18 अक्तूबर, 2017

‘पाछो कुण आसी’ - मानवीय संवेदनाओं व हेत-प्रेम के जीवंत चित्र

० सी.एल. सांखला, कोटा
    मनुष्य होने की पहचान उसके अंतस में हेत-प्रेम व मानवीय संवेदनाओं का संचरण ही है। संवेदनाओं की सघनता मनुष्यता को सही मायने में प्रामाणिक बनाती है। अमूर्त भावनाओं का जितना अधिक जुड़ाव जीवन से होता है, वे उतनी ही तीव्रता से कविता में ढलकर समूर्त होने लगती है।
    राजस्थानी कविता और गद्य में अपनी गहरी पकड़ व पैठ रखने वाले नीरज दइया तीन चार दसकों में जो साहित्य सर्जना की है, बेहद मूल्यवान है। कविता संग्रह ‘साख’ (1997), देसूंटो (2000), हिंदी कविता- ‘उचटी हुई नींद (2013) तथा ‘आलोचना रै आंगणै’ (2011), ‘बिना हासलपाई’ (2014) आदि उम्दा रचाव के साक्ष्य हैं। वर्ष 2015 में सर्जना बीकानेर से प्रकाशित राजस्थानी कविता संग्रह ‘पाछो कुण आसी’ की कविताएं मनुष्य की आंतरिक संवेदनाओं व हेत-प्रेम की सशक्त अभिव्यक्ति है।
    वक्त की गिरफ्त में संवेदना शून्य हुए व्यक्ति को जगाने व पुनः संवेदित करने के सद्प्रयत्न में कवि बार-बार ‘हेलो’ करता है-
म्हैं हेलो करूं
हेला माथै हेलो करूं
बारंबार करूं
दिन-रात करूं
मन-आंगणै करूं...
कदैई तो सुणैला थूं। (हेलो)
    कवि की दृष्टि में संवेदनशील मानवीय चेतना से मिलन अथवा अनुभूति ही सही मायने में पुण्य कर्म या सौभाग्य है तथा उससे परे हो जाना ही पाप या दुर्भाग्य है। कवि को यह दृष्टि यथार्थ व आदर्श तथा विज्ञान व अध्यात्म को सुसमन्वित करती है-
        थारी ओळूं में जीवणो
        पुन्न है म्हारो
        थनै बिसरावणो पाप। (पाप-पुन्न)
    मनुष्य जीवन एक सत्य है परंतु मृत्यु उससे भी अधिक ठोस सत्य है। जीवनदात्री बहमाता जब अतिरिक्त जीवन शक्तियां देती हैं तो मुस्कुराती है। साथ ही कवि भी मुस्कुराता है। दोनों जानते हैं कि जीवन से पहले मृत्यु लिखी जा चुकी है-
        जीवण सूं पैली मौत लिखी
        कीं देवण लाग्या जद बैमाता
        मुळक्या
        मुळक देख’र मुळक्यो म्हैं। (बिसरगी मुळकती-मुळकती)
बहुत ही कम शब्दों में कवि नीरज दइया बहुत बड़ी बात कहने में सिद्धहस्त हैं-
        लोग मौको तकै
        ठाह ई कोनी लागण देवै
        काट’र लेय जावै नस। (लोग मौको तकै)
दइया की इन कविताओं में रोमांचक रूपक एवं बिम्ब योजनाएं दृष्टव्य है-
        आंख री छियां-छियां
दीठ लेय’र जावै
सुपना रै देस। (मिनख एकलो कोनी)
    अंतरंग रागात्मकता और मानवीय हेत-प्रेम मनुष्यता की कसौटी भी है जो इन कविताओं में बखूबी देखी जा सकती है-
थारी ओळ्यूं मांय
खदबदीजै काळजो
बरसै बादळां दांई
थारी हूंस... ! (हूंस)
    कवि मानव मन की इच्छा शक्ति तथा क्रियाशीलता को जिंदगी के लिए आवश्यक मानता है अन्यथा जिंदगी व मौत में कोई अंतर नहीं रह जाता। ‘सगळा मारग’ कविता से ये पंक्तियां शायद यही बात कहती है-
जे मिलण री हूंस नीं
कांई करैला संजोग
आपां रै मून रैयां
मर जावैला
सगळा मारग। (सगळा मारग)
    वस्तुतः ये कविताएं अमूर्त भावों की कोरी कल्पनाएं न होकर साधारण आदमी की जद्दोजहद एवं जीवट की मूर्त अभिव्यक्ति है। जिनमें संदेश भी है और प्रेरणाएं भी-
साची ! अंगूठो कैवतां ई
म्हारी आंख्यां साम्हीं आवै- गुरु द्रोण
जे कर लेवूं आंख्यां आडो हाथ
लखावै- गायब हुयग्या म्हारा अंगूठा...। (अंगूठो)
    ‘पाछो कुण आसी’ कविता संग्रह की सभी कविताओं में यूं तो छंद मुक्त कविताएं है जिनमें गद्य कविताओं की बानगी हैं, किंतु सही मायने में ‘गद्य कविताएं’ शीर्षक देकर जो संकलित है उनमें ‘चालो माजी कोटगेट’, ‘इंदरधनुस’, ‘ऊंट’, ‘चकारियो’, ‘भींत’, ‘धीरज’, ‘प्रेम’ आदि कविताएं पढ़ना व समझना जरूरी है। यह एक बेजोड़ संग्रह है। इनमें अतीत के गुणगान नहीं, वरन गुजरे वक्त की जीवंत बची धड़कने साफ सुनाई देती है। यहां समय के साथ कदमताल करती जिंदगी तथा बदलते समय की आबोहवा में सांस लेती मनुष्यता की लिखावट में तृष्णा और भटकाव है तो भविष्य की असल कथाएं कहती कविताएं भी। भले ये कविताएं सम्मोहन पैदा न करती हो, पर यथार्थ की परते खोलती हुई पथराई आंखों को खोलती है तथा सुप्त संवेदनाओं को जगाती है। यहां मानवीय जीवन का अद्भुत व सौम्य चित्रण सहज ही देखने को मिलता है। माटी की सौंधी महक से नहाए हुए शब्द एवं राजस्थानी मुहावरों से सुगुंफित कवितांश व काव्यावलियां पाठक को सहज ही प्रभावित करने वाली है।
पुस्तक-        पाछो कुण आसी
विधा-           राजस्थानी कविता संग्रह
कवि-           डॉ. नीरज दइया
प्रकाशक-     सर्जना प्रकाशन, बीकानेर
कीमत-        140 रिपिया
संस्करण-     2015
पृष्ठ-             96

16 अक्तूबर, 2017

चेखव की बंदूक बुलाकी शर्मा के पास है

० नीरज दइया

मैं सत्यनिष्ठ यह घोषणा करता हूँ कि आज से पहले मैंने कभी कोई संस्मरण नहीं लिखा है। साथ ही यह भी कि जिस व्यंग्य लेखक बुलाकी शर्मा पर संस्मरण लिखना है वे विल्कुल कोरे हैं, अर्थात उन पर कोई संस्मरण लिखा नहीं गया है। अगर आप अपनी रिक्स पर यह पढ़ना चाहते हैं तो आभार। एक संस्मरण क्या मैं इतना प्रतिभावान हूं कि शर्माजी की पूरी जीवनी लिख सकता हूं।
समस्या यह है कि आजकल कोई किसी को महान नहीं कहता। यहां गिव एंड टेक का फार्मूला बेस्ट है। तुम मुझे गोडफादर कहो, मैं तुम्हें जीनियस कहूंगा जैसी अटकलें सर्वविदित है। यह संस्मरण जिस पत्रिका में आप पढ़ रहे हैं, उसके संपादक बड़े खेले हुए खिलाड़ी है। इन्होंने व्यंग्य विधा को और व्यंग्य विधा ने इनको इतना मांजा है कि काले बालों का पूरा मैल उतर कर सफेद-झक्क हो गए। यह संस्मरण मैं जापानी तकनीक से बने एक ओटोमैटिक पेन से लिख रहा हूं। इस पेन में सारे कानून-कायदे सेट कर दिए हैं। लिखते समय अगर मैं तयशुदा पटरी से नीचे उतरा कि पेन लिखना बंद कर देगा। इतना ही नहीं देखिए- सुना आपने सीटी बजी ना।
बुलाकी शर्मा हिंदी और राजस्थानी दो भाषाओं में लिखते हैं। वे तीसकी भाषा अंग्रेजी जानते हैं। पर इतनी नहीं जानते कि साहित्य सृजन कर सकें। ऐसा भी कह सकते हैं कि इसमें उनको इतना कोन्फीडेंस नहीं हुआ कि कुछ लिखने का ट्राई करते। उन्होंने गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के बाल-साहित्य का राजस्थानी अनुवाद किया, जो साहित्य अकादेमी से प्रकाशित हुआ है। इस बीच एक रहस्य यह है कि बे बांगला नहीं जानते और मुस्कुराते हुए कहते हैं कि अनुवाद का अनुवाद किया है।
हम दोनों बीकानेर के मूल निवासी हूं। हमारे पास इसका प्रमाण-पत्र भी है। बिना प्रमाण पत्र के सत्य भी झूठ है। किंतु यह ऐसा सत्य है जिसे हम झूठलाना चाहते हैं। एक बार मैंने किसी अन्य प्रसंग में बुलाकी शर्मा के लिए जब लिखा बीकानेर के साहित्यकार तो बे बोले बीकानेर शब्द हटा दो। साहित्यकार किसी एक शहर का नहीं होता। मुझे भी यह ठीक लगा और मैंने उनके सामने ही बीकानेर शब्द के स्थान पर राजस्थान लिख दिया तब भी उन्हें आपत्ति थी। वे पूरे देश और विश्व के साहित्यकार होना चाहते थे। अब साहित्य अकादेमी का मुख्य पुरस्कार इस बात का प्रमाण है कि वे एक भारतीय साहित्यकार हैं।
भारतीय साहित्यकर बुलाकी शर्मा को अकादेमी पुरस्कार का रहस्य मेरी भाभी जी राधा शर्मा ने खोल दिया है। उनकी धर्मपत्नी यानी बकौल हमारी भाभी साहित्य अकादेमी पुरस्कार इसलिए मिला कि पुरस्कृत पुस्तक के लोकार्पण में वे उन्हें पहली बार साथ ले गए थे। बाकी किताबों का लेखा-जोखा यह है कि वे या तो लोकार्पण करवाते ही नहीं और कभी किसी कृति का लोकार्पण करवाया तो सपत्नीक नहीं पहुंचते। इसके साथ ही भाभी जी ने यह भी बताया कि पुरस्कार समारोह में भी वे उनके साथ दिल्ली गई थीं और भव्य आयोजन में वे उन्हें देख कर मुस्कुरा रहे थे।
बुलाकी शर्मा कवि नहीं है। उनका कोई कविता संग्रह प्रकाशित नहीं हुआ है। खबर है कि वे कविता के पाठक और प्रेमी है। गोपनीय बात यह है कि प्रेम-कविताएं छुप कर लिखते हैं और छुपा कर रखते हैं। सार्वजनीक बात यह है कि कविता-संग्रहों की समीक्षाएं लिखने से परहेज नहीं है। चूंकी वे कभी भी कवि हो सकते हैं क्यों कि कवि कम शब्दों में काम चला लेते हैं और कहानी-व्यंग्य में शब्दों का कुछ अधिक उपयोग करना होता है। इस पीड़ा का आंशिक इलाज उन्होंने व्यंग्य विधा में इस प्रकार किया है कि पहले वे लंबे व्यंग्य लिखा करते थे अब व्यंग्य लिखने से पहले मन में उसे धो लेते हैं और इतना धोते हैं कि धो धो कर उसे छोटे साइज का कर देते है।
‘धोना’ क्रिया के संग वे प्रेम से सपत्नीक संलग्न है। घर में बर्तन और कपड़े भाभीजी धोती हैं और वे व्यंग्य में अपनी मरजी से पूरे देश-दुनिया को धोते हैं। वे अपने चालीस वर्षीय अनुभव के आधार पर शरमाते हुए कहते हैं कि वर्ष 1978 में ‘मुक्त्ता’ पत्रिका में ‘बजरंगबली की डायरी’ से उन्होंने अपने आपको व्यंग्य लेखन मान लिया था। बाद में वे साप्ताहिक हिन्दुस्तान, कादम्बिनी, आजकल, अमर उजाला, ट्रिब्यून, सन्मार्ग आदि अनेक पत्र-पत्रिकाओं में व्यंग्य समेत विविध विधाओं में प्रकाशित हुए। अब उनके पास खुद ऐसी कोई लिस्ट नहीं है कि वे कब-कब कहां-कहां छपे। इसलिए ऐसा कहना ठीक रहेगा कि उनकी सैकड़ों रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं।
बुलाकी शर्मा क्या मैं व्यंग्यकार हरिशंकर परसांई तक को बहुत बाद में पहचान पाया। यह तो भला हो के.पी. सक्सेना और श्वेत-श्याम टेलीविजन युग का कि उन्होंने एक कवि सम्मेलन में ऎखा व्यंग्य पढ़ा। मैंने व्यंग्य क्या सुना, मैं व्यंग्य का मुरीद हो गया। फिर तो शरद जोशी का प्रतिदिन कॉलम पढ़ने लागा। बहुत बाद में पता चला कि मेरे घर जो बहुत सारी पुस्तकें हैं और पिताजी लिखते-पढ़ते रहते हैं वे भी व्यंग्यकार हैं। मेरे स्व. पिता श्री सांवर दइया ने साहित्य के प्रति मेरी प्रतिभा का आकलन मेरी युवावस्था में कर लिया था। वे अपनी रचनाएं मुझे सुनाया करते थे। उनके राजस्थानी व्यंग्य मुझे सुनने पड़ते थे। बाद में उन्होंने मेरा प्रमोशन किया और मैं उनकी रचना का पहला पाठक होने लगा। पेन रुक रहा है। विषयांतर हो रहा है।
राजस्थानी के संदर्भ में हरिशंकर परसांई को दो टुकड़े करने पड़ेंगे। राजस्थानी के हरिशंकर परसांई बुलाकी शर्मा हैं या मेरे स्वर्गवासी पिता सांवर दइया हैं इस बात पर संदेह है। वोट किए जाएंगे तो दोनों को आधे आधे मत मिलेंगे। फिर पेन रुक रहा है। तो आप जान लिजिए कि राजस्थानी में बुलाकी शर्मा के दो व्यंग्य संग्रह ‘कवि कविता अर घरआळी’ (1987) तथा ‘इज्जत में इज्जाफो’ (2000) प्रकाशित हैं। जिनमें 32 व्यंग्य हैं। हिंदी में चार व्यंग्य संग्रह- ‘दुर्घटना के इर्द-गिर्द’ (1997), ‘रफूगीरी का मौसम’ (2008), ‘चेखव की बंदूक’ (2016) और ‘आप तो बस आप ही हैं !’ (2017) प्रकाशित हैं। जिनमें 156 व्यंग्य हैं।
बुलाकी शर्मा कालम राइटिंग के लिए भी जाने जाते हैं। पहले जब धारदार व्यंग्य लिखते थे बहुत डरते थे। सोचते थे कहीं कोई लड़ाई नहीं कर बैठे इसलिए वे छद्म नाम से लिखा करते थे। अब तो यह रहस्य खुल गया कि दैनिक भास्कर बीकानेर में अफलातून नाम से लंबे समय तक ‘उलटबांसी’ लिखने वाले कोई दूसरे नहीं अफलातून शर्माजी हैं। लोगों को उन पर पहले भी शक था। बीकानेर के ‘विनायक’ में ‘तिर्यक की तीसरी आंख’ में भी डरपोक बुकाकी शर्मा लंबे समय तक लिखते रहे। बाद में जब सरकारी सेवा से शर्माजी ने ऐच्छिक सेवानिवृति ली, तब से ‘विनायक’ में तिर्यक का रहस्य भी खोल दिया। रहस्य यह भी है कि सरकारी सेवा से सामन्य ढंग से मुक्त होने पर लोगों को पता चल जाता है कि उम्र साठ हो चुकी है। बस साठ को छूने से दो-चार महीने आपने ऐच्छिक सेवानिवृति का नाटक दिखाया और घर बैठ गए। सरकार के घर बिठाने और खुद के घर में खुद बैठने में तनिक अंतर है। जवान शर्माजी को जो जानते हैं वे यह जान ले। भ्रम में मत रहना काल बाल जो दिखते हैं, सब डाई का कमाल है। लेखा-सेवा वाले सफेद को काले और काले को सफेद करने का मर्म बखूब जानते हैं। इतने वर्षों तक व्यंग्य लिखने वाले शर्माजी अब बहादुर बन चुके हैं। वे अपने नाम से लिखने लगे हैं। दैनिक युगपक्ष में ‘शब्द बाण’ कालम उनके नाम से प्रत्येक रविवार पढ़ा जा सकता है।
पहले बुलाकी शर्मा बड़े आकार के व्यंग्य लिखा करते थे आजकल व्यंग्य का आकार कालम के चक्कर में छोटा करते गए हैं। कहना चाहिए कि तलवार और गुप्ती का काम वे अब कटार और चाकू से निकालने का फार्मूला जान गए हैं। वैसे भी धारदार हथियार रखना कानून अपराध है। गुप्त बात यह है कि जब यह रहस्य उजागर हुआ कि ‘चेखव की बंदूक’ बुलाकी शर्मा के पास है। तब उन्होंने एक व्यंग्य लिखा ‘चेखव की बंदूक’ और कालांतर में इसी नाम से व्यंग्य संग्रह प्रकाशित करवा कर मित्रों को बांटने लगे जिससे कि असलियत इस मजाक में छिप जाए। हुआ यह कि कुछ मित्रों ने मेरी अक्कल निकाल ली और बोले- तुम शर्माजी को भाई साहब कहते हो और घर आते-जाते हो, पता करो कि चेखव की असली बूंदक उन्होंने कहा छिपा कर रखी है।
मैंने एक बार उनके घर मौका मिलने पर खोजा तो बंदूक तो नहीं मिली पर बारूद का खजाना मिला। बारूद इस अर्थ में कि वे ना जाने किस वर्ष से लगातार डायरी लिखते है और असली डायरी लिखते हैं जिसमें जिस किसी चेहर पर कोई मुखौटा अगर उन्होंने देखा है तो उसे भी दर्ज कर दिया है। बुलाकी शर्मा वास्तव में बजरंग बली है जो आज तक अच्छा-बुरा सब कुछ सहन कर सभी से अच्छे संबंध बनाएं हुए हैं किंतु डायरियां जो चुपके से सरसरी निगाह में देखी गई कुछ अंश पढ़े गए से ज्ञात होता है कि उनके आस-पास की असलियत क्या रही हैं। मित्रों के अनेक राज दफन किए हैं। किसी दिन सच्ची बही सामने आ गई तो यकीन जानिए कि वो बारूद का असला होगा कि बहुत-सी चलती दुकाने बंद हो जाएंगी। पेन रुक रहा है और वैसे भी ऐसी नितांत निजी बातें कम से कम मुझे सार्वजनिक नहीं करनी चाहिए बेशक भले मेरी अक्कल निकाल ली गई हो फिर भी इतना होश तो मुझे है।
क्या यह कमाल नहीं है कि 188 व्यंग्य पुस्तकार होने के बाद भी अब भी उनके मन में यह बात बार बार आती है कि व्यंग्य संग्रह आना चाहिए। एक हिंदी में एक राजस्थानी में। उनके व्यंग्य खजाने में अब भी दस व्यंग्य प्रकाशित हो जाएं जितना मसाला है। संभव है कुछ ऐसा हो भी। होना भी चाहिए। उन्हें व्यंग्य विधा के लिए अनेक सम्मान मिले हैं। बीसवीं शताब्दी में यानी 1999 में राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर ने पुरस्कृत किया। नवीन शोध से पता चला है कि बुलाकी शर्मा बिना चोटी रखे देश में चोटी के व्यंग्यकार बनना चाहते हैं। पुरानी बात है कि एक चोटी वाले ज्योषित ने उन्हें कहा कि बुलाकी तुमको उदयपुर अकादमी से संग्रह ‘दुर्घटना के इर्द-गिर्द’ के लिए पुरस्कार इसलिए मिला कि उस में 21 व्यंग्य थे। अब इस आंकड़े को पकड़ लो और अगर पुरस्कार पाना है तो अगले व्यंग्य संग्रह में 21 व्यंग्य ही आने चाहिए। हमारी भाभीजी वहीं बैठी वार्ता सुन रही थी जो तपाक से बोली- महाराज इन दिनों ये छोटे साइज के व्यंग्य लिखते हैं तो किताब छोटी होगी इसलिए कुछ दूसरा उपाय बताओ?
बुलाकी शर्मा पर पूरा विश्वास किया जा सकता है। वे पूरे विश्वासी है। कभी कभी अंधविश्वासी भी बन जाते हैं खासकर पुरस्कार लेने का मसला हो तो। ज्योषित ने बोला था कि 21 नहीं तो 42 व्यंग्य ले लो। देखिए उनके अगले व्यंग्य संग्रह ‘रफूगीरी का मौसम में’ यही हुआ है। जब मामला नहीं बैठा तो ‘चेखव की बंदूक’ में 51 व्यंग्य रखे गए और इसकी भनक जैसे ही ज्योषित महाराज को हुई वे उनके घर पहुंच गए और इसी वर्ष प्रकाशित व्यंग्य संग्रह ‘आप तो आप ही हैं !’ में 42 व्यंग्य ही रखे गए हैं। मैं ज्योषित नहीं जानता पर राय देने का अवसर नहीं छोड़ना चाहता। कुछ अटपटी बात कहने से चर्चा होती है। सीधी-साधी बात पर कौन दिल फेंकता है। मेरा दावा है कि अगर इक्कीस-इक्कीस व्यंग्यों के इक्कीस संग्रह बुलाकी शर्मा के निकाले जाएं तो उन्हें चेखव की बंदूक जो असली वाली उन्होंने छिपा कर रखी है बेचनी पड़ेगी। एक पंथ दो काज का इससे बढ़िया उदाहरण नहीं हो सकता। यह एक झलक है हमारे स्वदेशी शोध की।
वैसे हमारे देश में शोध की हालत यह है कि बुलाकी शर्मा जैसे बड़े व्यंग्यकार पर कोई बड़ा शोध नहीं हुआ है। हां, बुलाकी शर्मा के लेखन पर यूनीवर्सिटी के कुछ बालक और बालिकाओं ने लघुशोध लिखें है, व्यक्तिगत और सामूहिक। सारी स्थितियों को देखते हुए और व्यंग्यकार शर्माजी की साठी-पाठी उम्र का ध्यान रखते हुए, एक नवजात व्यंग्यकार नीरज दइया ने उनके समग्र लेखन पर आलोचनात्मक पुस्तक का मानस बनाया है। व्यंग्य-यात्रा के संपादकजी संस्मरण में व्यंग्य की फुल मात्रा डालने का आदेश दे रहे हैं तो उनकी प्रेरणा से ही इस आलेख को मेरे मानस ग्रंथ का हिस्सा मान लिया जाए। मिलावट का दौर है। शुद्धता जैसी चीज बाजार में अब बची नहीं। बचा हुआ है अथवा अगर बचाना हो तो प्रेम को बचाएं। जहां प्रेम का आकाल हो तो प्रेम जनमेजय या बुलाकी शर्मा का स्मरण किया जाए। उनकी आत्मीयता से आपके हदय में प्रेम स्रोत से प्रेम छलकने लगेगा। देखिए- सुना आपने सीटी बजी। पेन में सारे कानून-कायदे सेट कर दिए थे इसलिए पेन रुक रहा है। लो एकदम रुक गया।
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लक्ष्मी-सरस्वती संवाद

डॉ. नीरज दइया
ताजा ताजा खबर है कि घटिया स्कूली शिक्षा देने के मामले में भारत को सिल्वर मेडल मिला है। वर्ल्ड बैंक के इस परिणाम में कहीं कोई चूक हुई है वर्ना हमें गोल्ड की उम्मीद थी। सर्वे और सैम्पल टैस्ट में हमारे बच्चों में नकल की बीमारी के कारण हम थोड़ा पिछड़ गए हैं। पिछड़े हुए है तो क्या हम मिडल क्लास परिवार वाले मंथली बजट में खाने-पीने के खर्चे के बाद दूसरा सबसे बड़ा खर्च शिक्षा पर करते हैं। सरस्वती हम पर मेहरबान हो इसलिए लक्ष्मी को लुटाते हैं। हाल यह है कि सरस्वती की कृपा होती नहीं और जो कुछ लक्ष्मी कृपा हमारे पास होती है उस से हाथ धो बैठते हैं। काश कि सरस्वती के चक्कर में लक्ष्मी को बर्बाद नहीं करते तो वर्ड बैंक द्वारा घटिया स्कूली शिक्षा में तो अव्वल घोषित हो जाते। इसी मुद्दे को लेकर लक्ष्मी-सरस्वती में जोरदार भिडंत हो गई।
लक्ष्मी - देश में रक्षा और शिक्षा पर सर्वाधिक अधिक खर्च होता है। फिर भी तुम निहाल क्यों नहीं करती?
सरस्वती - यह मेरी मर्जी है किसे निहाल करूं किसे बेहाल, तुम मुझे पूछने वाली होती कौन हो?
लक्ष्मी- मैं होती कौन हूं, तुम्हारी इतनी हिम्मत कि मुझसे सवाल करती हो। जुबान लड़ाती हो !
सरस्वती - जुवान लड़ाने से क्या मतलब है तुम्हारा। अरे सारा खेल ही इसी जुबान का है। बच्चों को स्कूल में सब बातें करनी आती है पर तुम्हारे गणित के सवाल ठीक से करने नहीं आते। जहां तुम तुम्हारा नाम वहां सब घोटाला।
लक्ष्मी - अरे जा जा, तुम भी दूध की धुली नहीं हो। मुझे क्या पता नहीं है कि बच्चे किताब पढ़ना ही नहीं जानते हैं। पहले तुम अपनी कृपा करो कि वे किताब ठीक से पढ़ना जान जाए। दो अंक ठीक से लिखेंगे तभी तो गणित के सवाल ठीक से कर पाएंगे।
सरस्वती - मैं तो सब कुछ कर दूं पर तुम जो बीच में टांग अड़ाती रहती हो, उसका क्या ? बात होती है शिक्षा की और सब बजट की बातें करते हैं। तुम को पाने के और अपने घर भरने के लिए नई नई योजनाएं लाते हैं, उसका क्या। अरे जब सबकी नजरों में तुम ही तुम हो तो मैं अपनी कृपा क्यों बरसाने लगी। मैं भी देखती हूं कि तुम्हारे बल पर ये कितनी उछल-कूद करते हैं।
लक्ष्मी - अरे रहने दे, रहने दे, मेरे बिना तो कहीं कुछ हो ही नहीं सकता। तुम्हारे विद्या मंदिर के गुरुजी भजन कोई फ्री में नहीं करते। उन सब को मेरे से उम्मीद होती है। ये कहने को सरस्वती पुत्र जरूर है पर मेरी औलादों के बिना सब फीके हैं। पगार के कारण सारे खेल होते हैं।
सरस्वती - कलम के धनी साहित्यकार तो मेरे उपासक है।
लक्ष्मी - यहां भी तुम झूठी साबित हो जाओगी। देखती नहीं ये पुरस्कारों के लिए कैसे कैसे छल-छद्म करते हैं। सारी साठ-गांठ तिकड़म और सेठ-साहूकारों की माया से बनाने-बिगाड़ने वाले पुरस्कारों की है। ये नाम के सरस्वती पुत्र है पर भीतर ही भीतर सब के सब ढोंगी बाबा है।
सरस्वती - हे कलम के धनी साहित्यकार ! क्या तूं मेरा सच्चा उपासक है? बोल वत्स....
मैं असमंजस में पड़ गया कि कहीं मेरे झूठ को मां सरस्वती जान नहीं जाए फिर भी प्रत्येक में बोला- हां-हां मैं सच्चा उपासक हूं और अज्ञात भय के मारे आंखें खुल गई।
पास बैठे पंच काका पूछ रहे थे- क्या कोई सपना देखा? मैंने तुम्हें कितनी बार कहा है कि रात को ये पढ़ना लिखना छोड़, पूरी नींद लिया कर। बात तो बराबर है, रात में जागता है और दिन में सोता है।
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09 अक्तूबर, 2017

टांय टांय फिस्स

पुस्तक समीक्षा-
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टांय टांय फिस्स   व्यंग्यकार : डॉ. नीरज दइया प्रकाशक- सूर्य प्रकाशन मंदिर, दाऊजी रोड (नेहरू मार्ग) बीकानेर पृष्ठ : 96 मूल्य : 200/- संस्करण : 2017   
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    राजस्थान के व्यंग्य लेखन परिदृश्य में आज फारुख अफरीदी, अतुल चतुर्वेदी, अनुराग वाजपेयी, अजय अनुरागी, बुलाकी शर्मा, मधु आचार्य आशावादी, नवनीत पांडेय और अब नीरज दइया भी शामिल हो गये। डॉ. नीरज दइया के सद्य प्रकाशित व्यंग्य संग्रह ‘टांय टांय फिस्स’ में उनके चालीस व्यंग्य संकलित हैं। इन व्यंग्य रचनाओं से गुजरते हुए कहा जा सकता है कि डॉ. नीरज दइया उन व्यंग्यकारों में से एक हैं जिनके लेखन में भौतिकतावादी संस्कृति का एहसास हावी नहीं हुआ हैं। अथवा यूं कह लीजिए कि वे अपनी चिंताओं में मनन करने वाले अन्वेषी हैं। अन्वेषक का काम ही अनुसंधान करने का होता है। नए-नए तथ्यों को तलाशना और उस पर मौजूं तरीके से अपनी बात को कहना होता है, जिस पर नीरज दइया को विशेष अधिकार प्राप्त है।
    नीरज दइया के व्यंग्य आज समकालीन परिदृश्य में गंभीरता से अपनी मौजूदगी बनाए हुए हैं, उनकी यह चिंता व्यंग्यधर्मिता के प्रति उनके मौलिक चिंतन को जहां व्यक्त करती है, वहीं उनकी सक्रियता को भी दर्शाती है कि क्यों एक कवि-कथाकार व्यंग्य लिखने को विवश हुआ। उनका समाज के प्रति दायित्वबोध व्यंग्य के माध्य से अपनी चिंताओं के साथ अभिव्यक्त हुआ है।
    संग्रह के आरंभ में प्राक्कथन में वरिष्ठ साहित्यकार भवानीशंकर व्यास ‘विनोद’ ने लिखा है- ‘डॉ. नीरज दइया एक बहुश्रुत और बहुपठित लेखक है।’ इस उक्ति के साक्ष्य में देखें तो संग्रह में संकलित विविध वर्णी व्यंग्यों में नीरज के लेखन में एक ताजगी दिखती है, वह विषयों को समाज से ही उठाते है लेकिन उसको प्रस्तुत निराले ढंग से करते हैं।
    संग्रह की सभी व्यंग्य रचनाओं में एक स्थाई चरित्र के रूप में पंच काका की उपस्थिति से अपनी मौलिकता और निजता बनी है। पंच काका के माध्यम से अनेक सत्यों को उद्धाटित किया है तो व्यंग्यकार नीरज दइया ने व्यंग्य करते हुए खुद को भी नहीं छोड़ा है। वे अपने आप पर व्यंग्य करने का कौशल रखते हैं इसिलिए उनके व्यंग्य में शालिनता और शिष्टता एक स्थाई भाव के रूप में देखी जा सकती है।
    विगत दो वर्षों से मैं उनके लेखन का साक्षी रहा हूँ, वे नियमित रूप से कालम लेखन में भी हाथ आजमा रहे हैं। उनका यह हुनर पक्का तीरंदाज बनाने में कामयाब रहा है। रोजमर्रा के विषय कब व्यंग्य के विषय बन जाते है और कब विसंगतियां उस पर हावी हो जाती है। यह एक प्रकार की बैचैनी है, जो लेखक को औजार देती है कि अब आपका काम है कि रनदे से उस वास्तविकता को निखार कर उसे नए अर्थ से भर दें, या उसे परिभषित कर दें। नीरज दइया के लेखन में कहीं कोई दुराव या छिपाव नहीं है। जैसे बड़ी कंपनियां अपने उत्पाद को बेचने के लिए हथकंडे अपनाती है। ऐसा कुछ भी यहां देखने को नहीं मिलेगा। कोई कंडीशन अप्लाई वाला बोर्ड यहां चस्पा नहीं। अपने लेखन से विशुद्ध सरोकार रखने वाले व्यंग्यकार नीरज दइया कभी किसी दौड़ में शामिल नहीं रहे। लेकिन लेखकीय गुण, माहौल उन्हें शुरू से ऐसा मिला कि वे खुद भी मौलिक लेखन के अंतर्गत कविता-आलोचना और अनुवाद-कर्म करते हुए व्यंग्य लेखन में पूरी ठसक के साथ आ गए।
    समकालीन व्यंग्य रचनाओं में बदलती स्थितियों के साथ त्वरित टिप्पणियां भी शामिल होने लगी है। हर्ष का विषय है कि इस संग्रह में समकालीनता का आग्रह होते हुए भी स्थितियों पर गहनता से सोच-विचार कर उनको आधार बनाया गया है। जीवनानुभव और जीवन की स्थितियों से मुठभेड़ करते हुए नीरज दइया ने मीठी आलोचना का मीठा फल!!, रचना की तमीज, ‘सामान्य’ शब्द कैसे है सामान्य, खाने-पीने की शिकायत, विकास का गणित, साहित्य माफिया, याद नहीं अब कुछ, बेईमानों पर पड़ी बड़ी मार और टांय टांय फिस्स आदि व्यंग्य लिखते हुए व्यंग्य की लाठी को बचाए रखा है। 
    नीरज दइया का लेखन विश्वसनीय है। समाज के विषय अब उनके विषय होते जा रहे हैं। व्यंग्य लेखन का दर्द वे समझते है और तभी उनके पास विसंगतियां आकर मुस्कराने लगती हैं। उनके तेवर को देख कर लगता है कि उनकी आलोचना में भी अच्छी पकड़ हो सकती हैं। विषय में से अपने हिस्से की धूप निकाल लेना नीरज दइया भली-भांति जानते है। टांय टांय फिस्स व्यंग्य संग्रह के व्यंग्य निश्चित ही पठनीय है, और पाठकों द्वारा पढ़े जा रहे हैं। व्यंग्य-यात्रा के सम्पादक डॉ. प्रेम जनमेजय का यह कहना कि व्यंग्य लेखन ऐसा धारधार विषय है कि वह इतना पैना है कि सामने वाले को भयभीत कर दें, लेकिन बिना अहित किए। इससे साफ जाहिर है कि नीरज दइया के पास एक सशक्त भाषा है जिसका उपयोग वे अपने लेखन में बेबाक तरीके से कर रहे हैं। कहीं-कहीं उनके लेखन में हरीश नवल जैसे अत्यंत शालीन व्यंग्यकार बोलते दिखते है तो लगता है कि ‘टॉय-टॉय फिस्स’ को पहचान मिलने में अब देर नहीं। नीरज दइया को लेखन में श्रीलाल शुक्ल होना है, तो मार्कें का सुभाष चन्दर भी। फिलहाल व्यंग्यकार डॉ. दइया को शुभकामनाएं कि उनका लेखन यशस्वी हो, वे अपने पाठक अर्जित करें। पुस्तक के सुरुचिपूर्ण मुद्रण और आकर्षक प्रस्तुति के लिए प्रकाशक साधुवाद के पात्र हैं।
- डॉ लालित्य ललित
सम्पादक, नेशनल बुक ट्रस्ट,इंडिया,
नेहरू भवन, 5,इंस्टिट्यूशनल एरिया,फेज-2,
वसन्त कुंज,नई दिल्ली-110070


हंसों और कव्वों की भई दोस्ती

० डॉ. नीरज दइया
    सच और झूठ के मेल से दुनिया चलती है। जब यह मेल गड़बड़ाता है तो गाड़ियां पटरियों से उतरने लगती है। पटरियां मजबूत है, पूरी व्यवस्था है। फिर भी यदि गाड़ियां अपना धर्म छोड़े क्या करें? जब धर्म की डोर में बंधे बाबा अपने धर्म से भ्रष्ट हो तो क्या करें? अब तो कौन कितना चोर हैं, पता नहीं! जो पकड़ा गया वह चोर और नहीं पकड़ा गया वह साहूकार। सच और झूठ का अनुपात ही राम-रहीम से जोड़ता और तोडता है। कोई कहता है कि राम सच्चा, कोई कहता रहीम। कौन सच्चा, कौन झूठा किसे पता? कवि कवीर ने वर्षों पहले कहा था- हिन्दू कहे मोहि राम पियारा, तुर्क कहे रहमाना,आपस में दोउ लड़ी-लड़ी मुए, मरम न कोउ जाना। मेरा मानना है- सारा खेल समय और अनुपात का है। इस खेल में दोषी कौन उसे सावित करने की पूरी प्रकिया है। जिसमें समय लगेगा और अंत में दूध का दूध, पानी का पानी होगा। उससे पहले भले आप पानी-पानी होते रहो। माना आप जवानी में केस पाइल करते हैं और बाल सफेद होने पर फैसला आता है। उसके बाद भी अदालत एक नहीं, अनेक है। छोटी अदालत, बड़ी अदालत। नीचली अदालत और उसके बाद ऊपर की अदालत। अंत में सबसे बड़ी अदालत ऊपरवाले की अदालत।
    अगर पर्दे में सब ठीक है तो पर्दे उठाए क्यों जाते हैं? यह कोई नाटक है कि पर्दा उठता-गिरता हैं। यह असल जिंदगी ड्रामा नहीं है। अंधे को अंधा नहीं, सूरदास कहते हैं। हरदम केवल खरे सच से काम कहां चलता है। ना पूरा सच पचता है ना पूरा झूठ। सच की तुलना दूध से की जाती है। दूध यानि जिस में हर कोई अपने हिसाब से पानी मिला कर दूध धुला होने का दावा कर सके। सभी दूध के धुले हो जाएंगे तो दूध देश में कम पड़ जाएगा। दूध तो सबको चाहिए। बूढ़े-जवान-बच्चों सभी को दूध प्रिय होता है। इसलिए दूध और पानी का प्रेम है। इस प्रेम को कोई नहीं समझ सकता। कहा जरूर जाता है कि हंस दूध का दूध और पानी का पानी कर देता है। ऐसा नीर-क्षीर विवेक अब कहां है? अब तो वैसे, वे हंस भी कहां रहे! हालात बदल गए। सभी हंसों ने कव्वों से दोस्ती गांठ ली। वे एक-दूसरे का रूप बदल सकते हैं। ऐसा करना कलियुग में जरूरी हो गया था। मोती कोई खाद्य पदार्थ तो है नहीं, फिर हमारे रामचंद्र ने सिया से कह दिया- ऐसा कलियुग आएगा, हंस चुगेगा दाना-दुनका, कौआ मोती खाएगा। यहां कहने-सुनने में जरूर कुछ फर्क रहा होगा। वैसे तर्क की बात तो यह है कि कौआ मोती खाएगा तो मर नहीं जाएगा! किंतु कभी-कभी ऐसा लगता है कि नए जमाने के हंस ही कव्वों को मोती खाने को दे रहे हैं और ना जाने इनका ऐसा कैसा मेल है कि दोनों के घर भर रहे हैं।
    पंच काका कहते हैं- विद्या और बुद्धि की देवी का वाहन हंस नेताओं के रूप में इन दिनों ज्ञान का प्रकाश फैला रहा है। वे धवल वस्त्र धारण किए अपनी नई चाल में अपने दोस्त कव्वों को काला कोट पहना कर दूध का दूध और पानी का पानी करने का जिम्मा सौंप लोकराज में मस्त हो गए है। नए हंसों और नए कव्वों की मित्रता ने अनेक गाड़ियां पटरियों से उतार दी है, ओर तो ओर बाबाओं की गाड़ियां तो वे एक एक कर बंद करते जा रहें हैं। देखिए अब किसका नंबर है?
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04 अक्तूबर, 2017

मील का पत्थर : आधुनिक लघुकथाएं

पुस्तक: आधुनिक लघुकथाएं (अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन में संकलित)
सम्पादक: डॉ. नीरज दइया/श्री राजेन्द्र जोशी
प्रकाशक: सूर्य प्रकाशन मन्दिर, नेहरू मार्ग (दाऊजी रोड), बीकानेर
संस्करण: 2017 ; मूल्य: 100 रूपये मात्र


सृजन-नगरी बीकानेर में 14वें अन्तर्राष्ट्रीय हिन्दी सम्मेलन के पहले ही सत्र में पुस्तक आधुनिक लघुकथाएं का
लोकार्पण होना अपने आप में बीकानेर के लिए बहुआयामी उपलब्धि माना जाएगा। उपलब्धि की पहली बात तो यही है कि यह सम्मेलन यहाँ हो रहा है, इससे इतर उपलब्धियां इस आशय में कि बीकानेर के सम्पादक द्वय डॉ नीरज दइया एवं श्री राजेन्द्र जोशी द्वारा लघु अवधि में स्तरीय लघुकथाएं संकलित करने का सफल प्रयास सामने आया। साथ ही इन संकलित लघुकथाओं को पुस्तकाकार देने में  देशभर में विख्यात सूर्य प्रकाशन मन्दिर के डॉ प्रशान्त बिस्सा एवं उनकी टीम का परिश्रम रंग लाया। इसके उपरान्त विशिष्ट उपलब्धि यह कि इस पुस्तक का लोकार्पण देशभर के ख्यातनाम लघुकथाकारों के सान्निध्य में हो रहा है।
पुस्तक में संकलित लघुकथाएं पढ़ते समय पाठक को प्रत्येक लघुकथा में जहां मानवीय संवेदनाओं का ज्वार उठता महसूस होता है वहीं हर कथा का प्रत्येक पात्र आपको समाज में अपने आसपास देखा, जाना-पहचाना - सा लगता है। यही इन कथाओं की श्रेष्ठता और सफलता का द्योतक है। पुस्तक का आकर्षक आवरण बीकानेर के जाने-माने कलाकार गौरीशंकर आचार्य का बनाया हुआ है, जो कि एक नज़र देखने पर ही गौरीशंकर की अनूठी शैली स्मरण करवा देता है। लघुकथाएं संकलित कर पुस्तकाकार रूप में पाठकों तक पहुंचाने का यह प्रथम प्रयास नहीं है।
इससे पूर्व भी राजस्थान ही नहीं, देश के जाने-माने सृजनकर्ताओं ने श्रेष्ठ रूप में ऐसे सफल प्रयास किए हैं। किन्तु आधुनिक लघुकथाएं का यह संकलन इसलिए भी इतर माना जाना चाहिए कि  इन कथाओं  में एक ओर जीवन मूल्यों को महत्ता दी गई है तो साथ ही हमारे आसपास श्वांसें लेती विसंगतियों को तीक्ष्ण प्रहार के साथ उकेरा गया है। यह कहने में संकोच नहीं होना चाहिए कि लघुकथा की पहचान के तत्वों को इस संकलन में देखा जा सकता है जैसे कि लघुकथा परम्परा में सकारात्मक पक्ष को विकसित करना। ऐसे तत्वों को पुस्तक की प्रथम रचना ‘पास‘ ( अर्जुनदान चारण ) से लेकर अंतिम कथा ‘पेट’ ( पारस दासोत ) तक पाठक बखूबी रेखांकित पाते है।
लघुकथा पास में आजादी के सिपाही और थाने के सिपाही के माध्यम से कथाकार ने देश को आधुनिक दौर तक पहुंचाने वालों की हालत को आसानी से उकेर दिया है। इस कथा में सरकारी, निजी, वृद्ध, जवान, राज का नौकर और निजी क्षेत्र का कामगार वर्ग की स्थिति का रेखांकन यूं हुआ है मानो आपकी आंखों में लगा सुरमा कोई निकाल ले गया और आपको खबर हुई तो हक्केबक्के रह गए। मानवीय संवेदनाओं का सागर लहराता दिखता है लघुकथा पेट में। श्रमिक वर्ग को यह मालूम ही नहीं कि जिस पेट के लिए वह दिनरात खटता है वह पेट होता क्या है? इससे बड़ी बात इतने कम शब्दों में पिरोने के लिए लघुकथाकार को सलाम। सलाम उन सभी लघुकथाकारों को भी, जिन्होंने लघुकथा परम्परा को बदलते समय और समाज के साथ समन्वय करते हुए संक्षेप में शाब्दिक रूप देते हुए गागर में सागर भर कर दिखाया है। पेज 28 पर भूत और इमली की सांटी/ जयप्रकाश मानस को पढ़ते समय आपको अपना बचपन जरूर याद आएगा। साथ ही याद आएंगी ऐसी अनेकानेक बातें, जिनमें अंधविश्वास और समाज की दशा/दिशा पर आपने यकीनन कई मर्तबा मंथन किया होगा।
पेज 63 पर लक्ष्मीनारायण रंगा की लघुकथा लोरी को आजादी से लेकर अब तक के सभी नेताओं को भी पढ़ना चाहिए। ईश्वर न करे, लघुकथा में वर्णित लोरी हमारी भावी पीढ़ी सुनने का दुर्भाग्य पाले। सच तो यह है कि इस पुस्तक की सभी लघुकथाओं में ऐसी-ऐसी विशिष्टताओं को पाठक पाएंगे जिन्हें वर्णित करने के लिए इस पुस्तक से भी अधिक पृष्ठों वाली एक और पुस्तक की रचना करनी पड़े।
अशफाक कादरी की राज, गोविन्द शर्मा की रक्षा, डा जसवीर चावला की एक दिव्य आत्म-हत्या, देवकिशन राजपुरोहित की माकूल जवाब, नदीम अहमद नदीम की दरबार, नीति केवलिया की नजरिया, फारूक आफरीदी की चोट, डा मदन गोपाल लढ़ा की गहराता सन्नाटा, माधव नागदा की पुराना दरवाजा, राजेंद्र शर्मा मुसाफिर की अहिंसा का स्मरण इत्यादि-इत्यादि सभी ऐसी कथाओं का सागर है आधुनिक लघुकथाएं। सोने पर सुहागा यह कि डॉ अशोक कुमार प्रसाद का अन्वेषणात्मक आलेख लघुकथा का वर्तमान, जयप्रकाश मानस की कलम से लघुकथा की शास़्त्रीयता जैसे शिक्षाप्रद और संग्रहणीय पाठ भी इस पुस्तक में शामिल हैं। शुभ कामनाएं कि निकट भविष्य में यह पुस्तक हमें सभी स्तरीय पुस्तकालयों, वाचनालयों में पढ़ने को मिलेगी तथा हिन्दी साहित्य पाठ्यक्रम में शिक्षण संस्थाओं द्वारा शामिल की जाएगी। आधुनिक लघुकथाएं पुस्तक के लिए सम्पादक द्वय डॉ नीरज दइया और श्री राजेन्द्र जोशी एवं प्रतिष्ठित सूर्य प्रकाशन मन्दिर एवं आवरण चित्रकार गौरीशंकर आचार्य को साधुवाद।
- मोहन थानवी

02 अक्तूबर, 2017

शब्दों की यात्रा / डॉ. मदन गोपाल लढ़ा

डॉ. मदन गोपाल लढ़ा
    नामी कवि, कहानीकार एवं व्यंग्यकार सांवर दइया के पुत्र होने के नाते डॉ. नीरज दइया को लिखने के संस्कार विरासत में मिले हैं। कहने को यह कहा तो जा सकता है, मगर क्या विरासत में लेखन में लेखन के संस्कार मिलने भर से कोई लेखक हो जाता है? अगर ऐसा होता तो तमाम बड़े लेखकों की विरासत उनकी संतानें संभाल लेती और लेखन के क्षेत्र में वंश परंपरा अनवरत चलती रहती। सच्चाई तो यह है कि संतानों द्वारा सुध नहीं लिए जाने से अधिकांश लेखकों के जाने के बाद उनकी किताबें धूल फांकती रहती है अथवा रद्दी में बेच दी जाती है। कई नामी लेखकों की अप्रकाशित पांडुलिपियां दीमकों का भोजन बन जाती है। लिहाजा विरासत की बात कहने सुनने में अच्छी लगती है मगर लिखने के लिए बीज रूप प्रतिभा का होना अनिवार्य है। अलबत्ता लेखक के घर का रचनात्मक परिवेश, किताबें-पत्रिकाओं की उपलब्धता, अन्य लेखकों का सान्निध्य, प्रकाशकों से संपर्क आदि खाद-पानी का काम करता है, जिससे प्रतिभा का बीज एक लहलहाते दरख्त में तब्दील हो जाता है। राजस्थानी एवं हिंदी में समान रूप से लिखने वाले चर्चित कवि, आलोचक एवं व्यंग्यकार डॉ. नीरज दइया के लिए यह बात सोलह आना खरी उतरती है।
    अपनी उद्भट प्रतिभा, व्यत्पत्ति एवं सतत अभ्यास के बल पर डॉ. नीरज दइया ने साहित्य अकदेमी पुरस्कार से सम्मानित अपने लेखक पिता सांवर दइया की समृद्ध विरासत को न केवल सहेजा बल्कि सतत साधना के बल पर उसे आगे बढ़ाया है। अथक परिश्रम व अटूट निष्ठा से की गई साधना का सुफल है कि साहित्य के समकालीन परिदृश्य में उनका नाम राष्ट्रीय स्तर पर अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने में सफल रहा है। लेखक के रूप में लघुकथा विधा से शुरुआत करने वाले डॉ. नीरज दइया ने कविता, अनुवाद, व्यंग्य, आलोचना, बाल कहानी एवं साक्षात्कार आदि विधाओं में कलम चलाई है। राजस्थानी व हिंदी दोनों भाषाओं में अधिकारपूर्वक लिखने का सामर्थ्य अनवरत साधना का प्रतिफल है। तीन दशकों लंबी अब तक की साहित्यिक यात्रा में एक दर्जन से अधिक मौलिक कृतियां, दर्जन भर अनूदित कृतियां एवं करीब इतनी ही तादाद में संपादित कृतियां उनके खाते में दर्ज है। विश्व साहित्य की श्रेष्ठ कृतियों को राजस्थानी भाषा में अनुवाद कर उल्लेखनीय कार्य करने वाले लोगों में डॉ. चन्द्र प्रकाश देवल का नाम शीर्ष पर है। इस क्रम में डॉ. नीरज दइया ने अमृता प्रीतम, निर्मल वर्मा, भोलाभाई पटेल, डॉ. नन्द किशोर आचार्य, सुधीर सक्सेना, ओम गोस्वामी आदि नामी लेखकों की चर्चित कृतियों को राजस्थानी में अनुवाद कर के भाषाओं के मध्य पुल बनाने का काम किया है। डॉ. नन्द किशोर आचार्य एवं सुधीर सक्सेना की अब तक की काव्य-यात्रा से चयनित कविताओं का संचयन और अनुवाद इन दिनों चर्चा में है। सुधीर सक्सेना की अनूदित कृति की विशेषता यह है कि इसमें अनुवाद के साथ मूल कविताओं को भी शामिल किया गया है, जिससे अनुवाद की गुणवत्ता सहज जांची-परखी जा सकती है। जो हिंदी और राजस्थानी के समान होने की बात कहते-करते हैं उनके लिए भी यह कृति एक मध्यम हो सकती है कि वे जान सकें दोनों भाषाओं में क्या और कितना विभेद है। डॉ. दइया की अनुवाद के क्षेत्र में एक अन्य उल्लेखनीय और रेखांकित की जाने वाली कृति ‘सबद-नाद’ भी है, जिसमें 24 भारतीय भाषाओं के प्रतिनिधि कवियों की कविताओं का संचयन और अनुवाद उपलब्ध होना एक विशेष उपलब्धि है। प्रख्यात कवि अनिल जनविजय ने इस काम के बारे में टिप्पणी करते हुए लिखा- “भाई नीरज जी ! राजस्थानी में पूरे भारत की कविताएं देख कर मज़ा आ गया। ये बड़ा काम है। ऐसा काम तो अभी तक हिन्दी में भी किसी एक व्यक्ति ने शुरू नहीं किया है। मुझे आपसे ईर्ष्या हो रही है। अद्‌भुत ।”
            राजस्थानी भाषा में कविता व कहानी विधा में भरपूर लिखा गया है मगर आलोचना का पक्ष कमजोर रहा है। आलोचकीय काम के अपर्याप्त होने से अनेक रचनाकारों के रचना-संसार का सम्यक मूल्यांकन नहीं हो पाया। इस खालीपन को महसूस करते हुए डॉ. नीरज दइया ने आलोचना विधा में लिखना आरंभ किया। उनकी आलोचना विधा की चर्चित कृतियां ‘आलोचना रै आंगणै’ व ‘बिना हासलपाई’ इस कमी को दूर करने के ईमानदार प्रयास हैं। ‘आलोचना रै आंगणै’ में जहां विभिन्न विधाओं पर केंद्रित अठारह आलेख शामिल हुए हैं, वहीं ‘बिना हासलपाई’ कृति में राजस्थानी के पच्चीस प्रतिनिधि कहानीकारों के कथा-संसार की पड़ताल करते हुए कहानी आलोचना के मानकों की तलाश की गई है। बहुप्रतीक्षित पुस्तक ‘आंगळी-सीध’ जल्द ही प्रकाशित होगी, जो राजस्थानी उपन्यास यात्रा पर केंद्रित है।
            कविता डॉ. दइया की सबसे प्रिय विधा है। राजस्थानी में वर्ष 1997 में प्रकाशित प्रथम कविता संग्रह ‘साख’ ने उनके कवि रूप की साख बनाई तो लंबी कविता ‘देसूंटो’ को अपनी दार्शनिक पृष्ठभूमि व निराले शिल्प के कारण एक उल्लेखनीय प्रयोग के रूप में देखा माना गया। वर्ष 2015 में प्रकाशित कविता संग्रह ‘पाछो कुण आसी’ की कविताएं अपने समय व समाज की सच्चाइयों को निजी मुहावरे में उजागर करने से चर्चा में है। हिंदी कविता संग्रह ‘उचटी हुई नींद’ ने देखे-भोगे सच को बिना लाग-लपेट सहजता से अभिव्यक्त कर हिंदी पट्टी के आलोचकों का ध्यान खींचा।
    बच्चों के लिए लिखना सबसे कठिन है क्योंकि बाल साहित्य सृजन के लिए लेखक को खुद बच्चा बनना पड़ता है। नीरज दइया ने बाल मनोविज्ञान को साधते हुए ‘जादू रो पेन’ शीर्षक से जो बाल-कहानियां रचीं, वे राजस्थानी बाल-साहित्य में नया आयाम स्थापित करती है। सीख एवं उपदेश से इतर ये कहानियां बच्चों का स्वस्थ मनोरंजन करते हुए उनको जीवन के विविध आयामों से रू-ब-रू करवाती है। ध्यातव्य है कि इस कृति को वर्ष 2014 के साहित्य अकादेमी बाल साहित्य पुरस्कार से नवाजा गया।
            नामी कवि मोहन आलोक, देवकिशन राजपुरोहित, कन्हैयालाल भाटी की कहानियों का संचयन एवं संपादन कर दइया ने राजस्थानी कहानी विधा को नए सिरे से जांचने-परखने के लिए अवसर दिया है। ये वे कहानीकार है जो यादगार कहानियां लिखने के बावजूद विमर्श से बाहर रह गए। अनियतकालीन पत्रिका ‘नेगचार’ से चर्चा में आए डॉ. नीरज दइया ने राजस्थानी भाषा साहित्य एवं संस्कृति अकादमी की मासिक पत्रिका ‘जागती जोत’ का एक वर्ष से अधिक संपादक किया तथा वे अनेक पत्रिकाओं के अतिथि संपादक के रूप से कार्य कर चुके हैं। माध्यमिक शिक्षा बोर्ड अजमेर में राजस्थानी पाठ्यक्रम समिति के संयोजक एवं अकादमी कार्यकारणी सदस्य के रूप में भी उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिकाएं रही हैं। उच्च माध्यमिक कक्षाओं के पाठ्यक्रम में शामिल राजस्थानी पद्य संकलन के वे संपादक भी रहे हैं।
            ‘मंडाण’ के रूप में नीरज दइया ने संपादन का वह ऐतिहासिक काम किया जिसकी ख्याति परंपरा के हेमाणी अंक, राजस्थानी-एक, तीन बीसी पार व साख भरै सबद के क्रम में दर्ज की जाने योग्य है। राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृति अकादमी द्वारा प्रकाशित इस संकलन में राजस्थानी के 55 युवा कवियों की प्रतिनिधि कविताओं को एक ही जिल्द में शामिल किया गया है। राजस्थानी की युवा कविता को समग्र रूप से जानने के लिए यह एक विश्वसनीय एवं जरूरी किताब है।
            साहित्य सृजन के साथ तकनीक के सहारे आभासी दुनिया में राजस्थानी रंग बरसाने वाले लोगों में डॉ. नीरज दइया अग्रणी है। वे राजस्थानी की रचनाओं को हिंदी में उपलब्ध करवाने वाले सुधी रचनाकारों में भी अग्रणी कहे जा सकते हैं। अंतर्जाल पर उनकी सक्रियता को नेगचार वेब पत्रिका, राजस्थानी डाइजेस्ट, कविता कोश के राजस्थानी विभाग व फेसबुक आदि अनेक स्थलों पर देखा जा सकता है। कहना न होगा नीरज दइया राजस्थान के उन चुनिंदा लेखकों में से है जिन्होंने अखिल भारतीय स्तर पर अपनी लेखनी के बलबूते सशक्त हाजरी दर्ज की है। यही वजह है कि उनसे उम्मीदें बढ़ गई हैं।
          व्यंग्य विधा इन वर्षों में लोकप्रियता के शिखर पर है। समय व समाज की हकीकत व व्यवस्था की विसंगतियों को चुटीले अंदाज में उजागर करने में व्यंग्य विधा का कोई सानी नहीं है। डॉ. नीरज के दो व्यंग्य संग्रह हाल ही में प्रकाशित हुए हैं- ‘टांय टांय फिस्स’ एवं ‘पंच काका के जेबी बच्चे’। गौरतलब है कि दइया के व्यंग्य देश के नामी दैनिक पत्रों में नियमित रूप से प्रकाशित होते हैं, जिससे व्यंग्य-पाठकों के बीच वे लोकप्रिय हैं। इसी क्रम में यहां यह भी उल्लेखनीय है कि डॉ. नीरज दइया ने अपने समकालीन दो वरिष्ठ लेखकों बुलाकी शर्मा एवं मधु आचार्य ‘आशावादी’ के समग्र सृजन के सरोकारों को आलोचक के रूप में देखने-परखने का काम भी किया है। ‘बुलाकी शर्मा के सृजन-सरोकार’ एवं ‘मधु आचार्य आशावादी के सृजन-सरोकार’ पुस्तकों के माध्यम से न केवल इन दोनों समकालीन लेखकों के सृजन के बहुआयामी पक्षों से परिचित हुआ जा सकता है वरन हिंदी आलोचना में विकसित होती आत्मीय भाषा, नवीन शिल्प एवं अभिनव दृष्टि को भी यहां चिन्हित किया जा सकता है। उम्मीद की जानी चाहिए कि यह क्रम अन्य रचनाकारों हेतु भी जारी रहेगा।
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 आभाअर : दुनिया इन दिनों / दिल्ली / अक्टूबर (प्रथम) 2017 / प्रधान संपादक : श्री सुधीर सक्सेना

 

गांधीजी का चश्मा

० डॉ. नीरज दइया
    मैंने नया चश्मा बनावा कर आफत मोल ले ली। मुझे जो भी देखता है कहता है- वाह गांधीजी का चश्मा। अरे भाई मेरा चश्मा है और मैंने नया बनवाया है। बात स्टाइल की है। बापू के साथ-साथ उनका चश्मा, घड़ी, लंगोटी, सैंडल और लाठी सभी प्रसिद्धि पा गए। इसी प्रसिद्धि के चक्कर में चरखा और खादी लोकप्रिय हुए। भले कोई गांधीजी को दागदार माने, पर यह तो मानना होगा कि वे सबसे कम दागदार है। इतने कम कि दाग नजर नहीं आते। उनको मानने वाले तो खैर उन्हें बेदाग मानते ही हैं। स्वच्छा अभियान में स्बच्छ गांधीजी के स्वच्छ चश्मे का उपयोग हुआ।
    दाग-प्रेमी कहते हैं कि चश्में की दो आंखों में देखिए एक पर स्वच्छ लिखा है दूसरी पर भारत। जहां स्वच्छ लिखा है वहां भारत नहीं है और जहां भारत लिखा है वहां स्वच्छता नहीं है। ऐसे कुतर्कों के कारण हंसी आती है। जब ईश्वर की दी हुई दो आंखें है, तो इतना फर्क क्यों सोचते हो? दोनों बिल्कुल पास-पास है। और अगर बात किसी एक आंख की ही करनी है तो तारक मेहता का उलटा चश्मा और जसपाल भट्टी के उलटा-पुलटा को याद करो। जब तुम्हारी इच्छा हो चश्मा सीधा करो और जब जब इच्छा हो उल्टा कर लो। आप को क्या देखना है यह आप खुद पर है। आप ऐसा भी कर सकते हैं कि स्वच्छता अभियान के दो चश्में लाएं, एक को सीधा दूसरे को उसी पर उल्टा लगाकर एक साथ स्वच्छ भारत देख सकते हैं।
    गांधी-चश्मा लगा कर कोई गांधी नहीं बनता, पर जब कोई गांधी चश्मा लगता है तो वह गांधी-चश्मा बन जाता है। मुझे यह परम ज्ञान प्राप्त हुआ। मैं गांधीजी का परम भक्त बन गया। वे हमारे राष्ट्रपिता कहे जाते हैं। महात्मा गाँधी के चश्मे वाली तस्वीर का स्वच्छ भारत शौचालय में देखा तो वहां जाने के मूल कर्म बिसराकर मैं पोस्टर फाड़ने लगा। यह तौहीन है कि स्वच्छ बापू के स्केच, फोटो का उपयोग गंदे स्थानों पर किया जाए। रहस्य यह भी है कि स्वच्छता अभियान गंदे स्थानों के लिए नहीं है। हम इतनी समझदारी तो रख सकते हैं कि अच्छे स्थानों को पहले थोड़ा सा गंदा करवाते हैं, फिर स्वच्छा अभियान में हिस्सेदारी प्रगट करने के लिए झाड़ू लेकर प्रेस फोटो का जुगाड़ करें।
    प्रचार-प्रसार जरूरी है पर इतना जरूरी नहीं है कि शौचालय की दीवारों तक बापू को पहुंचा दें। वहां की गंदगी देख कर बापू को बुरा लग सकता है। महात्मा गांधी का कहना था कि वे अपने चश्मों से आज़ाद भारत की तस्वीर देखते हैं। हे आजाद भारतवासियों ! उन्हें ऐसी तस्वीर तो मत दिखाओ। वैसे भी वे हत्‍या, लूटपाट, दुष्‍कर्म, मारा-मारी के साथ-साथ समुदाय विशेष के दंगों को देखकर आंसू बहा रहे है। चश्में का इतना क्रेज है कि दिल्ली के अति सुरक्षित राष्ट्रपति निवास के पास ग्यारह मूर्ति से कोई आपका चश्मा ले गया। पंच काका कहते हैं कि जिस चश्मे से आजाद भारत की तस्वीरें बापू देखा करते थे वे अब नहीं दिखाई देती। अब तो नई-नई तस्वीरें है। छोड़ो कल की बातें, कल की बात पुरानी... नए दौर में लिखेंगे, मिल कर नई कहानी हम हिन्दुस्तानी, हम हिन्दुस्तानी। बापू को भले पसंद नहीं आए, पर हमने कहानी शानदार लिखी है और लिखते चले जा रहे हैं।
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01 अक्तूबर, 2017

लड्डू

. नीरज दइया    आखिर इंतजार करते-करते वह बस आ गई जिससे मुझे यात्रा करनी थी। इसे संयोग कहेंगे कि बस भरी हुई थी। बस में चढते ही मैं सीट का जुगाड़ करने की फिराक में था, पर हर सीट पर किसी न किसी का कब्जा था। काफी सवारियां बस में खड़ी थी। मैंने विचार किया पीछे कोई एक-आध सीट खाली मिल सकती है। रास्ते में खड़ी सवारियों में आगे-पीछे धक्कम-पेल करते बड़ी मुश्किल से पीछे तक पहुंचा। मेरा अंदाजा ठीक था, एक सीट खाली दिखाई दी। मैंने पहले आओ, पहले पाओ के हिसाब से सीट पर कब्जा करने का जरा सा प्रयास किया ही था कि पास की सीट पर काबिज नवयुवक ने सीट पर रखे रुमाल की तरफ संकेत करते हुए कहा- “रोकी हुई है, कोई आ रहा है।” 
    मैंने झेंपते हुए कहा- “अच्छा जी” और पास खड़ा रह गया। सोचा- नाहक हैरान हुआ। आगे भी खड़े होने के लिए पर्याप्त जगह थी। मैंने देखा- उस सीट के लिए एक-दो अन्य यात्री भी आए, किंतु पास बैठा आदमी पक्का पहरेदार था किसी को पल भर भी बैठने नहीं दिया। वह कहता रहा- “रोकी हुई है, कोई आ रहा है।” इसी बीच एक सुंदर नैन-नक्स वाली लड़की को देखा जो मुस्कान बिखेरते हुए उसी आदमी से पूछ रही थी- “यह सीट खाली है क्या?” लड़की की मुस्कान से वह आदमी जैसे खिल उठा, उसकी आंखों में चमक आ गई थी। मुस्कुराते हुए वह कह रहा था- “हां-हां, आइए....। खाली है।” यह सुनते ही वह लड़की पीछे पलट कर ऊंचे स्वर में बोली- “ताऊजी! यहां आ जाएं। सीट मिल गई है।” वह आदमी मुंह बाए आगे खड़ी सवारियों में उसके ताऊजी को पहचानने की कोशिश करने लगा।  
    मुझे लगा उस आदमी के सपने बिखर कर चकना चूर हो गए हैं और वह मुंह बाए ऐसे दिखाई दे रहा था जैसे उसके मुंह में कोई लड्डू आते-आते रह गया हो। उस लड़की के ताऊजी को देखते हुए उस आदमी का मुंह ना जाने क्यों खुला रह गया था और मुझ से निगाहें मिलते ही उसने सकपकाकर मुंह बंद कर लिया। मैं अब कहां चूकने वाल था, मैंने मन ही मन कहा- “ क्यों, मिल गया लड्डू?”
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कथारंग-3 लघुकथा विशेषांक में प्रकाशित

25 सितंबर, 2017

किस्म-किस्म के लोकार्पण

डॉ. नीरज दइया
    मुझे लोकार्पण बहुत अच्छे लगते हैं। मैं अत्यधिक पुस्तक प्रेमी हूं। कोई लोकार्पण हो, कहीं लोकार्पण हो, मेरी इच्छा रहती है कि पहुंच कर मैं शुभकामनाएं दूं। शुभकामनाओं में अपना क्या लगता है। फ्री की शुभकामनाएं मैं सब को देता हूं पर सामने वाला प्रायः फ्री में नहीं लेता। मुझे मेरी शुभकामनाओं को बदले चाय-पानी-ठंडा मिलना तो सामन्य बात है, कभी भरपेट नाश्ता और कभी-कभार भर पेट भोजन का जुगाड़ हो जाता है।
    जब मुझे मालूम चल जाता है कि फलां कार्यक्रम में भोजन भी है तो मैं घर के बच्चों और उनकी अम्मा को साथ लेकर पहुंचना फायदेमंद मानता रहा है। इससे फायदा यह होता है कि घर में चूल्हा जलाना नहीं पड़ता। सुबह ऐसा कोई कार्यक्रम होता है तो सब को पहले से समझाकर ले जाता हूं कि शाम को घर पर उपवास रहेगा जो खाना है वहीं खा लेना। कार्यक्रम अगर शाम का होता है तब हम सभी अगले दिन सुबह उपवास का कार्यक्रम रखते हैं।   
    साहित्य और खासकर पुस्तक लोकार्पण कार्यक्रम में भव्य भोज का कार्यक्रम मुझे बहुत अच्छा लगता है। मैं ऐसे आयोजनों में सपरिवार अक्सर थोड़ी देरी से पहुंचता हूं। दूरदृष्टि पक्का इरादा लिए मैं ऐसे आयोजनों के भरपूर ज्ञान से बचता हूं। मैं वक्ता की औकात जानता हूं। अगर कार्यक्रम के आयोजकों ने वक्ताओं को अच्छा पेमेंट किया होगा तो वे बहुत अच्छा अच्छा बोलते हैं। लोकार्पण कार्यक्रम असल में असत्य कार्यक्रम होता है। सच्ची और असली बात कोई प्रायः कहता नहीं। कुछ विद्वान तो लोकार्पण को पुत्र अथवा पुत्री के जन्मोत्सव की भांति केवल बधाई कार्यक्रम मानते हैं। पुस्तकों की विक्री की कमी को देखते हुए प्रकाशकों और आयोजकों को चाहिए कि वे पुस्तक का संस्करण जब तक पूरा बिक ना जाए तब तक बारबार लोकार्पण करें। अब मैं इतना एक्पर्ट हो गया हूं कि पुस्तकें भेंट लेने लगा हूं। कोई भेंट देना नहीं चाहे तो भी जो मैं ठान लेता हूं कर दिखाता हूं। देने वाला कब तक मुझसे बचेगा? मैं उसके सामने बीस बार ऐसे डोरे डालता हूं, कशीदे पढ़ता हूं और साथ खड़ा होकर मुस्कुराता हूं कि उसे शर्म आने लगती है। वह किताब भेंट कर ही देता है। कभी ऐसा भी होता है कि कुछ बेशर्मों के कारण बेशर्म मुझे बनना पड़ता है। किसी एक किताब की कीमत सौ या दो सौ रुपये से भला कम क्या होती है। फिर किताब देने वाला जल्दी में यदि उस पर दो शब्द भेंट के नहीं लिखता तो मैं उसे बेचने का प्रयास भी कर लेता हूं। ऐसी भेंट मिली किताबें जब अधिक  हो जाती है तो घरवाली झगड़ा करती है। घर में इतनी रद्दी किस काम की, बेच दो इन सब को।
    आजकल कुछ लेखक-कवि मेरे जैसे गुणी दर्शक-श्रोता के साथ घोखा करने लगे हैं। वे चुपचाप लोकार्पण कर लेते हैं और भनक लगने नहीं देते है। यह तो सुबह-सुबह अगले दिन अखबार से पता चलता है कि फलां की फलां किताब का फलां जगह लोकार्पण हुआ और फलां-फलां लोग थे।
    पंच काका कहते हैं कि ऐसा लोकार्पण जिसमें चार-पांच मित्र मिलकर फोटो ले लेते हैं और झूठी खबर से लोकार्पण प्रचारित करते हैं उन पर जुर्माना लगना चाहिए! बिना चाय-पानी और मिठाई के लोकार्पण को अवैध करार देकर कड़े नियम बनाने चाहिए। गुपचुप और चुपचाप ऐसे लोकार्पण संज्ञान में आने पर जुर्माने के तौर पर लोकार्पण रिपीट की सजा होनी चाहिए, जिसमें भर पेट भोजन अनिवार्य हो।
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24 सितंबर, 2017

विद्रूप चित्रण से ज्यादा प्रभावी प्रहार

० अरविंद तिवारी
    बीकानेर न केवल साहित्य की उर्वर भूमि है बल्कि सांस्कृतिक गतिविधियों के लिए पूरे भारत में जाना जाता है। रंगकर्म से लेकर आर्ट गैलरी में समय-समय पर लगने वाली प्रदर्शनियों को मैंने निकट से देखा है। एक दर्ज़न से अधिक साहित्यकारों की ख्याति अखिल भारतीय स्तर की है। हिंदी साहित्य वास्तव में बीकानेर का ऋणी है। फ़िलहाल वहाँ के तेजी से उभर रहे व्यंग्य लेखक डॉ. नीरज दइया के दूसरे व्यंग्य संग्रह "टांय टांय फिस्स" के बारे में कुछ कहने-लिखने का मन है। बीकानेर वह धरा है जहाँ मालीराम शर्मा, डॉ. मदन केवलिया, बुलाकी शर्मा, हरदर्शन सहगल जैसे दिग्गज व्यंग्यकारों ने व्यंग्य साहित्य में अपना विशिष्ट स्थान बनाया है। मालीराम शर्मा का स्तम्भ लेखन बेहद पठनीय और लोकप्रिय रहा है। ऐसे वातावरण वाले शहर में व्यंग्यकारों का उभरना सामान्य बात है। नए व्यंग्यकारों के लिए अपने इन दिग्गजों से सीखने के विपुल अवसर रहते हैं। चुनौतियाँ भी इन्हीं के लेखन से हैं।
    नीरज दइया के दूसरे व्यंग्य संग्रह "टांय टांय फिस्स" में कुल 40 व्यंग्य संकलित हैं। उनका शुरुआती व्यंग्य संग्रह- ‘पंच काका के जेबी बच्चे’ से यह व्यंग्य संग्रह काफी परिपक्व है। वैसे अन्य अनुशासनों में डॉ. नीरज दइया का नाम बेहद जाना-पहचाना है, खासकर राजस्थानी साहित्य में। उनके पिताजी स्व. सांवर दइया राजस्थानी साहित्य के चर्चित साहित्यकार हुए हैं। डॉ. नीरज दइया ने यह संकलन राजस्थानी और हिंदी के साहित्यकार डॉ. मंगत बादल को समर्पित किया है। मंगत जी व्यंग्य भी लिखते हैं। भूमिका जाने-माने व्यंग्य कवि भवानीशंकर व्यास ‘विनोद’ ने बेहद भावुक होकर लिखी है। प्रशन्सात्मक भूमिका नीरज जी को अच्छा और अच्छा लिखने के लिए प्रेरित करेगी।
    'ये मन बड़ा पंगा कर रहा है' व्यंग्य में लेखक कहता है- 'एक दिन सोचा मन की फ़ोटो प्रति कर ली जाय मगर मन है कि पकड़ में नहीं आता। 'फन्ने खाँ लेखक नहीं' में लेखक कहता है- लेखक होना अपने आप में अमर होना है। इस अमरता के लिए ही लेखक मरे जा रहे हैं। "सबकी अपनी अपनी दुकानदारी" में नीरज जी लिखते हैं- 'अच्छे दिन हैं कि सभी घास खाएं और सोएँ।’ ‘वी आई पी की खान’ व्यंग्य में वी आईं पी कल्चर पर प्रहार किया गया है। ‘साहित्य माफिया’ में वह लिखते हैं- साहित्य भी एक धंधा बन चुका है। आज किसके पास समय है कि साहित्य जैसे फक्कड़ धंधे में हाथ आजमाए। ‘चीं-चपड़, गटर-गूं और टीं-टा-टू’ व्यंग्य में कहा गया है- पिंजरा केवल चूहों के लिए, हम सभी के लिए अलग अलग रूपों में कहीं न कहीं किसी न किसी ने निर्मित कर रखा है।
    इस व्यंग्य संग्रह में आक्षेप, भर्त्सना, कटाक्ष आदि व्यंग्य रूप प्रचुरता में विद्यमान हैं लेकिन विट, आइरनी, ह्यूमर आदि न के बराबर है। विद्रूप चित्रण से ज्यादा प्रभावी प्रहार हैं। यदि इन सशक्त प्रहारों के साथ विद्रूपता को साध लिया जाय तो नीरज जी का लेखन ऐतिहासिक हो जायेगा। भाषा साधारण किन्तु प्रवाहमयी है। पंच काका की हर व्यंग्य में उपस्थिति से शैलीगत प्रयोग नहीं हो पाये हैं। इस सन्दर्भ में मुझे अपना प्रतिदिन का नवज्योति में कॉलम लिखना याद आ गया। ढाई साल तक मैंने रोजाना व्यंग्य कॉलम लिखा था- "गयी भैंस पानी में" शीर्षक से। शुरुआती दिनों में मैं हर व्यंग्य में भैंस को ले आता था, जिससे व्यंग्य की धार कुंद हो जाती। दस दिनों बाद संपादक और मित्रों के टोकने पर मैने शैली बदल दी थी। बहरहाल इस संग्रह के बाद व्यंग्य जगत को नीरज जी से उम्मीदें बढ़ गयीं हैं।
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टांय टांय फिस्स (व्यंग्य संग्रह) डॉ. नीरज दइया ; अवरण चित्र : के. रवीन्द्र ; संस्करण : 2017 ; पृष्ठ : 96 ; मूल्य : 200/- ; प्रकाशक : सूर्य प्रकाशन मन्दिर, दाऊजी रोड (नेहरू मार्ग), बीकानेर- 334003


20 सितंबर, 2017

घूमाते रहें दिमाग

जार्ज बर्नार्ड शा ने कहा था कि जो अपना दिमाग नहीं बदल सकत वे कुछ भी नहीं बदल सकते। वे बड़े लेखक जरूर थे पर यह नहीं जानते थे कि इस पृथ्वी पर ऐसा समय आएगा जब दिमाग बदलना बाएं हाथ का खेल होगा। वे यह जानते भी होंगे तो उन्होंने निश्चित तौर पर यह तो सोचा नहीं होगा कि इक्कीसवी सदी में दिमाग बदल कर भी कुछ नहीं बदल सकेंगे। चुनाव में हम बहुत बार दिमाग बदलते हैं। फिर पता चलता है कि हम कुछ भी बदल नहीं पाए। अब देखिए ना हमारे कुछ मित्र कहते हैं- अच्छे दिन दिन आ गए। कुछ कहते हैं- नहीं आए। मित्रों के इस मतभेद को हल कौन करेगा?
सरकारी दावा है कि सब कुछ बदल गया है। देश तेजी से विकास कर रहा है। जब सब कुछ बदल गया है तो हमें दिखाई क्यों नहीं देता। क्या बदलाव से हमारे आंखें चुंधिया गई है कि हम कुछ देख नहीं पा रहे। जब हम रेलगाड़ी में बैठते हैं तो खिड़की से बाहर स्थिर पेड़ और जमीन भागती हुई दिखाई देती है। आंखें जो देखती है, मन जिसे महसूस करता है वह गलत कैसे हो सकता है। मरा यह दिमाग इस सत्य को स्वीकार क्यों नहीं करता। आंखों देखे सत्य को जो नकार रहे हैं वे विपक्ष के आदमी हैं। हमने देश को विकास की गाड़ी में रवाना कर दिया है और आप अपना पुराना-बासी दिमाग लिए चल रहे हैं। विकास की गाड़ी द्रुत गति से चला रही है। आप कहते हैं कि नहीं-नहीं कुछ नहीं बदला। आपको बस अपने वाला बदलाव और विकास दिखाई देता है। यह सारासर गलत है कि आप अपने विकास को विकास मानें और हमारे विकास को पप्पू। पप्पू तो अपा है कि सब कुछ आपको स्थिर और गर्त में जाता हुआ दिखाई दे रहा है।
हमारे माननीय और माननीय इतनी दौड़-भाग कर रहे हैं। उनकी गतिशीलता आपको निर्थक लगती है! अब समझ आ गया है कि आप राष्ट्रविरोधी हैं। सांप्रदायिक हैं। आतंकवादी है। राष्ट्रद्रोही है। ऐसे जितने भी जो कुछ हो सकते हैं, वे सब आप हैं। हम आप के कार्य-व्यवहार और हर बात-बात पर टांग खींचने की आदद से परेशान हो गए हैं। अब एक प्रस्ताव पारित होगा। देश में जिन जिन नागरिकों को बदलाव दिखाई नहीं दे रहा है उन्हें अनिवार्य रूप से अपने दिमाग के बारे में घोषणा-पत्र देना होगा। आप लिखकर देंगे कि आपने अपने दिमाग को बदला है अथवा अभी बदलना शेष है। यदि बदलना शेष है तो आप कब तक दिमाग बदल लेंगे। आपका खुद का दिमाग देश की प्रगति में बाधा है। आपको इक्कतीस दिसम्बर तक एक अंतिम अवसर दिया जाता है।
पंच काका कहते हैं कि हम सभी के पास दो दिमाग होते हैं। एक लेफ्ट और दूसरा राइट। यह सारा झगड़ा लेफ्ट-साइट का है। लेफ्ट वाला कहता है कि मैं सही हूं और राइट वाला कहता है मैं। दोनों मत एक नहीं है। जरूरत इस बात कि है अब हम सकारात्मक सोचें। स्थिर दिमाग अपनी स्थिरता के कारण अवरूद्ध हो जाता है। दिमाग को स्थिर रखना गलत है। दिमाग को स्थिर अथवा खाली नहीं रखें, उसे घुमाते रहें। आप खुद घूमते रहें और दिमाग भी घूमाते रहें। यही एक कारगर तरीका है जिससे कुछ बदल सकते हैं और कुछ बदला हुआ देख सकते हैं। यह भूल जाएं कि कोई आएगा और आपका दिमाग बदलेगा, यदि बदलाव चाहते हैं तो आपको अपना दिमाग बदलना होगा।
डॉ. नीरज दइया 

18 सितंबर, 2017

सदा असत्य बोलो अधिनियम

डॉ. नीरज दइया
कोई माने ना माने पर देश में असत्य के प्रयोग हो रहे हैं। कहा जाता था- सच्चे का बोलबाला, झूठे का मुंह काला। अब इतने काले मुंह देख लिए कि सभी के चेहरे सफेद हो चुके हैं। काले मुंह वाले भी खुद से अधिक काले मुंह वालों की तरफ अंगुली कर दिखाने लगे हैं। कहते हैं कि हम उनसे तो ठीक है। समझ ने काम करना बंद कर दिया। अब ठीक-गलत सब गड़मड़ है। दाढ़ी-मूछों में बाबा लोग काला मुंह छिपा कर रखते रहे। अब उनकी काली करतूतें कोर्ट से प्रमाणित हो रही है। संदेह है कि इतनी कालिख क्या स्वच्छता अभियान साफ कर पाएगा।
हम काले हैं तो क्या हुआ दिलवाले हैं। जो दिलवाले हैं वे ही काले-काले नजर आते हैं। हे ढोंगी बाबाजी! अब सब साफ हो गया है कि आपकी पूरी दाल काली थी। काली दाल खाकर सब कुछ काला हो गया। यहां तक कि गांठ का धन भी काला हो गया। नोटबंदी के बाद काले और सफेद धन में ऐसी कुश्ती हुई कि देश की जनता मूर्ख बनी। अगली-पिछले सारी बातें भूल गए। किसने क्या कहा और कब कहा? हमने जान लिया कि हिसाब रख कर परेशान होने में लाभ नहीं है। आज लाठी आपके पास है तो भैंस आपकी है, कल को अगर यही लाठी हमारे हाथ आ जाएगी तो फिर भैंस भी हमारी ही होगी। दुनिया इसी का नाम है, यहां तो चला चली का खेला है। कभी धूप तो कभी छांव। कहते हैं काठ की हांडी बार-बार नहीं चढ़ती पर जानता का मन भी अजीब है। वह खुद की तुलना में देश का लाभ अधिक देखती है।
देश को लाभ हो तो जनता को लाभ हो। कहते हैं कि देश में नोटबंदी के बाद करदाताओं की संख्या में विरोधाभास है। जो ऐसा कहते हैं वे देश के विकास को रोकना चाहते हैं। माना यह सच्चाई है- आंकड़ों को अलग-अलग श्रोत, एक जैसा नहीं दे पा रहे हैं। हमें इन चक्करों में उलझना नहीं चाहिए। हमारे लिए बस इतना जानना काफी है कि नए व्यक्तिगत करदाताओं की संख्या में अधिक इज़ाफा हुआ है। अब प्रधानमंत्रीजी ने कितना बताया और वित्तमंत्रीजी ने क्या कहा को छोड़ देना चाहिए। हमें इस बात में सुख की अनुभूति करनी चाहिए कि देश में आयकर रिटर्न भरने वालों की संख्या भारी मात्रा में बढ़ गई है। देखिए अधिक कर आएगा तो विकास भी अधिक होगा। इसमें हमारा लाभ ही लाभ होगा।
पंच काका का सुझाव है- देश को सदा-सदा के लिए आंकड़ों के जाल से मुक्त करने के लिए ‘सदा असत्य बोलो अधिनियम’ बनाया जाना चाहिए। जिसके अंतर्गत सब को यह छूट दी जानी चाहिए कि आगे कहीं किसी प्रसंग में आंकड़ों की बात होगी तो आंकड़ा लिखा ही नहीं जाए। बस उस आंकड़े की जगह डेस-डेस-डेस लिख दिए जाएगा। ये तीन डेस देकर देश की जनता को छूट होगी कि वे अपनी मर्जी से आंकड़ा भरे। यह देश हम सब का है। इसके विकास को हम सब बताएंगे। लोकतंत्र सबका है इसलिए विकास को सभी देखें। यह ठीक रहेगा कि सब अपने-अपने हिसाब से आंकड़े भरें। सारी जिम्मेदारी और जबाबदेही मंत्रियों पर क्यों हो? ऐसा करने से फायदा ही फायदा होगा और कोई किसी को यह नहीं सकेगा कि सर आंकड़ों में फर्क है। अगर इसके बाद भी कोई कहता है तो कह सकते हैं कि भैया तेरे डेस-डेस-डेस में तू अपने हिसाब से सही आंकड़ा भर कर चुप बैठ।
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हॉट सीट की हॉट कथा

नुमति है और अनुमति नहीं है के बीच बस एक ओब्लिक रहता है। अधिकारी की मर्जी है कि वह इन दोनों में से किसे चुने। कभी वह खुश कर देता है तो कभी दुखी कर देता है। हरे पेन की इंक बर्बाद करते हुए कुछ अधिकारी एक तरफ टिक लगाते हैं तो दूसरे विकल्प को पूरा काटना नहीं भूलते। माना छुट्टी किसी कर्मचारी का अधिकार नहीं है, फिर इसे आप अधिकार में लेते हुए आपनी इच्छा हो दिया करें। आपका मूड हुआ कि आज फलां कर्मचारी को छुट्टी देनी है, तो उसे पहले ही सूचित कर दिया जाना चाहिए कि आज तुम आराम करो। हो तो यह भी सकता है कि कर्मचारी दफ्तर आए और जैसे ही वह हाजरी रजिस्टर के हाथ लगाने के हो आप उसे कह दें- आज आपको छुट्टी दी जाती है।
हे अफसर देवता! छुट्टी देने अथवा नहीं देने का आपका फैसला सदा सुरक्षित है तो इसमें कर्मचारियों को भी हो-हल्ला नहीं करना चाहिए। यह कैसी लीला है कि अफसर देवता के ऊपर भी कोई दूसरा देवता या सरकार विरजमान है। यह तो जैसे को तैसा वाली बात हो गई। बिदाई संभाषण वाली तीसरी शक्ति अब भी सक्रिय है। सभी छोटे-बड़े सभी कर्मचारियों को अपने से ऊपर के अधिकारियों की अनुमति लेनी होती है। मैं तो अनुमति लेने का इतना आदि और अभ्यस्त हो गया हूं कि लघुशंका भी साहब को पूछ कर करता हूं। वे मना कर देते हैं तो इंतजार करता हूं, थोड़ी देर बाद फिर निवेदन करता हूं- साहब जोर की लगी है, आप का हुकम हो तो फारिग हो आऊं? ऐसे निवेदन पर साहब पसीजते हैं। वे मुस्कान के साथ पूरे दांत दिखाते हैं। उन्हें लगने लगता है कि सब से बड़ा साहब मैं ही हूं। मेरी भी इच्छा हुई कि कौन बनेगा करोड़पति कार्यक्रम में हिस्सा लूं, पर साहब ने रोक दिया और मैं रुक गया।
छत्तीसगढ़ का समाचार पढ़ कर मुझे बड़ा सुख मिला कि वहां की एक ट्रेनी डिप्टी कलक्टर अनुराधा अग्रवाल को 'कौन बनेगा करोड़पति' में भाग लेना की अनुमति नहीं है का पत्र देरी से मिला। यह तो अच्छा हुआ वे कार्यक्रम कर चुकी थी। कानून और अफसर दोनों को अंधा रहना चाहिए। संवेदनशीलता जाग्रत होने की जरा भी संभवना नहीं रखनी चाहिए। भले ही अनुराधा जी विकलांग हो और वॉकर के सहारे चलती हो। भले ही वे कार्यक्रम से जीती हुई रक़म से अपने भाई की किडनी का इलाज़ करना चाहती हो। वैसे यह उनके घर का निजी मामला है। और देखिए कार्यक्रम की शूटिंग के एक दिन पहले उनकी मां का निधन हो गया तो यह भी ईश्वर की मर्जी है, इसमें सरकार का कहां कोई दोष है। यह ईश्वर का संकेत था कि तुमको कार्यक्रम के लिए अनुमति नहीं मिलने वाली। पंगा होगा, रुक जाओ पर अमिताभ बच्चन के साथ हॉट सीट पर बैठना किसे अच्छा नहीं लगता। आप गई तो देखिए कितनी बातें हो गई ऊपर से लेकर नीचे तक।
पंच काका कहते हैं कि अमिताभ बच्चन के साथ हॉट सीट पर बड़े अफसर नहीं बैठ सके तो वे अपने से छोटे अधिकारियों को बैठने का भला अवसर क्यों देने लगे। नेताओं को मुद्दा मिलना चाहिए कि वे किस तरह किस को घेर सकते हैं। वैसे यह भी ठीक है कि राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ में शामिल होने की अनुमति प्रशासनिक अधिकारियों को बाकायदा अधिसूचना जारी कर दी जाती है और हॉट सीट को इतना हॉट कर दिया जाता है।
० डॉ. नीरज दइया
 

12 सितंबर, 2017

टॉलस्टॉय की टोपी

मैं लेखक हूं पर दिखता नहीं हूं। मुझे देखकर कोई भी लेखक नहीं कहता। देखने में मैं बिल्कुल आम आदमी जैसा हूं। जो भी मुझे से मिलता है यही कहता है कि मैं लेखक जैसा दिखता नहीं हूं। अपनी ऐसी तारीफ सुन-सुन कर कोई कब तक धीरज रखेगा। आखिरकार धीरज को जबाब देना था दे दिया। मुझे महसूस होने लगा कि जब मैं लेखक हूं तो लेखक जैसा दिखाई क्यों नहीं देता हूं। अगर लेखक जैसा दिखाई दूं तो हर्ज ही क्या है? सभी समकालीन लेखक तो लेखक जैसे दिखते हैं फिर मैं आम आदमी जैसा क्यों बना रहूं। वैसे यह गलत भी तो है कि कोई लेखक हो और वह देखने में लेखक जैसा दिखाई ही नहीं दे। इस गलती को मेरे अलावा कौन सुधार सकता है। अब मैं लेखक की तरह दिखना चाहता हूं।
    मुझे खुद के लिए कुछ भी करूंगा। मैं जो हूं वही तो दिखाई देना चाहिए। समस्या यह भी है कि इधर के आलोचक भी मुझे लेखक कम और आम आदमी अधिक मानते हैं। अब आप ही बताएं कि कोई इतने वर्षों से कोई लिख रहा हो और उसे लेखक नहीं माना जाए तो वह क्या करे! यह तो सरासर नाइंसाफी हुई ना। आपको और मुझे ही नहीं वैसे सबको पता है कि सबके अपने-अपने ग्रुप हैं। मैं उनके ग्रुप में नहीं हूं तो मेरा यह हाल है। वैसे मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता है। और अगर पड़ता भी है तो मैं प्रत्यक्ष में यही कहूंगा कि मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। मैं लेखक हूं और किसी आलोचक के कुछ कहने-सुनने से आम आदमी नहीं हो जाऊंगा। ऐसी साहित्य विरोधी घटनाओं और गतिविधियों से आहत होकर मैं लिखना-पढ़ना बंद नहीं कर सकता। मैं तो यहां तक छाती ठोक कर कहता हूं कि कोई पाठक भी अगर मुझे रिजेक्ट करता है तो कर दे मेरी बला से। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता। मुझे किसी पाठक ने लेखक नहीं बनाया है। फिर यहां यह भी बता दूं जो पाठक मुझे लेखक नहीं मानते हैं, मैं उन्हें पाठक भी नहीं मानता हूं।
    भारतीय लेखकों को देखता हूं तो सब अलग-अलग मिजाज के दिखाई देते हैं। उनमें ऐसी कोई उभयनिष्ठ चीज है ही नहीं कि मैं अपना लूं। अब मेरी दूरदृष्टि का कमाल देखिए। लगभग सारे विदेशी लेखक हेट लगया करते थे और लगते हैं। मैंने भी हेट लगाने की सोच ली। तीन-चार नेहरू टोपी ले तो आया पर बात जमी नहीं। देशी टोपी की यही औकात है कि उन्हें लगाते ही लोग मुझसे पूछने लगे कि क्या अबकी चुनाव में खड़े होने का इरादा है? कहलाना चाहता था लेखक और लोग कहने लगे नेताजी। लेखक को नेताजी कहें तो गाली जैसा लगता है।
    पंच काका की शरण में गया। उनसे सारी कथा कही। उन्होंने संदूक से एक टोपी निकाल कर मुझे देते हुए कहा- इसे पहन कर अब ठाठ से घूम। यह टॉलस्टॉय की टोपी है। कोई पूछे तो नाम बता देना। सबकी बोलती बंद हो जाएगी। फिर उन्होंने काम की बात बताई कि लेखक होने या दिखने से जरूरी है हमारा चिंतन-मनन। ईश्वर ने हम सब को पांच तत्त्वों से बनाया है पर कोई किसी के जैसा नहीं। ऐसी होती है रचना की मौलिकता। शब्द सभी के पास समान हैं पर उनको रचना में अपनी मौलिकता के साथ प्रयुक्त करना आना चाहिए। एक लेखक को अपनी भाषा गढ़नी और कमानी होती है, तभी वह लेखक कहलाता है।

नीरज दइया

10 सितंबर, 2017

बड़े लोगों की बड़ी बातें

   जो आसानी से समझ आ जाए, वह छोटी बात होती है। जो आसानी से समझ नहीं आए, वह बड़ी बात होती है। छोटी बात छोटे लोग करते हैं। बड़ी बात बड़े लोग। छोटे लोगों की छोटी-छोटी बातें करने वाले लेखक छोटे होते हैं और बड़े लोगों की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले लेखक बड़े। बड़ा लेखक और बड़े लोग कभी नहीं चाहते कि वे छोटे लोगों के समझ में आने लायक कोई छोटी बात करें, किंतु छोटे लेखक और छोटे लोग हमेशा इसी अभिलाषा में मरते हैं। वे चाहते हैं कि कुछ बड़ी बात हो जाए, वे भी बड़े लोगों की श्रेणी में पहुंच जाएं। उनका जीवन भी धन्य हो जाए। पर नहीं होता।
    मैं बहुत चाहता हूं कि कुछ ऐसी बात करूं जो आपके बिल्कुल समझ में नहीं आए। सिर के ऊपर से निकल जाए। आप उसे लेकर पहले तो खूब माथा-पच्ची करें कि कहीं कोई पेंच मिल जाए और बाद में उसे साझा करते हुए अपने दोस्तों को भी परेशान करें कि समझाओ इसका अर्थ। मैं छोटा वाक्य लिखता हूं और आप तक बात पहुंच जाती है। मैं बड़ा वाक्य लिखता हूं तब भी आप अर्थ समझ जाते हैं। मैं करूं क्या? ऐसा कैसे क्या लिखूं कि आप अटक जाएं, भटक जाएं। 
    वैसे गुणी जनों का मानना है कि कोई बड़ी और ना समझ में आने वाली बात हमें छोड़ देनी चाहिए। उसे समझने की जरूरत ही नहीं होनी चाहिए। जो बड़े हैं और जो बड़ी बातें है, उन्हें बिना समझे ही बड़ी बात मान कर उन्हें बड़ी बात बने रहने देना चाहिए। ऐसी बड़ी बातें लिखने वाले बड़े लेखकों की बड़ी-बड़ी किताबें बड़े-बड़े प्रकाशक प्रकाशित करते है। वे बिकते हैं। उनका नाम बिकता है। उन्होंने क्या और कैसा लिखा है? इसकी चिंता वे नहीं करते। जो बिकता है उसे समझने-समझाने की जरूरत ही क्या है? वे बाजार की नब्ज पहचानते हैं। उनके जुमले चलते हैं। उन्हें बाजार की गति और लय का पुराना अनुभव होता है। वे अपनी बड़ी बातों के लिए बाजार बनाना जानते हैं। उनके संस्थान और उनसे उपकृत संस्थानों में खेल चलता है। पैसों का खेल है और खेल सारा पैसों के लिए है। बाप बड़ा ना भैया सबसे बड़ा रुपया।
    बड़े लोग कभी नाक को सीधी पकड़ते हैं और कभी घुमा कर पकड़ते हैं। जब जरूरत होती है अपने नाक-कान सब पकड़ लेते हैं। इनके नाक का कमाल है कि उन्हें पहले से खुशबू आ जाती है कि नाक कटने वाली है। परिस्थियों को देखते हुए वे अपनी नाक लंबी कर लेते हैं और नाक कटा भी लेते हैं। नाक कट चुकने के बाद भी देखने में नाक की लंबाई पहले जितनी ही नजर आती है। वे कहते हैं कि देखो नाक तो सही सलामत है। उनके नाक लंबी करने और कट जाने पर भी सामान्य आकार के रहस्य को हर कोई जान नहीं सकता। यह रहस्य भी उनके अर्थ से परे होता है। अर्थ होता है तो भी दिखाई नहीं देता। उनकी ऐसी महिमा अपरमपार है।
    पंच काका कहते हैं कि बड़े लोग अर्थ लेना जानते हैं, देना जानते ही नहीं! बड़े लोग बड़े पदों पर रहे होते हैं। सबके लिए तीन शब्द शक्तिया होती हैं पर उनके लिए ऐसी चार। यह चौथी शब्द-शक्ति ही है जिसमें वे अर्थ को गायब कर चुके होते हैं। वे जीवन पर्यंत अनेक शक्तियों से तीन-पांच करते इतना निचोड़-निचोड़ कर अर्थ प्राप्त कर चुके होते हैं कि आम भी गायब और गुठलियां भी गायब। यानी अर्थ और रस सफाचट्ट !
० डॉ. नीरज दइया

09 सितंबर, 2017

हम सब बैलों की कथा

हले गायें और भैंसे बोलती नहीं थी। ऐसा नहीं कि पहले उनके मुंह में जुबान नहीं थी। जुबान तो थी पर कोई कानून ऐसा नहीं था कि वे बोलें। सामाजिक चेतना आने से धीरे-धीरे गायें-भैंसें मुख्य धारा में आने लगी। आजकल गायों-भैंसों का जमाना है। ऐसा कोई क्षेत्र बचा ही नहीं है जहां गायों-भैंसों ने एंट्री ना ले ली हो। जहां देखो वहां कोई न कोई गाय-भैंस नजर आ ही जाएगी। अब कहने वाले भले कहते रहें कि कुछ सिरफिरे गधों का ये सब किया धरा है। हो गया सो हो गया, अब क्या किया जाए?
घर के नमक-मिर्च और खाने के चक्कर बेचारा बंधा बैल में रहता है। कोल्हू के बैलों को समय ही नहीं कि वे इस बारे में सोचे। आजाद धूमते सांड भला इस विषय पर ध्यान क्यों देंगे? खुला सांड मंडी में आजादी से घूमता है, कहीं भी कुछ भी खाता है। वह जम कर पीता भी है। जो बहुत तगड़ा है वह दिनोंदिन तगड़ा होता जा रहा है। जो इस रेखा के नीचे हैं उसको तो रोने की आदत है। वह बस रोता रहेगा। वैसे रोने-धोने वाले बैलों के लिए आज खुशी का दिन है। वे बड़े खुश हो रहे है कि केंद्र सरकार ने अदालत में चल रहे 'मैरिटल रेप' के मामले में कह दिया है कि इसे अपराध की श्रेणी में नहीं रखा जाना चाहिए। भला हो केंद्र सरकार कि उसने दिल्ली हाईकोर्ट में दलील दी- मैरिटल रेप को अपराध मानने से विवाह संस्था अस्थिर हो जाएगी और पतियों को परेशान करने का ये एक नया हथियार मिल जाएगा।
हथियार किसी के पास हो वह काम के समय काम आए, तभी उसकी सार्थकता है। बैलों के पास सींग होते हैं पर वे भला खुले सांड जैसे उनका प्रयोग कहां कर सकते हैं। बैल जब कोल्हू में जोता जाता है तो उसके गले में घंटी बांध दी जाती है। आंखों के आगे गांधारी स्टाइल में पट्टी बांध दी जाती है। बेचारा खोल भी नहीं सकता। कहते हैं कि चूहे बिल्ली के गले में घंटी नहीं बांध सकते। यहां तो दर्द ही दूसरा कि ऐसे-ऐसे कानून बना दिए गए हैं कि अब बैल चूं भी नहीं कर सकते। गनीमत केंद्र सरकार ने इस बार तो बचा लिया। कितने भले दिन थे जब मनोज कुमार ने अपनी फिल्म में सुनहरे दिन दिखाए थे। बैलों के गले में जब घुंघरू जीवन का राग सुनाते हैं, गम कोसों दूर हो जाता है, खुशियों के कमल मुस्काते हैं। हाय री किस्मत, आज खुशियों के कमल ने बचा लिया। पर कहां गई खुशियां!
गायों और भैंसों से पीड़ित-प्रताड़ित बैलों ने अनेक संघ हैं। एक स्वर में वे गाते हैं- जाने कहाँ गये वे दिन, कहते थे तेरी राह में नज़रों को हम बिछाएंगे। कुछ मजाक-मस्ती करते हैं। दुखी आत्माओं का यही तो सुख है कि थोड़ी मजाक-मस्ती से जी बहला लेते हैं। चूहा ने सारी विस्की पी कर एक बार बोला- कहाँ है बिल्ली। और फिर क्या था दुम दबा के बिल्ली भागी। उस दिन भले बिल्ली भागी हो पर आज तक किसी चूहे की फूटी किस्मत नहीं जागी। कोल्हू में बंधना एक रिस्की खेल होता है। इस बार बेड़ा पार हो गया, पर हलाल करने वाली तलवार अब भी लटक रही है।
पंच काका का कहना है कि इस युग का एक ही यथार्थ है- हैंडल विथ केयर। जिसकी लाठी उसकी भैंस भूल जाओ, अब तो जिसकी भैंस उसी की लाठी। जरा संभल कर काम लो इनसे। काका ने मुझे कहा कि मैं अपना उपनाम ‘चंडीदास’ रख लूं! 


डॉ. नीरज दइया

01 सितंबर, 2017

भोग और उपभोग में दर्शन

 डॉ. नीरज दइया
    जीवन बड़ा अनमोल है। बार बार नहीं मिलता। ना जाने कितने-कितने जन्म लगते हैं। कितने-कितने पुण्य करने पड़ते हैं। फिर कहीं जाकर यह जीवन मिलता है। मनुष्य जीवन पूरी पुण्य-प्रक्रिया का प्रसाद है। योगी और भोगी दोनों मानते हैं- मनुष्य योनी बार बार नहीं मिलनी। मिली है तो भोग लो भैया! नहीं तो मन की मन में रह जानी है। मनुष्य की यही अवस्था श्रेष्ठ है।     इससे भी जरूरी और असली बात- कल किसने देखा? जो भी है बस यही इक पल है। किसी पल में जैसा-कैसा प्यार मिले, ग्रहण कर लेना चाहिए। पल चला जाता है फिर गाना गाते रहो- पल भल के लिए कोई हमें प्यार करले, झूठा ही सही। गाने-बजाने से कुछ नहीं होता।
    जीवन में सब कुछ करना पड़ता है। आप मरे बिना स्वर्ग नहीं मिलता। भारतीय के पास तो जहां देखो दार्शनिकता भरी पड़ी है। वस उसे सच्चाई के रूप में ग्रहण करने की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए अपाने सुना होगा- कल हो ना हो। यह कोई नई और ताजा बात नहीं। इस नाम से फिल्म भी बनी पर कबीर ने तो वर्षों पहले लिखा छोड़ा था- काल करै सो आज कर, आज करै सो अब। यह गूढ़ रहस्य जान लेना चाहिए कि कवि सदा सच लिखते हैं और सच के सिवाय कुछ नहीं लिखते हैं। या फिर ऐसे समझ लें कि वे जो भी लिखते हैं, सच हो जाता है। जैसे कवि प्रदीप ने लिखा था- राम के भक्त रहीम के बंदे, रचते आज फ़रेब के फंदे। कितने ये मक्कर ये अंधे, देख लिये इनके भी धंधे। इन्हीं की काली करतूतों से बना ये मुल्क मशान। देखिए मिल गया ना सूत्र।
    सूत्र यह है कि हम जिस समाज में रहते हैं उसमें भोग को सीधे-सीधे ग्रहण करना खतरनाक है। भोग तो राम और रहीम सभी करते हैं। जो भोग बचा रहता है उसे उपभोग उनके चेले-चेलियां करते हैं। सच्चाई तो यह भी है कि भोग पर पुण्य का आवरण अनिवार्य है। ऐसा कौन मूर्ख है जो यह नहीं मानता कि मनुष्य योनी भोग और उपभोग का समुच्चय है। यह बात अलग है कि बहुत बार भोग और उपभोग की श्रेणियां इतनी घुल-मिल जाती है कि उन्हें पृथक-पृथक नहीं कर सकते हैं। नेमी-धर्मी और ज्ञानी आदमी इन चक्करों में नहीं उलझता। वह तो वह ग्रहण करता है। कभी भोग को उपभोग बनाकर और कभी उपभोग को भोग बनाकर।
    पंच काका कहते हैं- जिंदगी चार दिन की है। रोज-रोज की किच-किच किस काम की। जीवन ठाठ भोग और उपभोग में है। बिना ठाठ-बाट के लोग आदमी को आदमी समझते नहीं। अनुभव की बात बता रहा हूं- कभी कभी तो आदमी भी खुद को आदमी नहीं समझता। यह कोई दर्शन नहीं हकीकत है- कभी कभी तो घर में घरवाली तक अपने आदमी को भेड़िया की संज्ञा दे डालती है। अगर घरवाली ऐसा कहेगी तो आदमी अपनी औकात पर आ जाता है। वह उसे कुतिया जैसे घटिया शब्द से विभूषित करता है, बदले में आदमी भेडिये से कुत्ते की श्रेणी में आ जाता है। यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। दूसरे शब्दों में कहा जा सकता है कि उन दोनों की यह दर्शनिकता है कि वे अलगा-पिछला सब कुछ देख लेते हैं। इतनी योनियां पार करते हुए अब मनुष्य जीवन मिला है तो क्या हुआ, कभी कुत्ते-कुतिया और भेडियों के संग रहे हैं। ऐसे में इस जीवन में उनके कुछ लक्षण तो अटके-भटके आ ही गए होंगे। तभी तो ऐसा है।

30 अगस्त, 2017

शाश्वत जीवन और छलांग

    कुछ चीजें जो हम पाना चाहते हैं, वे  कैसे मिल सकती है? कहते हैं कुछ चीजें सोचने से मिलती हैं। जो पाना है उसके बारे में सोचते रहो और वे एक दिन मिल जाएंगी। सोचने की अवधि के बारे में कुछ विवरण नहीं है। यह उस चीज और आपके सोचने की क्षमता पर निर्भर है। यह बड़ी गहरी बात है। एक दूसरी बात कि कुछ चीजों को पाने के लिए बिना सोचे-समझे छलांग लगानी पड़ती है। अगर आप कुछ चीज को पाने के लिए छलांग लगाते हैं और आपके हाथ-पैर या कुछ भी टूट-फूट होती है तो जिम्मेदार मैं नहीं हूं। यह ज्ञान मेरा नहीं है। यह गहन चिंतन-मनन भगवान ओशो का है। वे तो यहां तक कह गए हैं कि जिस किसी ने कहा होगा कि कोई भी छलांग लगाने के पहले हजार बार सोचना चाहिए, कहने वाला कोई कायर या कमजोर रहा होगा। बकौल ओशो- छलांग पहले लगा लो, सोचना कभी भी। शाश्वत जीवन पड़ा है, जब दिल आए सोच लेना, मगर छलांग तो लगा लो। ठीक बात है बाद में अस्पताल या घर में पड़े-पड़े आराम से सोचा जा सकता है। वैसे जेल सोचने के लिए बेहद उपयुक्त जगह है। जेल में सोचने और सोचने के अनेक प्रमाण हम अनेक कृतियों के रूप में गिना सकते हैं, जो जेल में लिखी गई हैं। 
    बिना सोचे और कम सोचे छलांग लगाने वालों में युवा पीढ़ी बड़ों को भी पीछे छोड़ चुकी है। खेल खेल में वे छलांग लगा कर मौत को गले लगा लेते हैं। कभी प्रेमी छलांग लगाता है कभी प्रेमिका। कभी खुशी में छलांग लगाई जाती है तो कभी गम में। कभी मिलन में छलांग का दृश्य आता है और कभी विरह में। छलांग के बारे में इसलिए ओशो ने कहा कि सोचना नहीं है। पीछे घरवालों के बारे में अपने परिवार और मित्रों के बारे में बिल्कुल सोचने नहीं है। क्यों कि सोचने वाला छलांग लगा ही नहीं सकता। कहते हैं कि जितनी चादर है उतने पैर फैलाओ की बातें ऐसे लोगों पर लागू नहीं होती है। उनका मानना है कि पैर लंबे हैं तो क्या काट लें? हम तो खुल कर और जी भर के पैर फैलाएंगे। कर्ज लेकर चादर को लंबा-चौड़ा करेंगे, और बाद में छलांग लगाएंगे। ऐसी छलांग में देश से भाग जाने वालों के अनुपम उदाहरण हम जानते हैं। नीति और धर्म की बातें बताने वाले ही जब अलमस्त हो कर छलांगें लागने में व्यक्त है तो फिर रोकने वाला है कौन? समझाने वाला ही मूर्खताएं करें तो फिर किसे दोष ? 
    देश में ओशो को मानने वाले बहुत है। धर्मगुरु और बाबाओं ने भी ओशो के इस चिंतन पर ममन किया और कई छलांग लगा चुके हैं, कुछ तैयारी में है। बिना सोचे-समझे छलांग लगा कर सफलता हासिल करने का सुख तो उन्हें मिला ही किंतु बाद में जो कुछ हुआ और जो कुछ हो रहा है वह बस नसीब की बातें है। पहुंचे हुए धर्मगुरु, साधु, संन्यासी जो कहते हैं करते हैं उनमें इतनी गूढ़ता होती है कि सामान्य व्यक्ति के समझने की बात होती ही नहीं। वे ईश्वर की भांति इस संसार में लीला करने आते हैं और कुछ की लीला गुप्त रहती है कुछ की जगजाहिर हो जाती है। बापू आशाराम से राम-रहीम की यात्रा में यही हुआ कि आम आदमी हैरान हो गया। सामान्य आदमी की तो औकात ही क्या, इस खेल को तो विशिष्ट आदमी भी देखते रह गए।
    पंच काका कहते हैं कि यह होना स्वभाविक था, क्योंकि छलांग शब्द को गंभीरता से देखें। इसमें अनेक ध्वनियां और अर्थ छुपे हैं। छलांग में जो ‘लांग’ है वह धोती की लांग का संकेत हैं। छ वर्ण असल में छह की ध्बनि देता है। वे तो यहां तक मानते हैं कि छलांग में मूल शब्द ‘छल’ है और उसमें ‘अंग’ जोड़ कर छलांग बना है। छल और अंग की व्याख्या ऐसे संतों ने अपने अपने ढंग से की है। 
     ० नीरज दइया

25 अगस्त, 2017

मधु आचार्य ‘आशावादी’ का होना

डॉ. नीरज दइया
यह संयोग है कि मधु आचार्य ‘आशावादी’ का जन्म 27 मार्च, 1960 को विश्व रंगमंच दिवस के दिन हुआ। यह भी संयोग है कि विद्यासागर आचार्य के आंगन में हुआ जिन्होंने नाटक के लिए अपने दोनों बेटों को समर्पित कर दिया। संभवत: इसी कारण और अपनी लगन के बल पर मधु आचार्य ने नाटक, रंगमंच, पत्रकारिता और साहित्य में ऐसा मुकाम हासिल किया, जिस पर देश और दुनिया की नजर है। कवि-कथाकार मित्र राजेन्द्र जोशी के शब्दों में कहें तो मधु आचार्य ‘आशावादी’ का होना और बीकानेर जैसे शहर में होना, अपने आप में बहुत मायने रखता है। बीकानेर एक ऐसा शहर है जिसमें रचनात्मकता के ऐसे बीज हैं जो अपना पर्यावरण खुद निर्मित कर लेते हैं। यहां कला, साहित्य और संस्कृ ति की एक अखूट परंपरा रही है जो निरंतर प्रवाहशील होते हुए मधु आचार्य तक पहुंचती है। नाटक और साहिय के संस्कार अगर घर में मिल जाए तो किसी के कला माध्यम में कुछ खास करने की संभावनाएं बढ़ जाती है। आनंद वी. आचार्य और मधु आचार्य ‘आशावादी’ इसके प्रमाण हैं कि जिन्होंने अपने पिता की थाती को धरोहर की तरह न केवल संभाला, बल्कि उसे विकसित भी किया। मधु आचार्य के साथ एक संयोग चेतना आचार्य से विवाह के साथ जुड़ा। इसे संयोग इसलिए कह जाएगा कि पिता के साथ ससुर भी साहित्यिक परंपरा से जुड़े होने से पूरी पारिवारिक पृष्ठभूमि मधु आचार्य के साथ जुड़ती है और दूर तक चलती है। बीकानेर के जनकवि बुलाकी दास ‘बावरा’ ने अपने समय में मंचीय कवि के रूप में धूम मचा रखी थी। उनका आशीर्वाद आचार्य के साहित्यिक-संस्कारों को द्विगुणित करने वाला कहा जा सकता है।
बाल्यकाल से ही मधु आचार्य का अनेक विख्यात नामों के साथ पारिवारिक जुड़ाव रहा। शिक्षा और साहित्य के वातावरण में पले-बढ़े छात्र मधु ने जीवन में अनेक मुकाम पार करते हुए, राजनीति विज्ञान से एम. ए. तथा एल.एल.बी. की शिक्षा ग्रहण की। अध्ययन के दौरान गुरु-मार्गदर्शक के रूप में भवानी शंकर शर्मा का सान्निध्य मिला। विभिन्न मंचों पर अनेक नाटकों में कलाकार और निर्देशक की भूमिकाओं का सफल निर्वाह करने वाले मधु आचार्य ने कभी किसी काम से गुरेज नहीं किया। उनके संस्कार ही ऐसे थे कि स्टेज पर और जीवन में भी किसी भी काम को कभी छोटा-बड़ा नहीं समझा। वर्षों तक नाटक के लिए कुछ भी करने और करवाने का जुनून-जिद पालते रहे। इसी यात्रा में आपने 75 नाटकों का निर्देशन और 200 से अधिक नाटकों में अभिनय कर एक कीर्तिमान स्थापित किया। साहित्य सृजक के रूप में वर्ष 1990 से जुड़ाव हुआ। तब से अब तक विविध विधाओं मंन निरंतर लिख-पढ़ रहे हैं। ‘स्वतंत्रता आंदोलन में बीकानेर का योगदान’ विषय पर शोध-कार्य भी किया है।
साहित्य-लेखन की यात्रा का आगाज राजस्थानी नाटक ‘अंतस उजास’ (1995) से हुआ। यह एक प्रयोग था कि किसी जन कवि की कविताओं को नाटक में प्रयुक्त किया जाए। मंच पर लोक-रंग को बिखेरने वाला यह नाटक जितनी बार मंचित हुआ सफल रहा। बाद में यह नाटक राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृ ति अकादमी, बीकानेर की पांडुलिपि प्रकाशन योजना के अंतर्गत प्रकाशित हुआ। पत्रकारिता से जुड़े मधु आचार्य ‘आशावादी’ के दैनिक राष्ट्रदूत से दैनिक भास्कर तक की यात्रा के अनेक मुकाम और पड़ाव हैं। रंगकर्मी-नाटककार और पत्रकार के रूप में अपना लौहा मनवा चुके आशावादी ने साहित्य में ‘गवाड़’ के माध्यम से जैसे दूसरी पारी का श्रीगणेश किया। इस बार साहित्य-प्रांगण में एक के बाद एक और कभी एकसाथ अनेक पुस्तकें और विधाओं में अपनी रचनात्मकता प्रस्तुत करते गए, जो अब भी जारी है। विशाल अनुभव लिए मधु आचार्य ‘आशावादी’ ने साहित्यिक दुनिया को नवीन आभा देने का प्रेरणास्पद आगाज बीकानेर में किया है। प्रकाशन के बाद भव्य लोकार्पण अपनी पूरी टीम के साथ मिलकर करने में वर्तमान समय और समाज में साहित्य की गरिमामय पुनस्र्थापना का लक्ष्य अंतर्निहित है।
अब तक राजस्थानी में प्रकाशित पुस्तकें हैं- ‘गवाड़’, ‘अवधूत’, ‘आडा-तिरछा लोग’, ‘भूत भूत रो गळो मोसै’ (उपन्यास); ‘ऊग्यो चांद ढळ्यो जद सूरज’, ‘आंख्यां मांय सुपनो’, ‘हेत रो हेलो’ (कहानी-संग्रह); ‘अमर उडीक’, ‘अेक पग आभै मांय’ (कविता-संग्रह)। आपने शिक्षा विभाग, राजस्थान के लिए ‘सबद साख’ (विविधा) पुस्तक का संपादन भी किया है। हिन्दी में भी विविध विधाओं में 26 पुस्तकें अब तक प्रकाशित हुई हैं। यथा- ‘हे मनु!’, ‘खारा पानी’, ‘मेरा शहर’, ‘इन्सानों की मंडी’, ‘@24 घंटे’, ‘अपने हिस्से का रिश्ता’, ‘दलाल’ (उपन्यास), ‘सवालों में जिंदगी’, ‘अघोरी’, ‘सुन पगली’, ‘अनछुआ अहसास और अन्य कहानियां’, ‘जीवन एक सारंगी’, ‘चिड़िया मुंडेर पर’ (कहानी-संग्रह), ‘चेहरे से परे’, ‘अनंत इच्छाएं’, ‘मत छीनो आकाश’, ‘आकाश के पार’, ‘नेह से नेह तक’, ‘देह नहीं जिंदगी’, ‘रेत से उस दिन मैंने पूछा’, ‘श से शायद शब्द....’, ‘गुमान में खड़ा आकाश’, मौन में उसे देखना' (कविता-संग्रह), ‘गई बुलेट प्रूफ में’ (व्यंग्य संग्रह) ‘रास्ते हैं, चलें तो सही’ (प्रेरक निबंध), ‘अपना होता सपना’, ‘चींटी से पर्वत बनी पार्वती’, ‘खुद लिखें अपनी कहानी’, ‘सुनना, गुनना और चुनना’ (बाल साहित्य)।
बीकानेर में मधु आचार्य का होना एक संयोग है और मेरा उनकी इस साहित्यिक यात्रा को करीब से देखना भी संयोग है। साहित्य में पुरस्कारों के विषय में मानते हैं कि पुरस्कार संयोग होते हैं। मधु आचार्य ‘आशावादी’ ने लेखन में पुरस्कारों के स्थान पर सतत लेखन को महत्त्व दिया है। संयोग है राजस्थानी उपन्यास ‘गवाड़’ पर उन्हें जहां राजस्थानी भाषा, साहित्य एवं संस्कृ ति अकादमी का ‘मुरलीधर व्यास राजस्थानी कथा-पुरस्कार’ अर्पित किया गया और इसी कृ ति पर वर्ष 2015 का साहित्य अकादेमी पुरस्कार भी अर्पित किया गया है।
अन्य पुरस्कार और सम्मान है- राजस्थान संगीत नाटक अकादमी, जोधपुर से ‘राज्य स्तरीय नाट्य निर्देशक अवार्ड’, ‘शंभू-शेखर सक्सेना विशिष्ट पत्रकारिता पुरस्कार’, सादूल राजस्थानी रिसर्च इन्स्टीट्यूट, बीकानेर से ‘तैस्सितोरी अवार्ड’ एवं नगर विकास न्यास द्वारा भी पुरस्कृ त-सम्मानित। राजस्थान संगीत नाटक अकादमी के आप उपाध्यक्ष रहे तथा साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली के राजस्थानी भाषा परामर्श मंडल के सदस्य के रूप में उल्लेखनीय सहभागिता है। आपकी अनेक रचनाओं के विभिन्न भारतीय भाषाओं में अनुवाद प्रकाशित हुए हैं और विश्वविद्यालयों द्वारा रचनाओं पर शोध-कार्य भी हुआ है। प्रतिदिन लिखना-पढऩा केवल अनिवार्य मानते ही नहीं वरन मधु आचार्य ‘आशावादी’ प्रतिदिन करणीनगर स्थिति अपने निजी आवास में इतना पढ़ते-लिखते हैं कि लोगों को आश्चर्य होता है। इतना ही नहीं इस लिखने-पढऩे के बीच अपने मित्रों और परिजनों से मिलने जुलने के साथ ही जन-जन के चहेते मधु आचार्य अपनी व्यस्तताओं के बीच नित्य समय-प्रबंधन ऐसा करते हैं कि वे सभी जगह मौजूद मिलते हैं। आचार्यों के चौक स्थित अपने पैतृक आवास कलकत्तिया भवन में रहते हैं। नित्य बेहद सरल, सीधे मिलनसार आत्मीय मधु आचार्य अपने पत्रकारिता, साहित्यिक व्यक्तित्व के बिना किसी आवरण पाटों पर बैठे हथाई करते मिलते हैं। अपने सभी रूपों को विस्मृत कर वे संजीदा इंसान के रूप में मिलते हैं। कला माध्यम से जुड़े अथवा शीर्ष पर पहुंचे व्यक्ति का जीवन में एक योग्य इंसान होना ही उसका असल है। अपनी रचनाओं के माध्यम से निर्माण के नवीन विचार एक अच्छा इंसान ही बेहतर दे सकता है।
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मधु आचार्य का प्रकाशित साहित्य
• 1995 अतंस उजास (नाटक)
• 2012 ‘गवाड़’ (राजस्थानी उपन्यास)
• 2013 ‘हे मनु!’ (उपन्यास), ‘चेहरे से परे’ (कविता संग्रह) ‘सबद साख’ (संपादन)
• 2014 ‘खारा पानी’, ‘मेरा शहर’, ‘इंसानों की मंडी’ (उपन्यास), ‘अवधूत’, (राजस्थानी उपन्यास), ‘सवालों में जिंदगी’, ‘अघोरी’(कहानी संग्रह), ‘उग्यो चांद ढळ्यो जद सूरज’ (राजस्थानी कहानी संग्रह), ‘अनंत इच्छाएं’, ‘मत छीनो आकाश’ (कविता संग्रह), ‘रास्ते हैं, चले तो सही’ (प्रेरक निबंध)
• 2015 ‘@24 घंटे’ (उपन्यास), ‘आडा-तिरछा लोग’ (राजस्थानी उपन्यास), ‘सुन पगली’, (कहानी संग्रह), ‘आंख्यां मांय सुपनो’ (राजस्थानी कहानी संग्रह), ‘आकाश के पार’, ‘नेह से नेह तक’, ‘देह नहीं है जिंदगी’ (कविता संग्रह) ‘अमर उडीक’ (राजस्थानी कविता संग्रह)
• 2016 ‘अपने हिस्से का रिश्ता’(उपन्यास), ‘अनछुआ अहसास और अन्य कहानियां’, ‘जीवन एक सारंगी’ (कहानी संग्रह), ‘रेत से उस दिन मैंने पूछा’, ‘श से शायद शब्द....’ (कविता संग्रह), ‘गई बुलेट प्रूफ में’ (व्यंग्य संग्रह), ‘अपना होता सपना’, ‘चींटी से पर्वत बनी पार्वती’ (बाल उपन्यास) ‘खुद लिखें अपनी कहानी’(बाल कथाएं) ‘सुनना, गुनना और चुनना’(बाल कविताएं)
• 2017 ‘भूत भूत रो गळो मोसै’ (राजस्थानी उपन्यास), ‘हेत रो हेलो’ (राजस्थानी कहानी संग्रह), ‘एक पग आभै मांय’ (राजस्थानी कविता संग्रह) दलाल (उपन्यास) मुंडेर पर चिड़िया (कहानी संग्रह) गुमान में खड़ा आकाश, मौन में उसे देखना (कविता संग्रह)
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