतु दइया के असामयिक निधन से उनकी व्यंग्य-यात्रा ‘इक्यावन व्यंग्य’ पुस्तक पर संपूर्ण हो गई।
राजस्थानी व्यंग्य विधा में बुलाकी शर्मा से बहुत अपेक्षाएं और उम्मीदें इसलिए भी हैं कि वे हिंदी के भी प्रमुख व्यंग्यकार हैं अत: निश्चय ही उनकी राजस्थानी व्यंग्य-यात्रा बहुत दूर तक जाने वाली है। जिस भांति परसाई ने व्यंग्य को विधा के रूप में स्थापित किया वैसे ही राजस्थानी में व्यंग्य विधा में गंभीरता से कार्य करने वालों में बुलाकी शर्मा का नाम अग्रिम पंक्ति में लिया जाता है।
बुलाकी शर्मा और अन्य व्यंग्यकारों में अंतर है कि शर्मा व्यंग्य की व्यापक प्रवृत्ति और भाषा से परिचित इसलिए रहे कि उन्होंने हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं का अध्ययन-चिंतन किया है। वे व्यंग्य अथवा व्यंग्य कहानी में प्रयोग करने का प्रयास करते रहे हैं। उन्होंने कई सफल प्रयोग शिल्प और भाषा के स्तर पर किए भी हैं। उन्होंने परंपरा को शक्ति के रूप में स्वीकार करते हुए आधुनिकता की दिशा को अपनाया। स्थानीयता और लौकिक सत्यों के साथ वे स्थिति के अनुसार कभी पाठक के पक्ष में और कभी विपक्ष में खड़े होने से गुरेज नहीं करते। उन्होंने अपनी स्थिति सदैव एक जैसी अथवा पूर्वनिर्धारित कभी नहीं रखी। उनमें जीवन के प्रति आकर्षण का भाव है। वे बचपन से लेकर बुढापे तक के जीवन में विनोद और विसंगतियों को ढूंढ़ लेने में सक्षम हैं। ऐसी अनेक विशेषताओं के रहते उन्हें राजस्थानी व्यंग्य के लिहाज से परसाई कहा जा सकता है। वे हिंदी में भी लिखते हैं किंतु हिंदी के संदर्भ में यह उक्ति विचारणीय नहीं है, हिंदी व्यंग्य का क्षेत्र व्यापक है और उसमें एक परसाई हुए हैं। वहां बुलाकी शर्मा को बस बुलाकी शर्मा ही होना है और वे हिंदी व्यंग्य के प्रमुख हस्ताक्षर हैं भी।
व्यंग्यकार के रूप में बुलाकी शर्मा ने सामाजिक कुरीतियों पर प्रहार किए। राजनीति हो अथवा समाज-व्यवस्था उन्हें जहां कहीं गड़बड़-घोटाला नजर आया वे अपनी बात कहने से नहीं चूके। उनके व्यंग्य में उनके अनुभवों का आकर्षण उनकी भाषा और शिल्प में देखा जा सकता है। उन के व्यंग्य में शब्द शक्तियों का जादू इस रूप में साकार होता है कि वे अपने पाठ में कब अभिधा से लक्षणा और व्यंजना शब्द शक्ति का कमाल दिखाने लगते हैं पता ही नहीं चलता और जब पता चलता है तब तक हम उसमें इतने आगे निकल आए होते हैं कि पिछली सारी बातें किसी कथा-स्मृति जैसे हमें नए अर्थों और अभिप्रायों की तरफ संकेत करती हुई नजर आती है। ऐसे में विसंगतियों के प्रति संवेदनशीलता करुणा के रूप में हमारे भीतर प्रवाहित होती है।
‘कवि, कविता अर घरआळी’ शीर्षक व्यंग्य में कथात्मकता है तो संवादों का आनंद भी। यहां घर-समाज में कविता के अवमूल्यन की स्थितियां और विरोधाभास की व्यंजना प्रमुखता से देखी जा सकती है। साहित्य और खासकर कविता को लेकर कवियों के जीवन पर करारा प्रहार है। बुलाकी शर्मा इस सत्य को स्थापित करने में सफल हुए हैं कि कोई व्यक्ति हर समय कवि नहीं हो सकता है अथवा उसे हर समय कवि नहीं होना चाहिए। कवियों के कविताओं को लेकर किए जाने वाले जुल्म पर आपने हिंदी में भी कई रचनाएं दी हैंै।
उनके हिंदी व्यंग्य की बात चली है तो यहां यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि उनकी कुछ रचनाएं राजस्थानी से हिंदी और कुछ हिंदी से राजस्थानी में मौलिक रचनाओं के रूप में प्रस्तुत हुई है। जैसे इसी संग्रह की रचना ‘संकट टळग्यो’ को ‘दुर्घटना के इर्द-गिर्द’ नाम से दस वर्ष बाद इसी नाम से प्रकाशित व्यंग्य संग्रह में संकलित किया गया है। इसी भांति इस संग्रह का ‘ज्योतिष रो चक्कर’ व्यंग्य हिंदी में ‘अंकज्योतिष का चक्कर’ के रूप में प्रस्तुत किया गया है। इसी विषय को लेकर उनके राजस्थानी व्यंग्य संग्रह ‘इज्जत में इजाफो’ का शीर्षक व्यंग्य अखबार के राशिफल का रहस्य उद्घाटित करता है। वे अंधविश्वासों पर प्रहार करते हैं तो उसे कथात्मक उदाहरणों द्वारा पोषित करते हैं।
बुलाकी शर्मा अपने निजी जीवन में सरकारी नौकरी के तौर पर कार्यालयों से जुड़े रहे। अत: उनकी रचनाओं में दफ्तर के अनेक चित्र प्रस्तुत किए गए हैं। ‘दफ्तर’ नामक व्यंग्य में नए अफसर को काबू में करने की एक कहानी है तो ‘दफ्तर-गाथा’ में चार लघुकथाओं के माध्यम से चार चित्रों की बानगी कार्यालय में होने वाली अनियमितताओं की तरफ संकेत करती है। बुलाकी शर्मा के व्यंग्य में समय, समाज और देश छोटी-छोटी घटनाओं-प्रसंगों के माध्यम से अपने बदलते रूप में हमारे सामने आता है। वे बदलते समाज को जैसे शब्दों में बांधते हुए अनेक प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष संकेत करते हैं।
‘नेतागिरी रो महातम’ में बदलती राजनीति और राजनीति से पोषित होते छोटे-बड़े नेताओं को लक्षित किया है तो ‘मिलावटिया जिंदाबाद’ में जैसा कि व्यंग्य के शीर्षक से ही स्पष्ट है कि मिलावट पर व्यंग्य किया है। यहां मिलावट पर व्यंग्य लिखते हुए उन्होंने जिस पाचक घी को लक्षित किया है उससे भी सधे हुए शिल्प में उन्होंने हिंदी में एक व्यंग्य लिखते हुए पाचक दूध को लेते हुए मिलावट और बदलते समय पर करारा प्रहार किया है।
बुलाकी शर्मा को आरंभिक प्रसिद्धि व्यंग्य ‘बजरंगबली की डायरी’ से मिली जो उनके हिंदी व्यंग्य संग्रह ‘दुर्घटना के इर्द-गिर्द’(1997) में संकलित है। इसी व्यंग्य का परिवर्तित-परिवद्र्धित रूप उनके व्यंग्य संग्रह ‘इज्जत में इजाफो’ (2000) में भी देखा जा सकता है। इसी क्रम में यहां उल्लेखनीय है कि उनकी प्रसिद्ध व्यंग्य-कथा ‘प्रेम प्रकरण पत्रावली’ व्यंग्य और कहानी दोनों रूपों में संकलित है। दो विधाएं हैं तो इनके दोनों के अपने अपने अनुशासन भी हैं किंतु बुलाकी शर्मा इन दोनों के मध्य के यात्री हैं। वे अक्सर कहानी में व्यंग्य लिखते हैं और व्यंग्य में कहानी। इस का अनुपम उदाहरण उनका व्यंग्य ‘पूंगी’ है। वे आरंभ तो इसे निबंध के रूप में करते हैं-‘साब अर सांप री रासी एक है, बियां ई दोनां री तासीर ई एकसरीखी हुवै।’ किंतु बहुत जल्द वे इसे साहब और उनके चापलूस कर्मचारी की कहानी में बदल देते हैं। अत: कहना चाहिए कि कहानी उनके अनुभव में है और व्यंग्य उनके विचार में है। उनका यह रूप किसी पाठक को नहीं अखरता। जब उन्हें विधाओं के खानों में स्थिर करने का प्रयास किया जाता है तब भी वे वहां स्थिर नहीं किए जा सकते हैं। कहानी उनसे व्यंग्य-निबंध के प्रभाव से मुक्त होने की अभिलाषा रखती है और व्यंग्य की यह अपेक्षा है कि वे कथात्मकता से मुक्त होकर निबंध में हाथ आजमाएं। फिलहाल वे इन दोनों ही स्थितियों से परे स्वयं को कहानी और व्यंग्य के साझा क्षेत्र में स्वयं को पाते हैं।
कहानीकार मालचंद तिवाड़ी ने लिखा है- ‘पूंगी अपने समग्र प्रभाव में एक बेधक और मारक व्यंग्य होते हुए भी अपनी रोचकता आख्यानात्मकता के बल पर कहानी के शिल्प में बुलाकी शर्मा की गहरी पकड़ का साक्ष्य है। बुलाकी शर्मा की राजस्थानी रचनाएं पढ़ते हुए रूसी कथाशिल्पी अंतोन चेखव और हिंदी के कालजयी व्यंग्यकार हरिशंकर परसाई याद आते हैं तो उसका कारण यही है कि विडम्बना या ‘आयरनी’ की पहचान और उसके रचाव का प्रत्यक्ष विकास बुलाकी शर्मा छोटे-छोटे आख्यानों के जरिये सामने रखते हैं।’
‘इज्जत में इजाफो’ में राजस्थानी भाषा, साहित्य और साहित्यकारों पर व्यंग्य लिखे गए हैं। बुलाकी शर्मा के लेखन-संसार में किसी को कोई माफी नहीं है वह भले वे खुद हों या अन्य कोई। ‘थे चिंता करो’ में राजस्थानी भाषा की मान्यता से जुड़े मसले को लेखक ने तटस्थता से देखा है और जहां कमियां और न्यूनताएं हैं उन पर बेबाकी से जैसे अपना मत भी प्रस्तुत किया है। यह सारी चिंता और चिंतन व्यंग्य के स्तर पर उनका अपनी भाषा और साहित्य के प्रति प्रेम ही है। ‘सियाळो अर साहित्यकार’, ‘गुपतज्ञान’, ‘टाळवीं रचना भेजूं !’ अथवा ‘साहित्य सूं सरोकार’ व्यंग्य हों, वे अपने और समकालीन लेखकों की प्रवृत्तियों को जिस भाषा में एक एक कर उधेडऩा आरंभ करते हैं, वह देखते ही बनता है। व्यंग्य ‘सियाळो अर साहित्यकार’ की इस पंक्ति को देखें- ‘अबकी तो थांरी लाऊ-झाऊ टक्कर में है।  लागै बाजी मार लेसी।’ एक लेखक दूजै रै काळजै रो ऑपरेशन करर साची बात काढण सारू मिठास री सूंघणी सुंघावै।
यहां बुलाकी शर्मा का भाषिक चमत्कार है कि वे पुस्तक का नाम लाऊ-झाऊ और फिर आगे पांगळी जैसे प्रस्तुत करते हुए प्रवृत्ति की सांकेतिकता को जोड़ देते हैं। एक लेखक ने दूसरे लेखक के कलेजे से सच निकालने के लिए मिठास की सूंघनी और ऑपरेशन जैसे घटक व्यंग्य की मूल व्यंजना को जैसे द्विगुणित कर देते हैं। उनकी अन्य व्यंग्य रचनाओं में गुरु-टीचर, पुरातन-नवीन संस्कार, भक्ति-दर्शन-पुराण आदि के साथ बुद्धिजीवियों का चिंतन भी केंद्र में रहा है।
संपादक-कवि नागराज शर्मा सच ही कहते है- बुलाकी शर्मा व्यंग्य विधा के महारथी, राजस्थानी के सारथी और मानव-मनोविज्ञान के पारखी हैं।
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26 जून, 2017

राजस्थानी भाषा और उसका समकालीन साहित्य

डॉ. नीरज दइया
    भविष्यवक्ता भले आने वाले कल के बारे में सकारात्मक अथवा नकारात्मक बातें करते रहें। लोग उन्हें सच-झूठ मानते रहें। किंतु यह सत्य है कि भविष्य में जो भी घटित होता है, वह हमारे वर्तमान का परिणाम होता है। वैसे हमारा वर्तमान भी हमारे बीते कल का परिणाम है। हम भूतकाल से सबक सीखते हुए अपने वर्तमान को गढ़ते हुए भविष्य को संवरते हैं। राजस्थानी भाषा और समकालीन साहित्य के बारे में बात करते हुए हमें इतिहास के कई पन्ने पलटने होंगे। राजस्थानी भाषा और समकालीन साहित्य आज जिस मुकाम पर है उस पर चर्चा होनी चाहिए। साहित्य अकादेमी नई दिल्ली से राजस्थानी भाषा और साहित्य को साहित्यिक मान्यता वर्ष 1974 में प्रदान हो चुकी। आज राजस्थानी भाषा और साहित्य विषय के रूप में उच्च माध्यमिक और विश्वविद्यालय स्तर पर पढ़ाया जा रहा है। राजस्थानी साहित्य के विषय में पहले हिंदी माध्यम से शोध किए जाते थे अब राजस्थानी माध्यम भी स्वीकृत किया जा चुका।
    देश के सभी शिक्षाविद और ‘हिंद स्वराज’ भी नई तालीम बच्चों को उनकी मातृभाषा में दिए जाने पर बल देती है। ‘इंडियन ओपिनियन’ पत्रिका में 19-8-1910 अंक में राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के प्रकाशित लेख ‘शिक्षा का माध्यम क्या हो?’ में लिखा गया है– ‘हम लोगों में बच्चों को अंग्रेज बनाने की प्रवृति पाई जाती है। मानो उन्हें शिक्षित करने का और साम्राज्य की सच्ची सेवा के योग्य बनाने का वही सबसे उत्तम तरीका है। हमारा ख्याल है कि समझदार से समझदार अंग्रेज भी यह नहीं चाहेगा कि हम अपनी राष्ट्रीय विशेषता, अर्थात परम्परागत प्राप्त शिक्षा और संस्कृति को छोड़ दें अथवा यह कि हम उनकी नकल किया करें। इसलिए जो अपनी मातृभाषा के प्रति चाहे वह कितनी ही साधारण क्यों न हो इतने लापरवाह हैं, वे एक विश्वव्यापी धार्मिक सिद्धान्त को भूल जाने का खतरा मोल ले रहे हैं।’ मातृभाषा के महत्त्व को लेकर वे अनेक स्थलों पर हमें जागृत करते रहे। मसलन फरवरी, 1916 में काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के उद्घाटन समारोह में उन्होंने कहा– ‘इस महान विद्यापीठ के प्रांगण में अपने ही देशवासियों से अंग्रेजी में बोलना पड़े, यह अत्यन्त अप्रतिष्ठा और लज्जा की बात है। ….. मुझे आशा है कि इस विश्वविद्यालय में विद्यार्थियों को उनकी मातृभाषा के माध्यम से शिक्षा देने का प्रबंध किया जाएगा। हमारी भाषा हमारा ही प्रतिबिम्ब है और इसलिए यदि आप मुझ से यह कहें कि हमारी भाषाओं में उत्तम विचार अभिव्यक्त किए ही नहीं जा सकते तब तो हमारा संसार से उठ जाना ही अच्छा है। …… यदि पिछले पचास वर्षों में हमें देशी भाषाओं द्वारा शिक्षा दी गई होती, तो आज हम किस स्थिति में होते! हमारे पास एक आजाद भारत होता, हमारे पास अपने शिक्षित आदमी होते जो अपनी ही भूमि में विदेशी जैसे न रहे होते, बल्कि जिनका बोलना जनता के हृदय पर प्रभाव डालता।’
    समकालीन साहित्य के रचनाकारों की शिक्षा गांधीजी ने जो संकेत दिया ‘देशी भाषाओं द्वारा शिक्षा दी गई होती’ यानी राजस्थानी में दी गई होती तो विकास की दूसरी तश्वीर सामने होती। यह साधारण बात नहीं है कि ‘राजस्थानी’ भाषा को संवैधानिक मान्यता नहीं है, और यहां की बड़ी त्रासदी यह भी है कि प्राथमिक शिक्षा का माध्यम हिंदी-अंग्रेजी है। आजादी के इतने वर्षों के बाद भी अपनी भाषा, साहित्य और संस्कृति की जड़ों से कटते इस समाज की तरफ ध्यान नहीं दिया गया है। जब कि राजस्थानी समाज का ऋण पूरे हिंदी भाषा-साहित्य और देश के निर्माण में सर्वविदित है। हमारा हिंदी साहित्य राजस्थानी भाषा-साहित्य की नींव पर व्यवस्थित हुआ है। यह कोई अतिश्योक्ति नहीं कि बिना राजस्थानी के हिंदी आधी-अधूरी है। आचार्य शुक्ल ने आदिकाल को जिन रचनाओं के आधार पर वीरगाथाकाल नाम दिया, वे अधिकांश राजस्थानी की हैं। हम शेष रचनाओं को यदि छोड़ भी दें तो एकमात्र ‘पृथ्वीराज रासो’ के बल पर राजस्थानी भाषा-साहित्य की प्राचीनता, विशालता और विविधता के विषय में कोई संशय नहीं होना चाहिए है। भक्ति काल में मीरा पदावली और वेलि क्रिसन रूकमणी भी राजस्थानी भाषा-साहित्य के पक्ष में अकाट्य प्रमाण है। इसके अतिरिक्त भी अनेक अप्रकाशित, प्रकाशित रचनाएं इस संदर्भ में उल्लेखित की जा सकती है।
    डिंगळ की श्रेष्ठ रचनाओं में पृथ्वीराज राठौड़ जिन्हें पीथळ कहा जाता था की कृति ‘वेलि क्रिसन रूकमणी री’ के प्रसंग की चर्चा में ‘मुंहणोत नैणसी की ख्यात’ में भी उल्लेख मिलता है। पीथळ और अकबर के संबंधों को इन पंक्तियों में देखा जा सकता है- ‘पीथल सूं मजलिस गई, तानसेन सूं राग,/ रीझ बोल हंस खेलबो, गयो बीरबल साथ।’ डॉ. एल. पी. तैस्सितोरी ने राजस्थानी भाषा-साहित्य के विषय में बहुत कार्य किया वह और प्राचीन पांडुलिपियां यह सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है कि राजस्थानी भाषा-साहित्य का गौरवमयी अतीत रहा है। जैन साहित्य और विभिन्न संप्रदायों के साहित्य का आकलन भी राजस्थानी के पक्ष में जाता है। राजस्थानी के एक विद्वान ने आदि राजस्थानी की संकल्पना को वैदिक साहित्य से जोड़ते हुए अनेक प्रमाणों का उल्लेख किया है। इतना सब कुछ होने के बाद भी राजस्थानी को हम हिंदी की उपभाषा और बोली के रूप में पढ़ते आए हैं।
    आज राजस्थानी एक संपूर्ण भाषा है। अपनी भाषाई मान्यता के विषय में राजस्थानी के पक्ष में यह बात स्पष्ट हो चुकी है कि भाषा वैज्ञानिक आधार पर इसे मान्यता मिलनी चाहिए। देश हित और हिंदी हित की बात करते हुए जिन्हें हिन्दी के चिन्दी-चिन्दी होने की चिंता है, उन्हें इसके इतिहास को भी जानना चाहिए। हिंदी प्रदेशों की हिंदी बोलियों के विषय में मतभेद हो सकते हैं किंतु यह सत्य है कि राजस्थान के एकीकरण के समय राजस्थानी ने देश हित में हिंदी के पक्ष में अपना बलिदान दिया है। आज हिंदी इतनी मजबूत और वैश्विक भाषा है कि प्रत्येक राजस्थानी इसे राष्ट्रभाषा के रूप में स्वीकार करता है। हिंदी को राष्ट्रभाषा मानते हुए भी अगर राजस्थानी मातृभाषा की मांग जायज नहीं है, तो हिंदी समर्थकों को सभी मातृभाषाओं का विरोध करना चाहिए। संविधान में जिन भाषाओं को पूर्व में आठवीं अनुसूचि में शामिल किया गया है वे मानक यदि आज भारत की अन्य क्षेत्रीय भाषाएं पूरे करती हैं तो उन्हें भी जोड़ा जाना तर्कसंगत होगा अन्यथा पूर्व में जोड़ी गई भाषाओं को भी हिंदी के हित के मुद्दे पर पृथक कर दिया जाना न्याय संगत होगा?
    रवीन्द्रनाथ टैगोर, पं. मदन मोहन मालवीय, जॉर्ज अब्राहम ग्रियर्सन, डॉ. एल.पी. टैसीटोरी, डॉ. सुनीति कुमार चाटुर्जी, राहुल सांकृत्यायन, झवेरचंद मेघाणी, काका कालेलकर से लेकर कन्हैयालाल सेठिया जैसे विद्वान राजस्थानी को एक स्वतंत्र तथा बड़े समुदाय की समृद्ध भाषा मानते रहे हैं। राजस्थानी की अपनी खुद की बोलियां हैं। किसी भी भाषा का शृंगार बोलिया हुआ करती हैं। अंगेजी राज के विरूद्ध आवाज उठाने वाला कवि राजस्थान का राजस्थानी भाषा का है। याद करें 1857 के जन विद्रोह को जिस पर राजस्थानी कवि बांकीदास की पंक्तियां- ‘आयौं इंगरेज मूलक रै ऊपर, आहंस खेंची लीधां उरां...’ ऐसे अनेक प्रमाण है जिससे राजस्थानी भाषा के रूप प्रतिष्ठित होती है। राजस्थानी भाषा की मान्यता का प्रस्ताव केंद्र सरकार के पास राजस्थान सरकार द्वारा वर्षों हुए भिजवाया जा चुका है।
    राष्ट्रीय भावना में अपनी आन, बान और शान के लिए विख्यात राजस्थान का यह अद्भुत साहस और धैर्य है कि वह राजस्थानी भाषा की मान्यता के लिए प्रतीक्षारत है। राजस्थानी को गांधी जैसा कोई सपूत नहीं मिला जिसने अपनी मातृभाषा गुजराती को एक संबल दिया और आज गुजराती देश की प्रमुख भाषाओं में शामिल है। राजस्थानी की लिपि देवनागरी होने की बात करने वाले वाले मराठी और नेपाली अथवा संस्कृत के विषय में कोई संदेह क्यों नहीं करते हैं। दूसरी तरफ यह भी त्रासदी है कि यदि राजस्थानी का अपना स्वतंत्र अस्थित्व नहीं है तो हिंदी के समानांतर इसे प्रयुक्त किए जाने की स्वतंत्रता क्यों नहीं है।
    समकालीन राजस्थानी के विषय में कहा जा सकता है कि भारतीय भाषाओं में राजस्थानी को पृथक कर यदि साहित्य की बात की जाएगी तो हमें बहुत सी विशेषताओं से वंचित होना पड़ेगा। राजस्थानी के समृद्ध लोक साहित्य और सांस्कृतिक वैभव से लकदक आधुनिक साहित्य की इस पूरी यात्रा में अनेक मुकाम है। यहां यह भी रेखांकित किया जाना आवश्यक है कि बिना राजकीय संरक्षण केवल लेखकीय उत्साह और मातृभाषा के प्रति अपरिमित प्रेम का यह उदाहरण है कि राजस्थानी का समकालीन साहित्य ध्यानाकर्षण का विषय है। यहां कुछ विधाओं पर संक्षेप में चर्चा करने से पूर्व स्पष्ट करना होगा कि इस आकलन में अनेक रचनाएं और रचनाकार स्थानाभाव और तत्काल स्मरण में नहीं आ पाने से रह जाते हैं तो उनका महत्त्व कम नहीं हो जाता। उनका अपना महत्त्व और अवदान भी उल्लेखनीय है और रहेगा।
    राजस्थानी का प्राचीन गद्य साहित्य ही भारतीय भाषाओं में गद्य साहित्य का प्राचीनतम प्रमाण है। आधुनिक काल में गद्य का पहला प्रारूप सूर्यमल्ल मीसण की रचना ‘वंश भास्कर’ में देखा जा सकता है। साहित्य अकादेमी ने इस विशालकाय ग्रंथ का प्रकाशन भी किया है। कुछ गद्य की विधाओं और कविता की चर्चा यहां अपेक्षित है।   

उपन्यास
गद्य साहित्य की विधाओं में उपन्यास का महत्त्व सर्वविदित है। शिवचंद्र भरतिया के ‘कनक-सुंदर’ (1903) से आरंभ हुई इस यात्रा में श्रीनारायण अग्रवाल का ‘चम्पा’ (1925) और श्रीलाल नथमल जोशी का ‘आभै पटकी’ (1956) उपन्यास के आरंभिक रूप को दर्शाते हैं। अब तक सौ से अधिक उपन्यासों का प्रकाशन राजस्थानी में हो चुका है। मेवै रा रूंख (अन्नाराम ‘सुदामा’), उड जा रे सुआ (शांति भारद्वाज ‘राकेश’), घराणो (अब्दुल वहीद ‘कमल’), सांम्ही खुलतौ मारग (नंद भारद्वाज), जूण–जातरा (अतुल कनक), गवाड़ (मधु आचार्य ‘आशावादी’) आदि अनेक अनेक उपन्यास चर्चित रहे हैं। नंद भारद्वाज, अन्नाराम सुदामा और यादवेंद्र शर्मा आदि के उपन्यासों का हिंदी अनुवाद भी उपलब्ध है। अन्नाराम सुदामा, यादवेन्द्र शर्मा ‘चन्द्र’, बी. एल. माली ‘अशांत’, पारस अरोड़ा, करणीदान बारहठ, देवकिशन राजपुरोहित, देवदास रांकावत, मधु आचार्य ‘आशावादी’ और नवनीत पाण्डे आदि अनेक राजस्थानी के चर्चित उपन्यासकार हैं।

कहानी
आधुनिक राजस्थानी कहानी भारतीय भाषाओं में अपना विशेष स्थान रखती है। लोककथा और बात से आरंभ हुई आधुनिक कहानी के विकास की बात करें तो शिवचंद्र भरतिया राजस्थानी के पहले आधुनिक कहानीकार कहे जाते हैं। आपकी कहानी ‘विश्रांत प्रवासी’ (1904) से आरंभ हुई इस यात्रा में गुलाबचंद नागौरी, मुरलीधर व्यास ‘राजस्थानी’, नानूराम संस्कर्ता, नृसिंह राजपुरोहित, बैजनाथ पंवार, रामेश्वरदयाल श्रीमाली, अन्नाराम सुदामा,  सांवर दइया अर यादवेन्द्र शर्मा ‘चन्द्र’ तक पहुंचते पहुंचते कहानी ने भारतीय भाषाओं में अपना विशिष्ठ स्थान बना लिया है। विजयदान देथा ने जन जन में बिखरी लोककथाओं के लिपिवद्ध कर संकलित किया वहीं आगे चलकर लोककथाओं को अपने शिल्प में ढालते हुए साहित्यिक स्वरूप भी दिया। उल्लेखनीय है कि बिज्जी की ख्याति लोककथाओं के लिए है। चश्मदीठ गवाह (मूलचंद ‘प्राणेश’), जमारो (यादवेन्द्र शर्मा ‘चंद्र’), अधूरा सुपना (नृसिंह राजपुरोहित), एक दुनिया म्हारी (सांवर दइया), माटी री महक (करणीदान बारहठ), मरदजात अर दूजी कहाणियां (बुलाकी शर्मा) और सुन्दर नैण सुधा (रामपाल सिंह राजपुरोहित) जैसे कहानी संग्रहों से कहानी का विकास देखा जा सकता है। कहानी के इस विकास में रामेश्वरदयाल श्रीमाली, मनोहरसिंह राठौड़, भंवरलाल भ्रमर, मोहन आलोक, मदन सैनी, सत्यनारायण सोनी, रामस्वरूप किसान, दिनेश पांचाल, मीठेश निर्मोही, देवकिशन राजपुरोहित, माधव नागदा, नंद भारद्वाज, मंगत बादल, मधु आचार्य ‘आशावादी’, मनोज स्वामी, कन्हैयालाल भाटी, निशांत, नवनीत पाण्डे, मदनगोपाल लढ़ा, राजेन्द्र जोशी आदि अनेक कहानीकारों का भी योगदान रहा है। महिला कहाणीकारों में लक्ष्मीकुमारी चूंडावत, आनंदकौर व्यास, प्रकाश अमरावत, पुष्पलता कश्यप, कुसुम मेघवाळ और डॉ. जेबा रसीद आदि के नाम उल्लेखनीय है। पच्चीस राजस्थानी कहानीकारों की कहानी कला के हवाले से समकालीन राजस्थानी कहानी की दशा-दिशा को आलोचना पुस्तक ‘बिना हासलपाई’ (नीरज दइया) से देखा-समझा जा सकता है।

नाटक
राजस्थानी के आधुनिक नाटकों की जड़े लोकनाट्यां से पोषित हुई है। आधुनिक उपन्यास-कहानी की भांति नाटक के आरंभ का भी श्रेय शिवचंद्र भरतिया के नाटक ‘केसर विलास’ को है। भगवती प्रसाद दारूका और नारायण अग्रवाल आदि ने भी इस कालखंड में अनेक नाटक लिखे। भरत व्यास, सूर्यकरण पारीक, आज्ञाचंद्र भंडारी, गिरधारी लाल शास्त्री, बद्रीप्रसाद पंचोली, अर्जुनदेव चारण, निर्मोही व्यास, लक्ष्मीनारायण रंगा और ज्योतिपुंज आदि राजस्थानी के चर्चित नाटककार हैं। ‘धरमजुद्ध’ (अर्जुनदेव चारण) और ‘कंकू कबंध’ (ज्योतिपुंज) जैसे नाटक अपने रंगप्रयोग द्वारा सराहनीय माने जाते हैं।

कविता

राजस्थानी कविता के आधुनिक काल में समकालीन कविता तक कविता के पहुंचने के अनेक पड़ाव देखे जा सकते हैं। जागरण काल के कवियों में सूर्यमल्ल मीसण, बांकीदास, शंकरदान सामौर, ऊमरदान लाळस, महाराज चतुरसिंह अर केसरीसिंह बारहठ आदि प्रमुख कवि हुए, जिन्होंने अपनी कविता को जन-जागरण का हथियार बनाया। आजादी की अलख जगाने वाले कवियों में सूर्यमल्ल मीसण की ‘वीर सतसई’ का यह दोहा मातृभूमि पर कुर्बान होने का संदेश आज भी देता है- ‘इळा न देणी आपणी, हालरियै हुलराय। / पूत सिखावै पालणै, मरण बड़ाई माय॥’ यह वीर भूमि राजस्थान के सांस्कृति गौरव का प्रमाण है कि अनेक वीरों ने मातृभूमि के लिए यहां प्राण होम दिए तो स्त्रियों की अस्मिता का जोहर भी इसी धरा पर हुआ।
    आजादी के बाद कवि गणेशलाल व्यास ‘उस्ताद’, सत्यप्रकाश जोशी, कन्हैयालाल सेठिया, गिरधारी सिंह पड़िहार, चंद्रसिंह बिरकाळी, मेघराज ‘मुकुल’, रेवतदान चारण आदि अनेक कवियों की कविताओं में शिल्प और कथ्य की नवीनता मिलती है। ‘लोग कैवै सोने रो सूरज ऊग्यो, पण कठै गयो प्रकाश’ जैसी पंक्तियां लिखने वाले गणेशीलाल व्यास की कविता यात्रा में आजादी से पूर्व और पश्चात की मनःस्थितियों को देखा जा सकता है। राजस्थानी में प्रकृति काव्य के अंतर्गत मनुष्य और प्रकृति के गहरे संबंधों की अभिव्यंजना विविध रूपों में कवि चंद्रसिंह बिरकाली ने ‘बादळी’ और ‘लू’ के माध्यम से की, जिसे पर्याप्त ख्याति मिली है। गुरुदेव रवीन्द्रनाथ तक ने बिरकाली की रचनात्मकता की सराहना की। उदाहरण के लिए यह दोहा देखें- ‘नहीं नदी नाळा अठै, नहीं सरवर सरसाय। / अेक आसरो बादळी, मरु सूकी मत जाय॥’ कवि ने ‘लू’ में यहां की प्राकृतिक विड़रूपता को वाणी दी- ‘काची कूंपळ, फूल-फळ, फूटी सा वणराय। / वाड़ी भरी वसंत री, लूटी लूवां आय॥’ प्रकृति काव्य धारा में नानूराम संस्कर्ता की ‘कळायण’, नारायणसिंह भाटी की ‘सांझ’, सुमेरसिंह शेखावत की ‘मेघमाळ’, उदयवीर शर्मा की ‘सूंटो’ और कल्याणसिंह राजावत की ‘परभाती’ आदि रचनाओं का विशेष महत्त्व है। कवि कन्हैयालाल सेठिया, रेंवतदान चारण आदि अनेक कवियों ने आधुनिक काल में प्रकृति के विविध रूपों को अपनी कविताओं में चित्रित किया। विख्यात कवि कन्हैयालाल सेठिया जीवन पर्यंत राजस्थानी भाषा की मान्यता का स्वर लिए कविता में सक्रिय रहे। आपकी कविताओं में गहन चिंतन और दर्शनिकता राजस्थानी कविता की थाती है। कविता के विषय में सेठियाजी ने लिखा- ‘भाषा री खिमता नै / तोलणै री ताकड़ी है कविता / सबदां रै भारै में / चन्नण री लाकड़ी है कविता।’
    राष्ट्रीय सांस्कृतिक काव्यधारा के अंतर्गत मंचीय कविता और सुरीले गीतों का योगदान रहा। मेघराज मुकुल की ‘सेनाणी’ को हिंदी कविता के बीच राजस्थानी कविता के रूप में पर्याप्त ख्याति मिली। वहीं कन्हैयालाल सेठिया की- ‘आ धरती गोरा धोरां री, / आ धरती मीठा मोरां री। / ईं धरती रो रुतबो ऊंचो, / आ बात कवै कूंचो-कूंचो॥’ ने राजस्थान के गौरव का गुणगान किया। इस धारा को आगे बढ़ाने वाले कवियों में रेवतदान चारण, नारायणसिंह भाटी, रघुराजसिंह हाड़ा, गिरधारीसिंह पडिहार, भीम पांडिया, कल्याणसिंह राजावत, मोहम्मद सदीक, कानदान कल्पित, ताऊ शेखावाटी, भागीरथसिंह भाग्य आदि अनेक कवियों के नाम जुड़ते गए।
    ऐतिहासिक मिथकों को कविता में प्रयुक्त कर समकालीन व्यंजनाओं के लिए ‘बोल भारमली’ (सत्यप्रकाश जोशी) चर्चित कृति रही तो नवगीत के लिए ‘ग–गीत’ (मोहन आलोक) को विशेष ख्याति मिली। कवि मोहन आलोक ने राजस्थानी में लिकरिक छंद के अतिरिक्त सॉनेट भी लिखें जिन पर पर्याप्त ध्यान दिया गया है। सांवर दइया हाईकू और गजल में प्रयोग के साथ अपनी लघु कविताओं के लिए याद किए जाते हैं। कवि अर्जुनदेव चारण ने पौराणिक चरित्रों को लेकर लंबी कविताएं लिखी हैं, जिनमें स्त्रियों के चरित्र में नई व्यंजनाओं की पड़ताल करने का उल्लेखनीय कार्य हुआ है। म्हारी कवितावां (प्रेमजी प्रेम), म्हारो गांव (रामेश्वर दयाल श्रीमाली), अणहद नाद (भगवतीलाल व्यास), आंख हींयै रा हरियल सपना (आईदान सिंह भाटी), आंथ्‍योई नहीं दिन हाल (अम्बिकादत्‍त), मीरां (मंगत बादल) आदि अनेक कविता संग्रह राजस्थानी कविता यात्रा के विविध स्वरों को विकसित करते हुए भारतीय कविता के प्रंगाण में राजस्थानी कविता के लिए पर्याप्त स्थान के अधिकारी हैं। आधुनिक कविता परंपरा में अनेक कवियों और स्वरों का योगदान रहा है जिससे समकालीन कविता की जमीन निर्मित हुई। 
     यहां संक्षेप में कुछ ही विधाओं पर चर्चा हुई है। राजस्थानी साहित्य में अन्य विधाओं में भी खूब कार्य हुआ है एवं अनुवाद के अंतर्गत कई विधाओं की अनेक रचनाओं के परस्पर अनुवाद से भारतीय साहित्य का एक व्यापक वितान सामने आता है। गर्व से कहा जा सकता है कि राजस्थानी साहित्य भारतीय साहित्य परंपरा में अपना अलहदा स्थान रखता है। इस छोटी सी साहित्यिक झांकी में अनेक विधाओं और रचनाकारों का उल्लेख समाहित नहीं है। यहां केवल राजस्थानी भाषा और साहित्य के विषय में इस प्रस्तावना से यह विश्वास है कि राजस्थानी भाषा को मान देने के हमारे आग्रह पर आपकी सहमति साथ जुड़ेगी। आप सभी साहित्य के गुणीजनों से यह अपेक्षा है कि हिंदी के विकास और उत्थान में राजस्थानी भाषा को मान्यता प्रदान की जाती है तो इसके अनेक पक्ष प्रकाश में आ सकेंगे। इन सभी पक्षों से अंततः भारतीय साहित्य और हिंदी साहित्य का विकास होगा। समकालीन साहित्य में युवा पीढ़ी को मान्यता के लिए संघर्ष करना नहीं पड़ेगा तो ऊर्जा सृजन में लगेगी और निश्चय ही भारतीय साहित्य में युवा साहित्य के अंतर्गत अन्य भाषाओं के साथ राजस्थानी का विशिष्ट अवदान रेखांकित किया जा सकेगा। समकालीन युवा साहित्य के पोषण से भविष्य के साहित्य का निर्माण संभव है।
००००

हेलमेट पर निबंध

    कल नासिक महाराष्ट्र से फन्नेखांजी का फोन आया। दुआ-सलाम के बाद उन्होंने अपनी समस्या रखी- एक अच्छा-सा निबंध हेलमेट पर लिख दूं। मैं उनकी इस अदनी सी फरमाइस से हैरान हुआ। पहले तो भाषा का गणित समझा कि वे हेलमेट पर निबंध लिखवाना चाहते हैं, या विषय हेलमेट निबंध का रखा गया है। जिज्ञास मनुष्य की सहजता को छीन लेती है। मेरी जिज्ञासा के रहते मैंने उनसे सवाल-जबाब किए। पूछा- क्या कोई निबंध प्रतियोगिता है? कहां है? कौन करवा रहा है? यह भी कि क्या बोगस सा विषय है, किसने दिया है। ऐसे सारे सवालों के जबाब जानकर पूरी कहानी समझ आई।
    नासिक पुलिस ने ‘हेलमेट’ न पहनने वाले लोगों से सड़क सुरक्षा सप्ताह में एक प्रयोग आरंभ किया। वहां के पुलिस आयुक्त ने टैफिक पुलिस और आर.टी.ओ. के साथ मिलकर एक अनोखी कार्रवाही अंजाम दी। जिसकी वजह से मुंबई के लोग हेलमेट निबंध का गीत गले में लटकाए घूम रहे हैं। बिना हेलमेट के बाइक सवारों को रोक कर कागज, पेन देकर और सीट पर बैठा दिया जाता है। उन की भाषा में निबंध ज्ञान टंटोला जाता है। जिनको निबंध लिखने अथवा बैठ कर इस परीक्षा में हेलमेट पर विचार प्रस्तुत करने में आपत्ति है, उनके लिए पांच सौ रुपए का फाइन रखा गया है।
    हेलमेट पर निबंध लिखने से पांच सौ रुपए बच सकते हैं। इस अनोखी प्रणाली का परिणाम फन्नेखांजी ने बताया कि करीब सवा हजार लोगों ने अपने जरूरी काम को दरकिनार कर निबंध लिखना स्वीकार किया। पांच सौ रुपये से अरुचि भी रुचि बन जाए तो क्या हर्ज है? वहीं कुछ लोग अचंभे में और कई हंसी-खुशी में पुलिस द्वारा उपलब्ध कार्रवाही हेतु कुर्सी-टेबल पर बैठ गए। सवा हजार में से केवल दर्जनभर लोग ऐसे मिले जिन्हें यह कार्रवाही बेकारी लगी।
    आखिरी विकल्प के रूप में चालान काटने को इतेमाल करने वाला यह तरीका वर्तमान परिस्थितों में एकदम माकू ल है। लोगों को भविष्यफल की पर्चियां भी दी जा रही है, जिसमें कुल मिलाकर हेलमेट लगाने की प्रेरणा ही आधार है। हमारे फन्नेखांजी की समस्या यह है कि वे तो अब से हेलमेट लगा कर सफर करेंगे, पर उनके साहेबजादे हेलमेल लगना पसंद नहीं करते। उनका मानना है कि हेयर-स्टाइल बिगड़ जाता है। ऐसे में जाहिर है कि उन्हें जब पकड़ा जाएगा, तो उन्हें फाइन भरना पड़ेगा अथवा निबंध लिखना पड़ेगा। दोनों ही स्थितियां उनके लिए दुखद है। एक तो जेब में रुपए नहीं हो तो क्या करें! फाइन क्या हर रोज भरा करेंगे! रोज रोज फाइन भी कहां से लाएंगे! वे निबंध लेखन में भी जरा तंग हाथ रखते है, लिखने बैठेंगे तो सोचते-सोचते शाम कर देंगे। इसलिए निबंध की नकल जेब में पहले से रख दी जाएगी। ऐसे बात बन सकती है। ऐसे में इस जनसेवा का इतना महत्त्वपूर्ण कार्य मुझे सौंपा गया।
    मैं निबंध लिखने बैठा तो सोचाने लगा- क्या लिखूं, कैसे लिखूं? यह विषय पहले से किसी किताब या गाइड में नहीं मिला, तो मेरी समस्या बढ़ गई। पंच काका की सलाह सदा कारगार होती है। मैंने काका को पूरी स्टोरी खुल कर सुना दी, तो पंच काका बोले- ‘हमारे समय के आठवी पास लड़के-लड़कियां आज के बी.ए.-एम.ए. पास लड़के-लड़कियों से अधिक होशियार होते थे। यहां असल समस्या निबंध लिखने की नहीं, नियम मानने-मनवाने की है। उन्हें बोलो- निबंध के चोंचलों को छोड़ कर, हेलमेल पहन कर सफर सुरक्षित करें।’   
० नीरज दइया

24 जून, 2017

राजस्थानी कविता / अर्जुनदेव चारण / अनुवाद : नीरज दइया

अर्जुनदेव चारण
उमादे  

मारवाड़ में रूठी रानी नाम से विख्यात उमादे जैसलमेर के राजा की पुत्री थी- उसका विवाह जोधपुर के राजा मालदेव से हुआ। विवाह के समय ही जैसलमेर के राजा मालदेव को मारने का षड्यंत्र किया, किंतु मालदेव को पहले ही षड्यंत्र की भनक लग जाती है और वह अपनी चतुराई से बच जाता है। विवाहोपरांत जब पहली रात मालदेव रानी उमादे से मिलने उसके महल पहुंचता है तब वह शृंगार कर रही होती है। राजा को आया देख उमादे अपनी सखी भारमल को कहती है कि मैं जितने तैयार हो कर आती हूं तुम राजाजी की खातरदारी करना। भारमली राजा मालदेव की आवभगत करती है- वह उनको शराब देती है। मालदेव शराब पीते-पीते भारमल को अपनी गोद में बिठा कर शराब पिलाने लगता है। ऐसे समय में उमादे वहां पहुंचती है- वह दृश्य देख उमादे क्रोधित हो जाती है और दीपक को ठोकर से बुझा कर वहां से वापस चली जाती है। उसके बाद वह जब तक जिंदा रही मालदेव से अनबन रखी और रूठी रानी के नाम से विख्यात हुई। वह मालदेव की पहली रानी से उत्पन पुत्र राम को गोद लेती है और जिंदा रही तब तक उसके साथ रही। अपने पहले पुत्र राम को मालदेव ने जोधपुर से निष्कासित कर दिया तो उसके ससुराल वाले उसे “कीरवै” की जागीर दे देते हैं। ताजिंदगी अपने पति से संवादहीनता के उपरांत उमादे को जब मालदेव की मृत्यु का समाचार मिलता है तब वह सती होती है। सती होने से पूर्व दुनिया के समक्ष अपनी पीड़ा प्रकट करती है- “औरतों अपने पति से अधिक समय रूठना मत और दूसरे के पैदा किए को गोद मत लेना, वह अपना कभी नहीं होता।“ प्रीत को तरसती रानी की पीड़ा को प्रकट करती हैं ये कविताएं-
 
(1)

 
जिंदगी के आह्वान में
अक्षरों का महत्त्व नहीं है उमादे
महत्त्व है मात्रा का
जिसके बल पर
सृष्टि रचती है
शब्दों का आवरण
और शब्दों के हिस्से में है-
उनका लघु या गुरु होना।
वह मात्रा ही होती है उमादे
जो ‘ना’र’ (नाहर) को ‘नार’ (नारी) बना कर 

                  
छीन लेती है नाखून और दांत।
किंतु इसमें भी
सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण होती है
वह आधी मात्रा
जो सभी अक्षरों के अर्थ
कर देती है परिवर्तित
और उसी के बल पर
बदल जाते हैं-
अपनी जिंदगी के अर्थ।

तुम
सभी वर्णों को कर वशीभूत
करती रही जद्दोजहद
जिंदगी जीने की
परंतु वह आधी मात्रा
सदैव तुम्हारी पकड़ से बाहर
कोसों दूर खड़ी हंसती रही।
‘पीव’ और ‘प्रीत’ में
सिर्फ आधी मात्रा का ही
होता है अंतराल उमादे 


छंद तो इस आधी मात्रा को
बोलते समय अस्तित्वहीन मान नकार देता है
परंतु मनुष्य जीवन में
यह नाकुछ आधी मात्रा
मनों भार लिए स्थिर रहती है।
बड़े-बड़े गढ़पतियों की औकात
दिल्लगी में बिखरा जाती है
यही नाकुछ आधी मात्रा।

‘रीस’ (क्रोध) और ‘रूस’ (रूठना) का
वजन तो बराबर ही होता है
मात्राएं भी होती हैं एक जैसी
लघु-गुरु-लघु
तो फिर
क्यों है इतना अंतर?
रीस मनुष्य को सदैव
लघु से लघूत्तर बना
खड़ी रहती है अकेली,
रूठने के संग
हमेशा दिखाई देती है- मनुहार
छुप्पम-छुपा का खेल खेलती
झुकने को प्रयासरत
करती हुई स्वयं की ही
मान मर्दना/यह आधी मात्रा
अपनी पूरी जिंदगी में
सातों रंगों को
पकड़ने में प्रयासरत रहती।

रीस तो
सिर्फ एक रंग ई जानती है
दूसरों को
स्वयं के पैरो में झुका कर
होती है खुश,
अपने बड़प्पन का
गर्व पोषित करता
यह लाल रंग
कब गहरा हो कर
बन जाता है किरमिचिया
और अंततः
अंधकार से सूत्र जोड़ता
हो जाता है अदृश्य।
फिर ऐसी आंखें
तुमने तुम्हारे चेहरे पर
क्यों चिपका ली?

झुकने का अर्थ
हार नहीं होता है उमादे!


इस आधी मात्रा के समक्ष
समर्पण
हमें सौंप देता है-
संपूर्ण दुनिया का साम्राज्य।
भारमली तुम्हारी सखी
जानती थी यह तथ्य
उसके पास था
इस आधी मात्रा का
अनमोल खजाना।
तुम्हारे ही तो
संग रहती थी वह।
तो फिर क्यों था
इतना फर्क।
वह प्रीत नगर की
नामचीन अमीर बनी
और तुम?
तुम सिर्फ एक मोती की आशा लिए
जीती रही जिंदगी
जिसकी चमक
समय-सागर में
अंततः उतर ही जानी थी।
तुम्हारे हिस्से तो
प्रीत-खजाने से
एक कण भी नहीं आया उमादे,
रानी होने का मद
तुझे ताजिंदगी
प्रीत की सीढ़ियां
चढ़ने से रोकता रहा।

बड़ा होने के लिए
लघुता का भेद जानना
जरूरी होता है जिंदगी में,
जो लघु होने की
जानता है कला
वही हो सकता है विराट
किंतु जब हम
दो लघुओं के मध्य बैठे गुरु को
दे देते हैं उतना सम्मान
तो यही गुरु
हमें लघु से भी लघूत्तर बना कर छोड़ता है।
इतिहास
काफी बार
इसी तरह से
मजाक करता है
मानवता से।
आने वाली पीढ़ियां
जब इस मजाक का
रहस्य समझ लेती हैं
तभी अक्षरों के बाजार में
उन ढाई अक्षरों का
मूल्यांकन हो सकता है।
समर्पण तो
समान अर्पण है
दोनों पक्षों का
इसलिए
दोनों ही पक्ष
आनंद के अंदर
झुके दिखाई देते हैं
तुम इतनी ऐंठ गई
कि झुकना ही भूल गई उमादे।
अपने अंतिम दिनों
तुम्हारे समक्ष खुला
इस आधी मात्रा का अर्थ
औरतों अपने पति से
अधिक समय रूठना मत
चिता चढ़ने से पहले
यही थे तुम्हारे अंतिम शब्द
यह था पूरे जीवन का सार
कि तुम्हें दिखाई दिए
आगामी सातों संसार
और तुम
जाग्रत करना चाहती थी
आने वाली पीढ़ियों को।
तुमने
अनावृत्त कर दिया
दुनिया की आधी आबादी के समक्ष
झूठ के कठोर दरवाजों में बंद
सच का
अनदेखा अक्श
कि यह आधी मात्रा ही
दुनिया की
पूरी आबादी का
मान वर्धन करेगी।
०००

(2)

 
क्या प्रीत से पगी देह
हो जाती है अबोली?
तो फिर
यह रस
रूठने में
और रूठना क्रोध में
क्यों और कैसे हो जाता है परिवर्तित
तुम्हें पहचानते हुए
मैं पहचानना चाहता हूं उमादे।

प्रीत की जबान
किस प्रकार बंद कर देती है द्वार
कि सिर्फ रूठना ही दिखाई देता है
दिखाई देता है क्रोध
परंतु बहुत दूर
छिपी हुई प्रीत
दुनिया को दिखाई क्यों नहीं देती।
क्या हर बार
ऐसे ही
प्रीत को प्रगट करने के लिए
जाग्रत करनी होगी अग्नि
लपटों का रंग तो
प्रीत के रंग से
बेहद अलहदा होता है उमादे
तो फिर
स्वय़ं को पहचान के लिए
तुमने यह रंग क्यों स्वीकारा?
युगों-युग
आने वाली पीढ़ियों को
सुनाने के लिए एक कहानी?
शायद पीढ़ियां
इसी को इसी बहाने
प्रेम-कथा कहकर पहचानेगी?
छल
सिर्फ छलावा है तुम्हारा जीवन उमादे,
पिता का
पति का
सखी का
और गोद लिए
किसी दूसरे के पुत्र का।
प्रीत को स्वीकारने
खड़े होने की जिद
और ऐसी कठोर सजा?

तुम कितनी बार मरती रही
उसी एक जीवन में
बचाए रखने को
अपनी प्रीत को स्वच्छ
तो फिर
छल करने वाली इस दुनिया में
तुमने प्रीत रचने के स्वप्न क्यों देखे?
प्रीत कहां बसती है
संबंधों के उन तंतुओं के मध्य?
किस प्रकार पहुंचती है वह
अपने उस दूसरे स्वरूप तक?
उन तंतुओं को
अपने से दूर
 

विकसित होने की कल्पना करने वाला
हर बार क्यों मारा जाता है बेमौत?
क्या प्रीत इसी प्रकार फैलती है
एक देही से दूसरी देही तक?
वह स्पर्श
उष्मित होता है या राख कर देने वाला?
या कि होता है
हिमालय से भी बड़ा?
इस विशालता को
चेतनावान बनाने के प्रयास करती जिंदगी
प्रीत की अग्नि को
संपूर्ण सृष्टि को
प्रकाशवान करने का स्वप्न देखती है।

फिर ऐसा क्यों हुआ
कि वह विशालता ले बैठी
तुम्हारे अधर
क्यों उसने पकड़ ली
तुम्हारी गर्दन
क्यों उतर आई गहरे
तुम्हारे अंतस तक
अब यह रहस्य
कौन बताएगा?
भारमली?
या कि मालदेव?
पूछें उस दरवाजे से
कि पूछंे उस दीपक से
जिसे तुमने
पैर की ठोकर से बुझाया और
तुम वापस लौट गई।
उस ठोकर की धमक
यह संसार
आज तक सुन रहा है उमादे
तुमने किसकी जिंदगी में
किया अंधेरा?
मालदेव के महलों तो
उसके बाद भी
सदा-सदा रही
जगमगाहट,
जगमगाती ही रही
भारमली
बिना किसी कांकण-डोर
बिना चंवरी-फेरों के भी
वह राज करने को बैठी
गढ़ जोधांण,
और तुम
‘कीरवा’ की सीमाओं में खड़ी
सहलाती रही अपना मान।
घर तो तुम्हारा था उमादे
परन्तु उस एक ठोकर के बल
बिखर गया वह घर।
उस रात्रि
कपाट रंग-महल के
तुम्हीं ने बंद किए थे
परंतु तुम्हारे भाग्य-कपाट के
हमेशा-हमेशा के लिए
लग गए हांे जैसे ताले
जिनकी चाबियां
न मालूम किस अबूझ कुएं में
ले जाकर गिराई उस रात ने
जो तुम्हारी बैरन बन
आई थी।

‘कीरवा’ की सीमाओं से
जोधपुर बहुत दूर था उमादे
परंतु वह हमेशा
तुम्हारे अपनापे
तुम्हारे भरोसे को
ठोकरें मारता हुआ
करता रहा लहूलुहान।

तुम जब कभी
करती थी याद उस रात को
जो छौंकती रही
तुम्हारे क्रोध को
और अबोलेपन की
वह घुलगांठ
अधिक मुश्किल में घिर जाती।
‘कीरवा’ के छोर पर ही तो
बैठा था चारभुजाधारी
प्रीत को मान देने वाला
राधा का, मीरा का
और लाखों लाख अनाथों का नाथ
तो फिर तुम्हें
वह क्यों याद नहीं आया उमादे?
तुम्हारी यादों में तो
बसता था फकत मालदेव
तुमने उसे
जितना खुद से दूर किया
वह उतना ही
बींधता रहा कलेजा तुम्हारा।
प्रीत में
मान-अपमान कहां होता है उमादे?
यदि होता है मान
तो फिर कहां रहती है प्रीत?
प्रीत की सीढ़ियां चढ़ने की
पहली शर्त है
मान को बिठाए रखना
कभी पूछना राधा से
या फिर मीरा से
आभल को पूछ लेती
या फिर पूछती नागवंती को
‘‘सोए खूंटी तान,
बतलाएं, बोलते नहीं।
कभी पड़ेगा काम,
मनुहार करोगे नागजी।’’
प्रीत के पास तो सिर्फ मन होता है
आंखें कहां होती हैं?
वह तो हमेशा जिंदा रहती है
कबंध-शरीर
शायद इसी लिए अंधी कहलाती है।
तुम्हारी जिंदगी की कामना
सहेजना चाहती थी
प्रीत के पुहुपों की
पहली-पहल सुवास
परंतु तुम्हारे हिस्से
किसने डाल दी
कांटों भरी भारी
यदि नहीं होती भारमली
तो कोई दूसरी होती
तुम्हारे जीवन में
दूसरी का योग
ताजिंदगी बना रहता।

अपने क्रोध में
तुम भूल बैठी
कि तुमने ही तो भेजा था उसे
करने खातरदारी अपने पति की,
एक दासी
कैसे करे खातरदारी राजा की?
रानियों का मान
यह बात
क्या नहीं जानती थी?
क्या तुमने जानी कभी
भारमल की पीड़ा?

अपनी पीड़ा का पर्वत
बड़ा और बड़ा करती रही तुम
और सारा दोषारोपण
भारमल के हिस्से मंड दिया।

तुम दोनों छली गईं
अपनी-अपनी जगह
तुम दोनों को तो
मिल कर करना था प्रतिकार
बचाने के लिए खुद की अस्मिता
अपनी पहचान।
शायद इसी से बच जाता
तुम्हारा और उसका
दोनों का मान
और उस मान के खूंटे
तुम बांध देती
भोग की गंदगी में कुलबुलाते
वहां खड़े उस जीव को
जिसने झूठा हाथी बना कर
खड़ा कर दिया था
आसानंद ने तुम्हारी तुलना में।
‘‘मान रखे तो पीव तज,
पीव रखे तज मान।
दो हाथी बंधते नहीं,
एक ही खूंटे-ठान।।’’
झूठा था कवि
पीव और मान
दोनों को हमेशा चाहिए
एक पहनावा
जिसको पहन कर वे धारण करते हैं
अपना-अपना स्वरूप
पिता-भाई-पति
इनके पास होता है
सिर्फ अपने पैरों में
झुकाने का आदेश
इनके हाथों में होती है
नियमों की ताजा बैंत
परंतु
प्रीत कोई नियम नहीं मानती उमादे।
सड़ाक-सड़ाक-सड़ाक के सरड़ाटे
पड़ते रहते कमर पर
वह जमी हुई लील
उन मानधारियों का यश गाती है
तुमने वहां
मान रखने की जिद क्यों की?
०००००

23 जून, 2017

दाढ़ी रखूं या नहीं

पना निर्णय मैं खुद नहीं ले पाता। मैं जब छोटा था तब भी मेरा यही हाल था और अब जब मैं बड़ा हो गया हूं तब भी मेरा वही हाल है। जो भी मैं करता हूं या जो भी मेरे जीवन में होना होता है वह अपने-आप हो जाता है। मैं खुद कुछ नहीं करता, वैसे जो भी करना होता है, दोस्तों से पूछ लेता हूं। पर पूछना भी किसी समस्या का समाधान नहीं है। क्यों कि हरेक का अपना-अपना नजरिया होता है। लो अब कल की ही बात बताता हूं, मैंने फेसबुक पर मित्रों से पूछा- दाढ़ी रखूं या नहीं? इस छोटे से सवाल के अनेक जबाब आए। किसने क्या जबाब दिए, उन सब नामों को मैं हटा कर मैं आपके समक्ष कुछ मूल उत्तर ही रख देता हूं। एक जैसे उत्तरों को हटा कर यहां कुछ खास ज्ञानियों परम मित्रों के परामर्श को प्राथमिकता दी जा रही है, साथ ही यहां उल्लेखनीय है कि मजाक-मस्ती और स्माइली वगैरह हटा दिए हैं।
- रख लो बहुत सुंदर लगेगी, पर मूंछें भी रखना।
- किस ने कह दिया। ऐसे ही ठीक है।
- जिनको अपनी मर्दानगी पर शक होता है वे दाढ़ी-मूंछें रखते हैं। अब तुम ही सोच लो कि तुम्हें शक है क्या?
- इमरान खान जैसी मूंछे और हल्की दाढ़ी में क्या खूब जमोगे।
- बेवकूफ, तू कहना मान किसी एक्सपर्ट्स से बात कर।
- विटामिन ए, बी, सी और ई की रिच डाइट लें। सब ठीक हो जाएगा।
- फ्रेंच कट का कमाल देखना, सब मुरादें पूरी हो जाएगी।
- चेहरे पर रौबदार मूंछे और सजी संवरी दाढ़ी किसे अच्छी नहीं लगती? तुझे भी अच्छी लगेगी। रख ले, मैंने तो तुझे पहले एक बार बोला भी था।
- एक आम आदमी अपने जीवन के 3500 घंटे सिर्फ दाढ़ी बनाने में व्यतीत कर देता है? टाइम बचाना है तो यही मार्ग उत्तम है।
- केवल दाढ़ी रखना और मूंछे मूंडते रहना।
- सबसे लंबी दाढ़ी का रिकॉर्ड नार्वे के एक व्यक्ति का है। उसकी दाढ़ी 5 मीटर लंबी थी। रिकॉर्ड तोड़ना है क्या?
- ये भी कोई पूछने की बात है। घर की खेती है। जो मन करे कर पुतर।
- अबे यार, तुझे दाढ़ी की क्या जरूरत पड़ गई। अपने पेट को ढंग से देख, तेरे तो पेट में दाढ़ी है।
- दाढ़ी बढ़ाने की वजह से तुम दार्शनिक लग सकते हो। ऋषि-मुनि जैसा लुक मुझे अच्छा लगता है।
- विश्व दाढ़ी और मूंछ प्रतियोगिता में भाग लेने का विचार तो नहीं है तेरा?
- याद नहीं इंडियन एयरफोर्स के एक अधिकारी को सलाह दी गई कि अगर दाढ़ी नहीं रखने दी जाती है तो नौकरी छोड़ दें। क्या तुझे भी अल्लाह का फरमान आया है?
अब आपकी बारी है। आप ही बताएं कि क्या मैं दाढ़ी रखूं या नहीं? आप के मौन का मतलब ना है या ना। मैं अब सारे जबाब लेकर पंच काका के पास चला।
पंच काका ने कहा हैं कि इन सब बातों का एक ही मतलब है। किसी को कोई सवाल मत पूछो। तुम्हारे सवाल का जबाब किसी को नहीं पता है। फेसबुक की बस्ती में तो एक से बड़े एक धुरंधर सलाहकार बैठे हैं। एक चावल मांगोगे तो वे डफोल शंख पूरा ट्रक भर देंगे। बेटा, एक छोटे से सवाल के लिए इतनी माथा-पच्ची करोगे तो फिर जी लिए जिंदगी।
० नीरज दइया

16 जून, 2017

शराबी चूहे और पिनोकियो वाइरस

हने वाले झूठ कहते हैं कि संगत का असर होता है। जब बिहार के चूहों के साथ राजस्थान के चूहों की कोई संगत हुई ही नहीं, फिर बिहारी चूहों की तर्ज पर राजस्थानी चूहे शराब कैसे पीने लगे! काश कि राजस्थान का पड़ौस राज्य बिहार होता, तब संगत भी बात कुछ समझ आती। कोर्ट में वकीलों और न्याय के खेल, वहां के रंग-ढंग निराले है। हमारे सपनों में भी कुछ का कुछ उल्टा-पुल्टा होता रहता है। अभी कल की बात लो, मेरे सपने में मुझे चूहों की पार्टी देखने का सुख मिला। वे आपस में एक दूसरे को पीना-पिलाना कर रहे थे। पार्टी में मैंने देखा कि एक चूहा गीत गा रहा था। गीत भी कौनसा, फिल्म ‘लीडर’ का- ‘मुझे दुनिया वालों, शराबी ना समझो मैं पीता नहीं हूं, पिलाई गई है। जहां बेखुदी में कदम लडखडाए, वो ही राह मुझको दिखाई गई हैं।’ तो एक दूसरे चूहे ने ‘शराबी’ का फिल्म का गीत गाया। यह सच है कि नशा शराब में नहीं होता, अगर होता तो क्या बोलत नाचती नहीं? पीकर पीने वाले नाचते हैं और घरवालों को नचवाते हैं। बाहर पीते हैं तो बाहर वालों को नचवाते हैं।
बिहार में मुख्यमंत्रीजी ने पूर्ण शराबबंदी का फैसला किया तब लाखों लीटर शराब पुलिस ने जब्त की थी। कहते हैं कि करीब नौ लाख लीटर शराब मालखाने में जनता और इंसानों से तो बचा ली, पर कम्बखत इन चूहों का क्या करें.... जिन्होंने इतनी भारी मात्रा में शराब गटका ली। वहां पूरी की पूरी चूहों की बारात इस काम में लगी कि लगभग तेरह महीनों में सवा नौ लाख लीटर अल्कोहल, देशी और विदेशी शराब के क्राईम का माल हजम हो गया। कहने वाले कुछ भी कहें पर सच्चाई यही है कि शराबबंदी फैसले में सबसे अधिक फायदा बिहार के चूहों को हुआ और मुख्यमंत्रीजी ने चूहों के विषय में तो कोई फैसला किया नहीं था।
बात कोई कब तक छुपाएगा। चूहों ने शराब पी और पीकर दौड़े राजस्थान की दिशा में। राजस्थानी भाषा में तो पीने वालों के लिए जुम्ला है- ‘घोड़ै असवार।’ यानी पीया हुआ आदमी घोड़े पर सवार रहता है। वह किसी भी दिशा में गतिशील हो कुछ भी करने की क्षमता रखता है। यह मालला आठ साल पुराना है कि आबकारी निरोधक दल ने एक मकान से बड़ी मात्रा में अल्कोहल जबत की। शराब तस्करी के आरोपी को जब पता चला कि चूहे शराब पी रहे हैं तो उससे रहा नहीं गया, उसने अपने वकील से अदालत में सबूत पेश करने की गुहार की। यह न्याय की मंथर गति है कि जब तक शराब की बोतलें अदालत में पेश होती वे खाली हो चुकी थीं। लिहाजा अदालत के आदेश की पालना हुई और खाली बोतलें पेश की गई।
पुलिस कहीं की हो, यह बात तो पूरे दावे के साथ कही जा सकती है कि डरना उसका काम कभी नहीं रहा है। पुलिस ने सच्चाई जाहिर कर दी कि बोतलों से शराब चूहे पी गए। इसके अलावा शराब की कुछ मात्रा प्राकृतिक कारण से लुप्त हो गई। आबकारी जमादार ने बताया कि बारिश के मौसम में मालखाना में सीलन होने से शराब उड़ जाती है। अदालत ने इन बातों को रिकॉर्ड पर दर्ज कर लिया है।
पंच काका कहते हैं कि भारतीय पुलिस-भर्ती में कोई ऐसी तकनीक को अपनाया जाना चाहिए कि कानून व्यवस्था पुखता रहे और चूहे शराबी नहीं हो। भला चूहों को क्या गम हो गया, जिसे गलत करने के लिए उन्हें पीना-पिलाना पड़े। चूहे हमारी भाषा बोल नहीं सकते। जो बोल सकते हैं उनमें ‘पिनोकियो’ वाइरस का प्रयोग होना चाहिए। जिससे झूठ पकड़ा जा सके। झूठ बोलने वाले की नाक लम्बी होनी चाहिए। हमारे यहां तो लंबी नाक रुतबे का प्रमाण है। लंबी नाक के इस खेल में देखेंगे कि नेताओं की नाक लंबी अधिक होती है या पुलिस-वकीलों की।
० नीरज दइया
 

09 जून, 2017

डुबाने और डूबने वाले

ह मेरी सज्जनता है कि वे घर आए तो मैंने उन्हें ससम्मान ड्राइंगरूम में बैठाया और चाय-पानी का ना केवल भी पूछा बल्कि अपनी सज्जानता को पूरा-पूरा बरकरार रखा। यह मेरी सज्जनता का दंड था कि मैं उनकी कविताई सुन रहा था। वे बोले- ‘रहीमन किताब राखिए, बिन किताब सब सुन। साहित्य गए ना ऊबरे, धोती-चोला-खून।’ मैंने सिर पकड़ लिया और मुस्कुरा कर बोला- ‘मैं तो व्यंग्य लिखता हूं। कविता की समझ जरा कम है। आप समझाएं मतलब क्या है?’ उनकी विजयी मुस्कान थी और मैं पराजित सा उनके यातना-शिविर में सिर झुकाएं सुन रहा था।
पहले तो वे मेरी समझ पर सकुचाए और फिर शर्म-संकोच छोड़ कर जैसे मैदान में उतर गए। वे बोले- ‘रहीम मेरा दोस्त है। यहां मैंने रहीम को संबोधित कर के हिंदु-मुस्लिम एकता को पहले ही शब्द में उजागर कर दिया है। रहीम को किताब रखने का कह रहा हूं क्यों कि रहीम मेरा दोस्त है। आप तो जानते ही हैं कि उनके परिवारों में साक्षरता दर कम है। इससे यह भी हो गया कि विकास के लिए पढ़ना बहुत जरूरी है। बिना किताब के सब कुछ सुना तो जा सकता है पर पढ़ना हो तो किताब को सुनना चाहिए। यहां लिखा तो सुन है पर इस सुन में सुना और सुनाओ का भाव भी भरा हुआ है। रहीम को किताब दो और वह किताब से पाठ याद कर के सुनाएगा। हम सब को यह पंक्ति संदेश देती है कि हम सब को रहीम का पाठ सुनना चाहिए। आगे की पंक्ति तो बहुत सरल है। आप जान ही चुके होंगे कि साहित्य में जो डूब गया समझो गया काम से। वह ऊबर नहीं सकता अर्थात साहित्य से कोई आज तक बाहर नहीं आया। अब देखिए मैं लिखने लगा तो लिखता ही गया हूं, क्या मेरा लिखना रुक सकता है। जो एक बार साहित्य का हाथ पकड़ लेता है तो आगे साहित्य ही उसका हाथ पकड़े रखता है।’
मैंने गर्दन हिला कर अपनी सहमति प्रकट की और ‘धोती-चोला-खून’ के विषय में जानने की जिज्ञासा प्रस्तुत की तब वे अपने आनंद को द्विगुणित करते बोले- यहां धोती गांधी का प्रतीक है। मैं खुद को ना तो संभाल सका और ना ही अपने मुख को रोक सका, बोल पड़ा- गांधीजी का प्रतीत यहां कैसे।
उन्होंने शंका का समाधान करते हुए कहा कि पहली बात तो गांधी जी भी चाहते थे कि राम रहीम पढ़े। एक साथ पढ़े। देश में अखंडता और एकता हो। यह धोती वाली बात साहित्य में डूबने वाले ही समझ सकते हैं। चोला और खून प्रतीक है हमारे देश की गरीबी और संघर्ष का। चोला शब्द के आते ही यहां धोती में ओ की मात्रा और चोला में ओ की मात्रा का सुंदर अनुप्रास देखिए और वैसे भी जब धोती है तो चोला भी जरूरी है। क्या कविता में बिना चोले के नग्नता मैं दिखा सकता हूं और वह भी रहीम के सामने! रहीम के घर पढ़ाई के संदेश में चोला हमारी सभ्तता की निशानी है। खून रहीम का और मेरा-आपका सबका एक है।
यह सब तो ठीक था और इतनी त्रासदी मैं झेल गया पर आगे की बात ने मेरे होश उड़ा दिए। वे महान कवि कह रहे थे कि उन्होंने इस रचना को फेसबुक स्टेट डाला और पंच काका ने लिखा- अच्छी कविता, सधि कविता। साधुवाद। आप कविता को बचाए रख रहे हैं, बाकी तो उसे डुबाने की जुगत में लगे हैं। वे सज्जन कह रहे थे कि उन्होंने वैसे तो फेसबुक पर काका का आभार प्रकट कर दिया फिर मन नहीं भरा तो उन्होंने सोचा कि व्यक्तिशः आभार दे दिया जाए और वे चले आए। मैंने उनका आभार लेकर रख लिया और कह दिया कि काका आएंगे तब दे दूंगा आभार। मेरी सज्जनता धोखा दे उससे पहले मैंने उन्हें विदा कर दिया। इस उच्च कोटी की कविता में मुझे डुबाने और डूबने वाले हे पंच काका! माफ करें, आपका व्यंग्य हर कोई समझ नहीं सकता।
० नीरज दइया

02 जून, 2017

वीआईपी किस्म के लाइलाज भूत !

भूतकाल की कुछ घटनाएं ऐसी होती है कि वे वर्तमान में अपना स्थान भूत बनकर बनाएं रखती हैं। ये घटना भूलाए नहीं भूलती। ये बातें भूत बन कर हम में बसेरा करती है। हमारे और देश के वर्तमान पर छाई रहती है। ये वीआईपी किस्म के लाइलाज भूत है। पहले के भूत तो बातों से भाग जाते थे। और कुछ भूत लातों से अपना रास्ता लेते थे। पर मैं जिन भूतों की बात बता रहा हूं, उसके लिए बातें और लाते दोनों तरीके विफल हो चुके हैं। उत्तर प्रदेश चुनाव के बाद टोप लेबल से माननीय मुख्यमंत्री के नाम की घोषणा हुई। घोषणा के साथ ही उनके अतीत के पन्ने भी अखबारों ने प्रकाशित किए। अतीत के महत्त्वपूर्ण कार्यों में सर्वाधिक प्रभावशाली और उल्लेखनीय बात कि ये भी पहले चाय बेचते थे। चाय बेचना अब कोई सामान्य बात नहीं है। हमारे कुछ नेता जो पहले सब्जी बेचा करते थे और जो कुछ जूते बेचा करते थे, वे सभी अब अपना-अपना परिचय बदल चुके हैं। खासकर यह पंक्ति कि भूतकाल में वे सब्जी अथवा जूते बेचा करते थे। अब इन जैसे शब्दों के स्थान पर सभी ने लिख दिया है कि वे चाय बेचा करते थे। चाय बेचने को राष्ट्रीय कार्य घोषित कर दिया जाना चाहिए। चाय ऐसा भूत बनकर देश पर छा गई है कि चाय का भूत उतर नहीं सकता है। प्रधान सेवक जी का इतना असर है कि उन्होंने गधे की तारीफ करवाई तो गधे को महत्त्वपूर्ण कर के छोड़ दिया। गधों को देखकर बेचारी जनता द्रवित हो गई है। द्रवित अवस्था होती ही ऐसी है कि उस समय कुछ का कुछ हो जाता है। कुछ खबर नहीं होती और सीधे ही बहुत बड़ी खबर आती है। जनता ने जनमत से सिद्ध कर दिया कि चाय बेचना और गधे की महानता के गीत गाना उसे लुभाता है। गधों का बुरा हाल हो गया है कि उन्हें भी भूत बन कर सब का पीछा पकड़ लेना है। गधे पहले भले प्यारे नहीं लगते थे पर अब तो हम सभी उन सभी को बेहद प्यार करते हैं। गधा छोटा हो या बड़ा, पतला हो या मोटा, गुजरात का हो या उत्तर-प्रदेश अथवा राजस्थान का हो सब के सब प्रमोशन पा गए हैं।
देश की आजादी का मतलब है कि सबको पूरी छूट है। शत प्रतिशत छूट। यानी सब कुछ फ्री। बातें फ्री। घातें फ्री। लातें फ्री। सब कुछ फ्री ही फ्री। शुल्क का तो कोई नाम ही मत लो। कीमती हो गए हैं तो बस चाय और गधे। चाय अब पहले वाली साधारण चाय नहीं रही। अन्य पेय पदार्थों को चाहने वाले और पीने वाले भी अब चाय पीना पसंद करने लगे हैं। ऊंटों और घोड़ों की सवारी करने वाले अब गधों की सवारी करने में अपनी शान समझने लगे हैं। समय समय की बात है। जब से चाय में चमत्कार आया है। लोग केवल चाय की नहीं उसे बेचने वालों की उससे भी अधिक इज्जत करने लगे हैं। कुत्तों से बातें और जी बहलाने वाले अब गधों से जी खोल कर बातें करते हैं। पंच काका कहते है कि भैया गधे का भूत इतना बड़ा बन गया है कि हमारे गांव तक पहुंच गया। पिछले दिनों एक शादी में दुल्हे ने घोड़ी पर बैठने से साफ इंकार कर दिया। कहा कि बैठना ही है तो गधी पर बैठूंगा। अगर गंधी नहीं मंगवा सकते तो मेरे लिए एक कप चाय मंगवा दो। मैं चाय पीकर पैदल चल सकता हूं। दुल्हे की बात भला कौन टालता, उसे चाय पिला कर गधी की सवारी स्वीकृत की गई।
- नीरज दइया
 

01 जून, 2017

“टांय टांय फिस्स” व्यंग्य संग्रह की भूमिका

वाह, क्या कहने !
          डॉ. नीरज दइया के पहले व्यंग्य-संग्रह ‘टांय टांय फिस्स’ को पढ़ते समय मेरे जेहन में जो पहला नाम आया वह आलोक पौराणिक का था। वह इसलिए कि आलोक पौराणिक ने अपने पहले ही व्यंग्य-संग्रह ‘नेकी कर कुएं में डाल’ से हिंदी व्यंग्य संसार में अपनी पुख्ता पहचान बनाली। जिस बात पर पाठकों का सर्वाधिक ध्यान गया वह थी उनके अनुभव की परिपक्वता और समकालीन समय के खुरदरेपन को बारीकी से पकडऩे की तथा उसके भीतरी खोखलेपन को उजागर करने की चकित कर देने वाली वैचारिक दृष्टि। स्पष्ट है कि संग्रह चाहे पहला, दूसरा या पांचवा हो, उसका उतना महत्त्व नहीं है, जितना इस बात का कि व्यंग्यकार कितना संवेदनशील, सजग, सूक्ष्म दृष्टि-सम्पन्न और विचारशील लेखक है तथा समय की विसंगतियों की दुखती रगों पर हाथ रखने में कितना सिद्धहस्त है। आलोक पौराणिक को पहले ही व्यंग्य-संग्रह में इतनी लोकप्रियता मिली, इसके लिए ये सभी आधारभूत कारण ही उत्तरदायी हैं।
          आगे बढऩे से पहले यह भी बता दें कि आलोक पौराणिक के उक्त संग्रह की आलोचना भी हुई थी। अर्थशास्त्र के प्रोफेसर होने के कारण उनका अधिकांश व्यंग्य उदारीकरण, वैश्विक बाजार, उपभोक्तावाद, ब्रांड नामों के चलन, पेजर, सेल्यूलर, मैक्डोनाल्ड, सुंदरियों के उत्पादन पुरुष ब्यूटी पार्लर, नीम और हल्दी के पेटेंट जैसे विषयों पर ही केंद्रित रहा। इसलिए शेष भारत के विराट विद्रूप को देखने में तथा उसके लिए आवश्यक शैल्पिक सधाव में वे असमर्थ रहे। साथ ही उनमें दोहराव भी अधिक था।
          व्यंग्य के क्षेत्र में जो ताजातरीन नई पीढ़ी (एक प्रकार से चौथी पीढ़ी) सामने आई है, उसमें सुशील सिद्धार्थ, मधुसूदन पाटिल, श्याम हमराही, संतोष खरे, गिरिराज शरण अग्रवाल तथा रमाशंकर श्रीवास्तव आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। डॉ. नीरज दइया को मैं इसी चौथी पीढ़ी का एक अत्यंत सफल, सजग, सोद्देश्यपूर्ण और गुणवत्ता से युक्त व्यंग्यकार मानता हूं जिनके पास व्यंग्य की एक प्रखर आलोचना-दृष्टि तथा चिंतन की एक समाजशास्त्रीय विचारधारा है। वे जानते हैं कि व्यंग्य एक संस्कारवान तथा गंभीर लेखक के लिए जिम्मेदारी का काम है। उसमें चलताऊ फार्मूलेबाजी, कैरीकेचर या सामयिक अखबारी टिप्पणियों से काम नहीं चलता। उनका व्यंग्य स्वाभाविक है, गढ़ा हुआ नहीं। उसमें तराश है, तल्खी है और एक प्रकार की कौंध है। वे मात्र छींटाकशी करने या मन की भड़ास निकालने के लिए नहीं लिखते बल्कि जरूरत हो तो एक अच्छे व्यंग्य संग्रह के लिए इंतजार भी कर सकते हैं जैसा कि उन्होंने अब तक किया है। उनका लेखन-कर्म तो 1989 में ही प्रारंभ हो चुका था। कविता, कहानी, लघुकथा, अनुवाद, आलोचना और बाल-साहित्य खूब लिखा और जब देखा व्यंग्य लिखने के लिए उनके पास पर्याप्त कौशल, गंभीर चिंतन, सूक्ष्म-सर्वेक्षण, व्यंजना मूलक विशिष्ट जीवन दृष्टि और विद्रूपताओं पर चोट करने का निर्भीक साहस है तभी इस अचूक हथियार को काम में लिया।
          डॉ. दइया के प्रस्तुत संग्रह में चालीस आलेख हैं। आलोक पौराणिक की तरह उनका लेखन कोरे अर्थतंत्र तक सीमित नहीं बल्कि उन्होंने इतने अधिक विषयों पर आधिकारिक रूप से व्यंग्य लिखें हैं कि किसी भी पाठक को आश्चर्य हो सकता है। इसके लिए सीमित नहीं, बल्कि एक चौतरफा व्यंग्य दृष्टि की जरूरत होती है। साहित्य से सीधा जुड़ाव होने के कारण साहित्यिक विसंगतियों पर लिखना स्वाभाविक है पर यह उनके व्यंग्य-लेखन का सिर्फ एक तिहाई भाग ही है। साहित्येतर विषयों में आहार (खान-पान), आयुर्वेदिक चिकित्सा, घरेलू उपचार, ई-युग की छाप (ई-होली का हुड़दंग), काला धन, कानून व न्याय, घरों में बेटों-बेटियों में भेद, चापलूसी, दफ्तरी जीवन, ठग विद्या, डिजिटिलाइजेशन, ढोंगी साधुओं के प्रपंच, दाम्पत्य जीवन, नेता, पुलिस व वकीलों का त्रिकोण, नोटबंदी, पर्यावरण, फिल्में, फैशन, बात में बात का समाप्त न होने वाला सिलसिला, बेरोजगारी, माफिया (खनन, भू व साहित्य क्षेत्र के माफिया) मन का मनचलापन, युवा जगत (कुंवारे-कुंवारियों की पसंद-नापसंद), राजनीति, लक्ष्मी की चकाचौंध, विश्वविद्यालयीय सर्वेक्षण, वीआईपी लोगों की भरमार व उनका नियति, शिक्षातंत्र, सामान्य जन की परेशानियां. सोशल मीडिया, साक्षात्कार तथा सेल्फी से सकारात्मक दृष्टि का प्रादुर्भाव आदि। फिर इन विषयों के उपविषय भी हैं। साहित्य से जुड़े एक तिहाई विषयों (कुल 13 व्यंग्य) और उनके भी उपविषयों को जोड़ लिया जाए तो लगभग 100 विषय सामने आते हैं। यह नीरज की मौलिकता और कलात्मक कसावट का ही परिणाम है कि इतने सारे बिंदुओं को उन्होंने जिस कुशलता, ताजगी व रोचकता, भाषा के सहज प्रवाह तथा पाठकों में निरंतर बढ़ती जाने वाली जिज्ञासा व उत्सुकता के साथ निभाया है, वह उन्हें आज की पीढ़ी के व्यंग्यकारों में विशेष प्रतिष्ठा का स्थान देती है।
          उनकी सफलता के ये कुछ निर्णायक बिंदु हैं- आलोचना से उनको सूक्ष्म दृष्टि व पर्यावलोकन, कविता से संवेदना, कहानी से रोचकता व रंजकता, अनुवाद कर्म से शैल्पिक सधाव, संपादन से चयन-दृष्टि तथा बाल-साहित्य से जिज्ञासा के जो भाव मिले, वे ही तो व्यंग्य-लेखन के महत्त्वपूर्ण घटक हैं। फिर उनको एक अतिरिक्त सौभाग्य भी मिला (जो प्रेम जनमेजय जैसे व्यंग्यकारों को भी नहीं मिल पाया था)। अपने जीवन के पहले 24 वर्ष उन्होंने राजस्थानी व हिंदी के शीर्षस्थ व्यंग्यकार तथा अपने पिता स्वर्गीय सांवर दइया की छत्रछाया में बिताए। व्यंग्य के बीजाणु तो तभी से उनके रक्त में प्रवाहित होने लगे थे। वंशानुक्रम और पारिस्थितिकी के ये बीजाणु जो 1992 में स्व. सांवर दइया के निधन तक आकार ग्रहण करने लगे थे, आज 24 वर्षों बाद यानी सन 2016 के अंत तक इतने पुष्पित और पल्लवित हो चुके हैं कि आज की पीढ़ी के कुछ व्यंग्यकार उनसे ईष्या कर सकते हैं।
          डॉ. नीरज दइया एक बहुश्रुत और बहुपठित लेखक है। वे आज के कथित बड़े साहित्यकारों की तरह केवल स्वयं की पुस्तकों को ही नहीं पढ़ते। साहित्य की अनेक विधाओं में रचना करते समय उन्होंने देश-विदेश के लेखकों की पुस्तकें पढ़ी हैं. उन पर चर्चा की है तथा उनकी व्याख्याएं कर के समीक्षाएं लिखीं हैं। इससे उनका ज्ञान-क्षितिज आज की पीढ़ी के व्यंग्यकारों से कुछ अधिक विस्तृत व विश्वसनीय है।
          चालीस व्यंग्य आलेखों में जिन-जिन के उद्धरण, दृष्टांत या नामोल्लेख हैं, उनमें साहित्यकारों में सूर, तुलसी, कबीर, रहीम व मीरां के अलावा रवींद्रनाथ टेगोर, दुष्यंत, धूमिल, हजारी प्रसाद द्विवेदी, प्रेमचंद व विजयदान देथा, सिद्धांतकारों में डार्विन, गीतकारों में साहिर लुधयानवी व आनंद बक्सी, फिल्म कलाकारों में राजेश खन्ना, शिल्पा शेट्टी व अभिषेक (कलाकार व निर्देशक उड़ता पंजाब), विदेशी लेखकों में केलिफोर्निया विश्वविद्यालय के यू चेन, नेताओं में नरेंद्र मोदी व राहुल गांधी, खिलाडिय़ों में सचिन तेंदुलकर व विराट कोहली तो हैं ही, विश्व स्वास्थ्य संगठन के शोध-सर्वेक्षण, स्पेन के शिक्षातंत्र तथा वैवाहिक साइट के सर्वेक्षण आदि उल्लेखनीय हैं।
          व्यंग्य के क्षेत्र में नीरज ने कई नवाचार किए हैं। इनमें से एक है पंच काका नाम के किरदार का सृजन। अन्य व्यंग्यकारों ने भी जरूरत के अनुसार कुछ किरदार खड़े किए पर वे उन्हें विषयानुसार बदलते रहे और कभी-कभी बिना स्थाई किरदार के भी काम चला लिया। ‘टांय टांय फिस्स’ के इस किरदार में बुद्धि-चातुर्य, आलोचना-दृष्टि तो है ही, कहीं-कहीं दुनियादारी से लेकर दुकानदारी तथा रसूकदारी से लेकर ईमानदारी तक के भाव हैं। पंच काका सही नसीहत देते हैं, समन्वय कराते हैं, अनुभव की बातें करते हैं, कभी-कभी मस्ती के मूड में आ जाते हैं तो जाम छलकाने की, चिढ़ जाएं तो ऊंचा उठाकर धड़ाम से नीचे पटकने की तथा खीझ जाएं तो टांय टांय फिस्स तक कर देने की कुव्वत रखते हैं यानी वे व्यंग्य की हर शाखा के प्रतिनिधि किरदार हैं। कुछ उद्धरण देना ठीक रहेगा।
(अ) सही नसीहत (1) ‘‘जुगाड़ू सम्मान में अपने नाम को जोड़कर क्यों खराब करते हो। जो कुछ तुम्हारी गरिमा है, उसे बचाये रखो।’’ (पृष्ठ- 36) (2) ‘‘सबकी देखो, सबकी सुनो पर करो अपने मन की।’’ (पृष्ठ- 52)
(आ) समन्वय (1) ‘‘भैया विपक्ष, तू अपने नाम को बदल ले यार। ये ‘वि’ का तमगा उतार कर सिम्पल ‘पक्ष’ बन जा। इससे तुझे भी फायदा और हमें तो फायदा है ही।’’ (पृष्ठ- 24), (2) ‘‘दाम्पत्य जीवन के बारे में पंच काका की सलाह है- ‘ज्यादा भटकने, भटकाने से मन की शांति चली जाती है। तो हे भतीजों-भतीजियों काका की सलाह है- भटकना-भटकाना छोड़ कर कुछ ऐसा हो जो गरिमामय हो। हमारे सांस्कृतिक मूल्यों के अनुरूप हो।’’ (पृष्ठ- 46)
(इ) दुनियादारी (1) ‘‘मीठी आलोचना का मीठा फल। कभी चखा हो तो जानो।’’ (पृष्ठ- 22), (2) ‘‘हां, अब जब कोई दूसरा लेखक मिले, उसे उसके सामने बड़ा लेखक बताते रहना। तुम्हारी दुकानदारी चलती रहेगी। समझ गए न।’’ (पृष्ठ- 28)
(ई) व्यंग्य (1) ‘‘प्रजातंत्र में कानून सर्वोपरि होता है। शाकाहारी कानून बना दिया तो परेशानी किसको है। अब शेर राजा भी घास खाएगा। मांस खाने की इच्छा होगी तो छिप कर गुप-चुप खा लेगा। फिर स्टेज पर आकर घास के पास मुंह किए खड़ा होकर शाकाहार का विज्ञापन करेगा।’’ (पृष्ठ- 54), ‘‘साहब है तो क्या हुआ, साहब के भी तो साहब होते हैं। इसलिए कभी मूंछें नीची तो कभी मूंछें ऊंची।’’ (पृष्ठ- 69)
(उ) ऊंचा उठा कर धड़ाम से नीचे गिराना (1) पंच काका ने एक रद्दी कविता के लिए फेसबुक स्टेट पर लिखा- ‘अच्छी कविता, सधी कविता, साधुवाद।’ (पृष्ठ- 71) काका के इस व्यंग्य को समझना उस लेखक के बूते की बात नहीं थी।
(ऊ) टांय टांय फिस्स (1) ‘लेखकों में फर्क बस इतना ही है। प्रेमचंद कम गलती करते थे और तुम हो जो गलतियों की खान हो। तुम्हारे यहां तो दो लाइनें पढ़ो और जांच करो तो टांय टांय फिस्स।’’ (पृष्ठ- 96)
          दूसरा नवाचार व्यंग्य आलेखों की संरचना का है। नीरज ने इस संरचना को त्रिआयामी बनाया है। पहले आयाम में खुद व्यंग्यकार विषमताओं का उद्घाटन, निरूपण और विश्लेषण करते हुए जहां जरूरत हो, चोट करता है। दूसरे आयाम में उस विषय से संबंधित विद्वानों, मनीषियों का या अन्य व्यक्तियों के दृष्टांत सामने रखता है और अंतिम आयाम में पंच काका के टिप्पणियां देकर एक सांगोपांग व्यंग्य रचना का सृजन करता है। रचनाओं का यह स्थाई भाव है। ऐसा अन्य रचनाकारों में कम मिलता है।
          तीसरा नवाचार नए-नए विषयों को उठा कर उन्हें रोचक ढंग से प्रस्तुत करने का है। इनमें ‘ई-होली का हुड़दंग’, ‘सेल्फी लेने के नए आइडिया’, ‘शराबी चूहे और पिनोकियो वाइरस’, ‘वीआईपी की खान भारत’ तथा ‘याद नहीं अब कुछ’ आदि सम्मिलित है। जिस रोचक ढंग से इन विषयों का निर्वाह किया गया है वह नीरज दइया को श्रेष्ठ व्यंग्यकार बनाता है। दो तीन उदाहरण ही दूंगा, शेष तो रोचकता के कारण पाठक पढ़े विना नहीं छोड़ेंगे। (अ) ‘‘जब देश में सब कुछ ‘ई’ ही होता जा रहा है तो ये होलिया को ‘ई’ क्यूं नहीं किया जाए। इसमें हींग लगे ना फिटकरी और रंग आए चोखा वाली बात है। होली में आपको क्या चाहिए- रंग ही तो चाहिए ना। देखिए ना- रंग तो चोखा आ गया। अब क्या चाहिए। होली का ई-कार्ड, ई-गुलाल, ई-रंग, ई-डिस्को, ई-नाश्ता, ई-थाली, ई-साली, ई-घरवाली सब कुछ रेडी कर दिया है।’’ (पृष्ठ- 88-89) इसके आगे सात प्रकार की होलियों का वर्णन है। पढ़कर देखें मजा आ जाएगा। (आ) ‘‘नोटबंदी के बाद जिनके पास ढेर सारे पुराने नोट रह गए, उनकी निर्धनों से इस प्रकार की मनुहारें- ‘ले लो ना भैया, भाई साहब। आप ले लो। बहनजी आप ले लो। अपने खाते में जमा करा दो। जब जी में आए देना। जितना मन करे देना। चलो नहीं देना। जब आपको लगे कि दे सकते हैं, तब देना। सच्ची कसम। हम नहीं मांगेंगे। आपको देकर ये गाना गाएंगे- ‘भूल गया सब कुछ, याद नहीं कुछ।’’ (पृष्ठ- 79) जो विषय ऊपर गिनाएं हैं वे एक-एक से बढ़कर रोचक है। मैं तो बानगी देकर हट जाता हूं ताकि पाठक जिज्ञासा के साथ इस नए अनुभव-संसार से जुड़ सकें।
          अब दो उद्धरणों के साथ अपनी बात समाप्त करूंगा। ये दोनों उद्धरण अपने-अपने प्रकार से महत्त्वपूर्ण हैं। (1) ‘‘पंच काका कहते हैं- ‘खग जाने खग की भाषा, ठग जाने ठग की भाषा। जीवन इस कदर रीतता जा रहा है कि कहीं कोई प्रतिरोध-प्रतिशोध नहीं। चंद सिक्कों की खनखनाहट और कुछ मरे हुए या जीवन से शून्यता की तरफ गति करते शब्दों की खडख़ड़ाहट सुनना ही भारतीयों के जीवन में शेष रहा है।’’ (ठग जाने ठग की भाषा, पृष्ठ- 32), (2) ‘‘काका का सुझाव है कि जो बोल सकते हैं उनमें ‘पिनोकियो’ वाइरस का प्रयोग होना चाहिए। जिससे सच-झूठ को पकड़ा जा सके। भूठ बोलने वाले की नाक लंबी होगी तो क्या? हमारे यहां तो लंबी नाक रुतबे का प्रमाण है। लंबी नाक के इस खेल में देखेंगे कि किसकी नाक अधिक लंबी होती है- नेताओं की या पुलिस की या वकीलों की।’’ (शराबी चूहे और पिनोकियो वाइरस, पृष्ठ- 73)
          और अंत में खुद अपने बारे में। मैंने अब तक 100 से अधिक लेखकों की पुस्तकों की भूमिकाएं लिखीं हैं पर यह पहला अवसर है जब मुझे एक पिता और पुत्र की भूमिकाएं (बेशक अलग-अलग समय में) लिखने का श्रेय मिला है। नेगचार प्रकाशन द्वारा सन 1996 में प्रकाशित देश के अत्यन्त प्रतिष्ठित व्यंग्यकार स्व. सांवर दइया की राजस्थानी पुस्तक ‘इक्यावन व्यंग्य’ की भूमिका मैंने ‘सिरजण री झणकार’ शीर्षक से लिखी थी। यह भूमिका लेखक के मरणोपरांत लिखी गई। बाद में देश के चर्चित व्यंग्यकारों में डॉ. मदन केवलिया व श्री बुलाकी शर्मा ने अपनी पुस्तकों पर भूमिकाएं लिखने का मुझे सौभाग्य दिया। आज जब व्यंग्य के क्षेत्र में अत्यंत सफल व सुयोग्य लेखक डॉ. नीरज दइया की पुस्तक ‘टांय टांय फिस्स’ की भूमिका लिख रहा हूं तो मैं तो आह्लादित हूं ही, मुझे विश्वास है कि पाठक और ज्यादा उत्सुक और आह्लादित होंगे तथा डॉ. दइया से निरंतर व्यंग्य संग्रह लिखते रहने की मांग करेंगे। इत्यलम्। वरिष्ठ कवि-शिक्षाविद
भवानीशंकर व्यास ‘विनोद’
वरिष्ठ कवि-शिक्षाविद
1-स-9, पवनपुरी, बीकानेर- 334003
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टांय टांय फिस्स (व्यंग्य संग्रह) डॉ. नीरज दइया ; अवरण चित्र : के. रवीन्द्र ; संस्करण : 2017 ; पृष्ठ : 96 ; मूल्य : 200/- ; प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन मन्दिर, दाऊजी रोड (नेहरू मार्ग), बीकानेर- 334003 ; ISBN : 818885857-9
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टांय टांय फिस्स (व्यंग्य संग्रह) प्रख्यात साहित्यकार डॉ. मंगत बादल को सादर समर्पित