21 फ़रवरी, 2018

जाग, जाग! ओ धोरां वाला देश जाग / नीरज दइया

    विश्व प्रसिद्ध देशनोक की धरा के कवि मनुज देपावत ने वर्षों पहले एक गीत लिखा था- ’ओ धोरां वाला देश जाग.....’ किंतु छाती पर पड़े उस ‘पेणै नाग’ ने हमारी अनगिनत सांसें पी ली और अभी भी वह सांसें पीए जा रहा है। बिना भाषा, साहित्य और संस्कृति के मनुष्य पशु समान कहा गया है। यह हमारी पशुता नहीं तो भला क्या है कि हम हमारी मृत्य का समय भी नहीं पहचान पा रहे हैं। जो राजस्थानी भाषा हमारे रक्त में घुली हुई है, जिस भाषा के होने का अहसास हमारी सांस के हर स्वर में है। उसी भाषा के दुर्दिन हैं कि उसे संवैधानिक मान्यता देने में अब भी कोताही बरती जा रही है। क्या यह विचित्र बात नहीं है कि पूरे देश में ‘राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा’ 2005 और ‘शिक्षा का अधिकार अधिनियम’ 2009 को लागू किए जाने के उपरांत भी राजस्थान के बच्चों के साथ सौतेला व्यवहार किया जा रहा है। इस सत्य से भला कौन मुंह मोड़ सकता है कि यह बच्चों का अधिकार है, उनकी प्राथमिक शिक्षा मातृभाषा में ही होनी चाहिए। फिर क्यों राजस्थान के बच्चों को उनके इस अधिकार से अब तक वंचित रखा गया है? उन्हें अपनी मातृभाषा में शिक्षा के अधिकार से दिया ही जाना चाहिए। हमारा जागना इस संदर्भ में बेहद जरूरी है, नहीं तो आने वाला समय हमें कभी माफ नहीं करेगा। ‘यूनेस्को’ द्वारा पूरे विश्व में मातृभाषा दिवस मनाने का यही उद्देश्य है कि मातृभाषाएं फले-फूले और विकसित हों। बहुभाषाएं हमारी समृद्धि का प्रतीक है।
    हिंदी के हित में अपना उत्सर्ग करने वाली राजस्थानी जो राजस्थान में पटरानी थी उसे अब दासी बना दिया है, फिर भी हम धैर्य धारण किए हुए हैं। हमारे धीरज अथवा धैर्य यह अंतिम समय चल है, अब या तो हमारी भाषा को मान्यता मिलेगी नहीं तो हमें एक एक कर भाषा के लिए शहीद होना पड़ेगा। इसका आगाज राजस्थानी के प्रख्यात साहित्यकार देवकिशन राजपुरोहित ने किया है। उनका ‘मरणो-धरणो’ को इसी अर्थ में लिया जाना चाहिए कि हमारी बात गंभीरता से नहीं सुनी जा रही है। विगत वर्षों का इतिहास देखें तो राजस्थानी मान्यता के अनेक स्तरों पर कार्य हुआ है और हमने हमारी बात को बहुत शालीनता के साथ प्रस्तुत भी किया है। उदाहरण के लिए राजस्थानी की प्रसिद्ध पत्रिका ‘माणक’ के संपादक पदम मेहता ने केंद्र सरकार के अब तक के सभी प्रधानमंत्रियों से मान्यता के संबंध में अनुनय-पत्र और अनेक साक्ष्य समय समय पर प्रस्तुत किए हैं। यह तो महज एक उदाहरण है किंतु राजस्थान की विधान सभा तो पूरे राजस्थान खी जनता की तरफ से राजस्थानी के संबंध में निर्णय ले चुकी है। विधान सभा द्वारा पारित प्रस्ताव पर भी केंद्र सरकार अब तक आंखें नहीं खोल रही है। देश के एक शिक्षत नागरिक और शिक्षक के रूप में मेरा सविनय अनुरोध है कि मातृभाषा की बात बच्चों के हित में हम नहीं करेंगे तो कौन करेगा। यह हमारी जन-भावनाओं के साथ खिलवाड़ नहीं तो भला क्या है? आश्चर्य है कि सत्ता में बहुमत से राजनीति करने वाली सरकारें ही बहुमत का सम्मान नहीं करती। क्या ऐसी स्थितियों में भी धोरा वाले देश में जागरण-गीत नहीं सुना जाएगा।
    समय पर राजस्थानी को मान्यता नहीं देकर हमारी युवा पीढ़ी को उनकी जड़ों से कटने का कुचक्र है, जो लंबे समय से चल रहा है फिर भी हम सोए हुए हैं! हमारी मां की भाषा ही हमारी मातृभाषा है, किंतु अब जिस पीढ़ी को हम युवा पीढ़ी कहते है, उस युवा पीढ़ी की मां और उनकी भाषा के साथ तो अत्याचार हो चुका है। उन्हें अपने अधिकारों से वंचित कर हिंदी और अंग्रेजी को थोपा गया था। ऐसे में कुछ आधुनिकता के कुचक्र में आए और अपनी भाषा को ही छोड़ कर दिखावे की इस दुनिया में बहक गए। इस पूरे खेल का असर यह हुआ कि राजस्थानी समाज भी अपनी मातृभाषा राजस्थानी से कटता जा रहा है। क्या ऐसी रणनीति से हम हमारी मातृभाषा हिंदी को मानने लग जाएं तो दोष किसका है? यदि हमारे देश की आजादी का यही अर्थ है कि हमारी भाषा को जड़ों से ही उखाड़ दिया जाएगा फिर तो यह गुलाम बनाने की दोहरी नीति है। आज आवश्यकता इस बात की है कि हम जानें कि हमारी भाषा, साहित्य और संस्कृति की वह विरासर है जिसे हम हमारी असली हेमाणी कह सकते हैं। इस का संरक्षण हमें ही करना है। इन सब का यह अर्थ अनजाने में भी नहीं लिया जाए कि हम हिंदी अथवा किसी अन्य भाषा के विरोध में है। हमारा बस इतना कहना है कि राजस्थानी हमारी मां है और हिंदी मौसी। हमारी मां राजस्थानी ने ही हमें ऐसे संस्कार दिए हैं कि हम हमारी मौसी अथवा अन्य किसी भी पारिवारिक भाषाओं का सदा सम्मान ही करेंगे। यह सर्वविदित सत्य है कि क्षेत्रीय भाषाओं के पोषण से हिंदी का पोषण होगा और वह समृद्ध होगी।
    हिंदी के कुछ विद्वान पढ़े-लिखे होकर भी अनपढ़ों सा व्यवहार करते हैं। भाषा विज्ञान के स्पष्ट प्रावधानों के उपरांत भी वे भाषा और बोली का विभेद नहीं समझ पा रहे हैं। सभी शर्तों को पूरा करने वाली राजस्थानी यदि अब भी बोली है और उसको मान्यता नहीं दी जा सकती है तब भी यह यक्ष प्रश्न है कि इसके विकास और हमारी धरोहर के संरक्षण के लिए पर्याप्त व्यवस्थाएं क्यों नहीं हुई है। रोड़े अटकाने वाले यह भी कहते हैं कि राजस्थानी में अनेक बोलियां है। भाषा की आंचलिकता तो प्रत्येक भाषा में विद्यमान है। राजस्थानी जितना विशाल शब्द-कोश अन्य भाषाओं में नहीं है। लोक व्यवहार में ऐसे-ऐसे शब्द और उक्तियां है कि उनका अनुवाद के माध्यम से भाव और अभिप्राय व्यंजित नहीं किया जा सकता है। राजस्थानी ने ही हिंदी को पृथ्वीराज रासो और मीरा पदावली जैसी अनेक अनुपम कृतियां प्रदान की है। राजस्थानी के आधुनिक साहित्य के बिना भारतीय साहित्य की चर्चा असंभव है। राजस्थानी भाषा, साहित्य और संस्कृति का रंग हमारी भारतीयता से अलग करना असंभव है। इस रंग से ही सभी रंग सुशोभित हैं।
    इस धरा के वीरों का स्मरण कीजिए जो अपना सीस कट जाने के उपरांत भी युद्ध-भूमि में अपने शत्रुओं का नाश करने की क्षमता रखते थे। यहां की मिट्टी के कण-कण में इसकी गौरव गाथा अब भी धड़क रही है। जिस दिन यह मिट्टी आवाज लगाएगी, उसी दिन पूरा राजस्थान उठ खड़ा होगा। गांधी और अहिंसा के हम पुजारी हैं। यहां लूण यानी नमक की आन रखने वाले धरा के कोने-कोने में मिलेंगे, किंतु साथ ही प्रश्न यह है कि अपने बच्चों और परिवारों के लिए राणा प्रताप की भांति प्रधानमंत्री जी को पाति लिखने वाले हम राजस्थानी किसी कवि की प्रतीक्षा में हैं जो हमें जग जाने को कहे? कवि मनुज देपावत बहुत पहले कहता हुआ इस संसार से विदा हो चुका है, अब बस हमें हमारी आत्मा की आवाज सुननी है। देखिए आत्मा से क्या आवाज आ रही है? यदि भाव सुंदर शब्दों में प्रगट करना चाहें तो जनकवि कन्हैयालाल सेठिया के शब्द हैं- ‘खालीधड़ की कद हुवै चैरे बिना पिछाण, मायड़ भाषा रै बिना क्यां रो राजस्थान।’
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भविष्य का बड़ा सवाल - राजस्थानी ? / डॉ. नीरज दइया

 सर्वप्रथम यही विचार करें कि ‘राजस्थानी’ क्या है? इसका पहला जबाब तो यही कि मैं राजस्थानी हूं, क्योंकि मैं राजस्थान में रहता हूं। मैं राजस्थानी होकर भी भारतीय हूं, क्योंकि मेरा राजस्थान भारत में है। कोई व्यक्ति अपने आप में बड़ा अथवा छोटा नहीं होता। उसका बड़ा अथवा छोटा होना स्थिति सापेक्ष है। सत्य केवल यही है कि मैं जितना भी हूं, जैसा भी हूं, मेरा होना एक अस्थित्व है। मुझे वैश्विक-परिदृश्य में एक सूक्ष्म इकाई अथवा नगण्य के रूप में लिया जा सकता है। जाहिर है मैं यहां मेरी नगण्यता, लघुता अथवा सूक्ष्मता की बात नहीं कर रहा हूं। अभिप्राय है कि अखिल विश्व में व्यक्ति नगण्य होने के उपरांत भी स्रष्टि की मानव-जाति अथवा लेखक-समुदाय के अस्तित्त्व की एक अभिव्यक्ति तो है ही। किसी का होना अपने आप में एक चुनौतिपूर्ण है। अणु-परमाणु के भीतर विभिन्न कणों को स्वीकारते हम उनकी शक्तियों को प्रणाम करते हैं। यहां मुझे कवि गिरिजाकुमार माथुर का स्मरण आता है जिन्होंने कविता ‘आदमी का अनुपात’ में लिखा है- प्रदेश कई देश में / देश कई पृथ्‍वी पर / अनगिन नक्षत्रों में / पृथ्‍वी एक छोटी / करोड़ों में एक ही / सबको समेटे हैं / परिधि नभ गंगा की / लाखों ब्रह्मांडों में / अपना एक ब्रह्मांड / हर ब्रह्मांड में / कितनी ही पृथ्वियां / कितनी ही भूमियां / कितनी ही सृष्टियां / यह है अनुपात / आदमी का विराट से....।
            माना कि आदमी एक कमरे में दो दुनिया रचाता है और रचनाकार एक कागज के पन्ने पर कितनी-कितनी दुनिया रचते हैं। बच्चन जी ने लिखा था- मैं और, और जग और, कहां का नाता, मैं बना-बना कितने जग रोज मिटाता; जग जिस पृथ्‍वी पर जोड़ा करता वैभव, मैं प्रति पग से उस पृथ्‍वी को ठुकराता! ऐसे में इसे रचना और रचनाकार की विराटता ही कहेंगे, जिसे वह अपनी भाषा में साकार करता है। कवि उमाशंकर जोशी ने अपनी कविता में जिसे रस का ‘अक्षय-पात्र’ कहा, वह भाषा से संभव है। कवि कुंवर नारायण ने तो भाषा को सहूलियत से बरतने का परामर्श भी दिया है। कहना यह है कि ऐसी सहूलियत मुझे मेरी भाषा राजस्थानी में है। मैं अपनी यह विरासत न केवल सहेजना चाहता हूं वरन भारतीय साहित्य में इसकी एक बानगी रखने का प्रयास कर रहा हूं। वैसे यह सर्वविदित है कि राजस्थानी भाषा को अब तक संवैधानिक मान्यता नहीं है। साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली और राजस्थान के माध्यमिक शिक्षा बोर्ड समेत अनेक विश्वविद्यालयों ने राजस्थानी को स्वतंत्र भाषा के रूप में वर्षों पहले स्वीकार कर लिया है किंतु राजस्थान विधान सभा द्वारा पारित प्रस्ताव केंद्र सरकार ने ठंडे बस्ते में रखा हुआ है। राजस्थान में कभी राज-काज की भाषा राजस्थानी थी, किंतु उसने हिंदी के हित में अपना बलिदान दिया, यह एक ऐतिहासिक सत्य है। बलिदान का प्रतिफल यह है कि अब भी राजस्थान के बच्चों को उनकी मातृभाषा में अध्ययन की व्यवस्था नहीं है। जबकि राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा-2005 और शिक्षा का अधिकार अधिनियम- 2009 को पूरे देश में लागू किया गया है और राजस्थान में यह लंबित है।
            राजस्थान के भू-भाग और देश-विदेश में करोड़ों जन-जन की भाषा राजस्थानी को विदेशों में भी स्वतंत्र भाषा के रूप में स्वीकारा गया है, किंतु राजभाषा हिंदी के विद्वान गुरुजन इसे अब भी एक बोली के रूप में पढ़ा रहे हैं। यह मिथ्या तथ्य अब भी प्रचलन में है, यह उनकी हठधर्मिता नहीं तो भला क्या है? ‘भाषा विज्ञान’ के स्पष्ट निर्देशों के उपरांत बोली और भाषा के बीच अंतर उन्हें समझ नहीं आता। नहीं तो क्या कारण है कि इस मुद्दे पर वे तर्क सम्मत जांचने-परखने ही हिम्मत नहीं करते हैं। बोली के भाषा बनने के समस्त मानकों को पूरा करने के बाद भी अगर राजस्थानी को बोली ही मानना है तो ऐसे गुरुओं के ज्ञान हेतु कबीर जी ने बहुत पहले लिखा था- गुरुवा सहित सिष्य सब बूढ़े, अंतकाल पछिताना। मुद्दा यह भी बनता है कि सभी मतों, तथ्यों और तर्कों के आधर पर राजस्थानी एक समृद्ध भाषा सिद्ध होने के उपरांत भी अगर आपकी दृष्टि में राजस्थानी एक बोली है, तो आप इस बोली के विकास के लिए क्या कर रहे हैं?
            एक भ्रांति यह भी है कि राजस्थानी की संवैधानिक मान्यता से हिंदी कमजोर होगी। क्या अन्य प्रांतीय भाषाओं की मान्यता से हिंदी कमजोर हुई है? फिर वह राजस्थानी जिसने सदा हिंदी को पुष्ट और पोषित किया है उससे भला कैसे कमजोर होगी। आदिकाल में पृथ्वीराज रासो और मध्यकाल में मीरा सबसे बड़ा प्रमाण है कि राजस्थानी ने हिंदी को सबल बनाया है। आधुनिक काल में अनेक राजस्थानी रचनाकार अपनी मातृभाषा के साथ समानांतर रूप से हिंदी में भी लेखन कर रहे हैं। हिंदी के पूरे समर्थन के साथ हमारी प्रवल आकांक्षा है कि राजस्थानी को जल्द ही संवैधानिक मान्यता मिले। राजस्थानी समाज यह भी कामना करता है कि हिंदी को राजभाषा और राष्ट्रभाषा के रूप में पूरे भारत में मान्यता और सम्मान मिले।
            विनम्रतापूर्वक यहां यह भी निवेदन है कि राजस्थानी भाषा मेरे रक्त में घुली हुई है। मेरी मातृभाषा राजस्थानी के प्रति यहां के बड़े-बूढ़ों और बच्चों के हितों को देखते हुए संवैधानिक दर्जा मिले। हिंदी के सम्मान की सहमति के साथ ही आग्रह है कि क्षेत्रीय भाषाओं की अवमान नहीं होनी चाहिए। राजस्थानी भाषा को मान्यता मिले यही ‘अंतिम इंछा’ लिए महाकवि कन्हैयालाला सेठिया सहित अनेक रचनाकार इस संसार से विदा हो गए। आज भी अगर राजस्थानी के वरिष्ठ रचनाकारों से प्रश्न किया जाएगा कि उनकी अंतिम इंछा क्या है? वे समवेत स्वर में जबाब देंगे- हमारी भाषा की उसका सम्मान मिले। प्रत्येक व्यक्ति की अस्मिता का सवाल भाषा से जुड़ा है। हमारी भाषा में हमारी जड़े हैं और यदि कोई किसी की जड़ों को काटेगा तो कब तक चुप रहा जा सकेगा यह भविष्य का बड़ा सवाल है।
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अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस 21 फरवरी 2018

पांच पीढ़ियों की प्रतीक्षा / नीरज दइया









18 फ़रवरी, 2018

रक्त में घुली हुई भाषा राजस्थानी / नीरज दइया

मायड़ भाषा से अनजान रहकर अंग्रेजी में गिटपिट करके खुद को बड़ा आदमी होने का दिखावा करने वाले चाहे कितनी भी उन्नति कर लें, वे सदैव हीन ही रहते हैं। भाषायी ज्ञान अच्छी बात है, लेकिन मातृभाषा की कीमत पर कतई नहीं।
भारत की संस्कृति में राजस्थानी का अपना अनूठा रंग है और इसके बिना सभी रंग फीके हैं। राजस्थानी भाषा का सांस्कृतिक रंग इतना अनूठा है कि किसी के आने और जाने दोनों क्रियाओं के लिए एक ही शब्द 'पधारो सा' को बोलने का अंदाज निराला है। 
दीया बुझता नहीं ‘बड़ा’ होता है
हमारे यहाँ दूकान को बंद नहीं मंगळ किया जाता है और दीपक को बुझाने के स्थान पर 'बड़ा करना' शब्द इसकी विशिष्टता दर्शाता  है। यहाँ मरण को भी मंगल माना गया है। किसी के निधन के लिए "सौ बरस" कहना अपने आप में हमारे यहां निराला है। लोक की यह धरोहर बची और बनी रहे। बिना राजस्थानी की आत्मा को समझे अनजाने में कुछ लोग भूल करते हैं। जैसे बढ़ना और बढ़ाना क्रिया-पद यहां हिंदी-अर्थ से इतर अर्थ के हैं। राजस्थानी में ये काटना क्रिया से संबधित है, जबकी इनके हिंदी-भाव को 'बधावां' शब्द प्रयुक्त होता है।
इसी भांति राजस्थानी भाषा की सामासिकता भी बेजोड़ है। उदाहरण के लिए 'बासी मूंढै' में जो अर्थ बिना कुछ खाए सुबह सुबह उठने के बाद की स्थति और मनोभावों की व्यंजना है वह हिंदी अथवा अन्य भाषा सहज सुलभ नहीं है। एक एक शब्द के अनेक पर्यायवाची और विभिन्न भावों   अर्थों के लिए विशाल शब्द भंडार भी राजस्थानी भाषा की एक अद्वितीय विशेषता है। 
कोस-कोस पर बदले वाणी
राजस्थानी भाषा की आंचलिकता उसकी बोलियों में समाहित है। 
कोस-कोस पर बदले पानी, चार कोस पर वाणी बदलने की बात राजस्थान के लिए हमेशा से कही जाती है, किंतु किंतु संप्रेषण की कहीं कोई समस्या यहाँ नहीं है। कुछ शब्दों और वर्तनी को लेकर जो भिन्नताएं हैं वे मान्यता मिलने और स्कूली शिक्षा में पूर्ण राजस्थानी के लागू होने पर स्वतः हल हो जाएंगी। 
युवा वर्ग का राजस्थानी से कटाव
राजस्थानी को अब तक संवैधानिक मान्यता नहीं प्रदान किए जाने की सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि युवा पीढ़ी की भाषाई जड़े ही कटती जा रही है। बढ़ती शिक्षा और बदलती संस्कृति से हमारी नई पीढ़ी एक ऐसे दौर में पहुंचा दी गई है जहां अब उनकी स्मृति में तो मातृभाषा है किंतु  वे लोक-व्यवहार में अंग्रेजी और हिंदी के अभ्यस्त होने लगे हैं। किसी भी भाषा में कोई खराबी या कमजोरी नहीं है किंतु बात हमारी मातृभाषा राजस्थानी की विशाल धरोहर को बचाने की है।
यूनेस्को द्वारा इसी उद्देश्य से  21 फरवरी को ‘अन्तर्राष्ट्रीय मातृभाषा दिवस' मनाना आरंभ किया गया, जो विश्व में भाषाई एवं सांस्कृतिक विविधता का संरक्षण करना प्राथमिकता मानता है। आवश्यकता बहुभाषिता को बढ़ावा देने की है। एक सर्वेक्षण के अनुसार दुनिया में लगभग 2500 भाषाएं ऐसी हैं, जो खत्म होने के कगार पर पहुंच गई है। आंकड़े यह भी बताते हैं कि लगभग 25% भाषाएं तो विश्व में ऐसी हैं जिन्हें बोलने वालों की संख्या एक हजार से भी कम है। 
संपूर्ण और समृद्ध भाषा
सवाल यह है कि क्या राजस्थानी भाषा को लुप्त होने दिया जाए या इसे बचाया जाना जरूरी है। भाषा विज्ञान में बोलियों और भाषाओं के क्रमिक विकास पर व्यापक विवेचन मिलता है। यह विज्ञान हमें बताता है कि कोई बोली भाषा कब, कैसे और क्यों बनती है। इसके साथ ही वैज्ञानिक और तार्किक आधार भी विद्वानों ने नियत किए हैं। उन सभी आधारों पर खरी उतरने वाली राजस्थानी भाषा के विषय में अब भी भाषा-बोली को लेकर भ्रामक स्थिति फैलाई जा रही है। 
रिमिक्स के दौर में गुम होते शब्द
प्रत्येक भाषा में व्याकरण और भाषिक संदर्भ होते हैं जिनके अभाव में अनेक दोष लोक में धीरे धीरे व्याप्त होने लगते हैं। बदलते समय और समाज में राजस्थानी लोक-साहित्य और भाषा की समझ नहीं होने के अनेक प्रमाण हम देखते हैं। 
उदाहरण के लिए राजस्थानी में ‘ळ’ एक विशिष्ट ध्वनि है किंतु प्रत्येक ‘ल’ के लिए ‘ळ’ प्रयुक्त नहीं होता है। बल (ताकत) और बळ (जलना) इसके सहज उदाहरण हैं। अनेक लोकगीत ऐसे हैं जिनका स्वरूप बदलता जा रहा है। रिमिक्स और फ्यूजन के दौर में लोकधुनों की मीठास और परंपरागत कौशल धीरे-धीरे बिसरता जा रहा है। क्या अब भी हम ‘कान्या मान्या कुर्र, चलां जोधपुर...’ अथवा ‘आओ नीं पधारो म्हारे देस... ’ जैसे कर्णप्रिय गीत सुनकर भीतर तक रसविभोर नहीं होते हैं? 
जीवन से मरण तक के लोकगीत वाले हमारे समाज में अनेकानेक भावों से हम मुदित और हर्षित होते हुए हमारी इस थाती पर इतराते हैं किंतु संकट मंडराता साफ देखा जा सकता है। असंख्य पांडुलिपियां और ग्रंथ संग्रहालयों की विरासत क्या भविष्य में नष्ट हो जाएगी? ऐसे अनेक मुद्दे हैं जिनके लिए राजस्थानी भाषा से युवा पीढ़ी और घर-परिवार से जोड़े रखना जरूरी है।  
मातृभाषा का ऋण उतारना होगा
राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा 2005 और शिक्षा के अधिकार अधिनियम 2009 में मातृभाषा के पक्ष में स्पष्ट प्रावधान होते हुए भी राजस्थान के विद्यार्थियों को उनके मातृभाषा में शिक्षा के अधिकार से वंचित रखना सर्वथा अनुचित और अनैतिक है। भाषा ही ऐसी जड़ें हैं जिससे हमारे भीतर संस्कार पोषित होते हैं और बालक-बालिकाओं को ऐसी त्रासद स्थिति में देखते हुए भी पूरा राजस्थानी समाज कब तक चुप्पी साधे रखेगा। हमारी भाषा को हमारे घर, परिवार और समाज ने हमें सौंपा है तो इस अपेक्षा के साथ कि इसे हम बचाएंगे और आने वाली पीढ़ियों को सौंप कर मातृभाषा के ऋण से मुक्त होंगे। यह संयोग है कि मेरे रक्त में घुली हुई भाषा राजस्थानी है, जो मुझे मेरी मां ने अपने स्तनपान के दिनों मुझे विरासत के रूप में दी थी। राजस्थानी मेरी आत्मा की भाषा है और हिंदी मेरे पेट का पोषण करती है। 

हिंदी को ॠणमुक्त करना है
अगर राजस्थान से एक आवाज राजस्थानी के लिए उठती है तो दुगने जोश और उत्साह के साथ राजस्थानी समाज हिंदी का भी समर्थन करता रहा है। क्या मेरा मकान यदि पक्का बनता है तो किसी पड़ौसी अथवा मकान जहां स्थित है वह मकान अथवा स्थान कमजोर होने का कोई अंदेशा है? यदि नहीं तो फिर राजस्थानी भाषा की संवैधानिक मान्यता से हिंदी भला कमजोर कैसे होगी? अगर इतिहास के पन्नों में जाएंगे तो मिलेगा कि राजस्थानी को संवैधानिक मान्यता देकर हिंदी को ऋण-मुक्त करना है।
म्हारी जबान रो ताळो खोलो 
राजस्थानी मान्यता के इस संघर्ष में अनेक पीढ़ियों के अपना अपना योगदान दिया है। अब भी संघर्ष जारी है किंतु इसका रूप परिवर्तित होते नजर आने लगा है। युवा पीढ़ी के क्षोभ में यदि समय रहते यह मांग अब भी पूरित नहीं होती तो गांधी जी के सिद्धांतों पर चलने वाले राजस्थान की हवाओं में आंधी आने की संभवाना बनने लगी है। आज राजस्थानी भाषा की संवैधानिक मान्यता के लिए घर-गली-कस्बों और गांव-गांव से एक ही आवाज आने लगी है- ‘म्हारी जबान रो ताळो खोलो। राजस्थानी म्हारै रगत रळियोड़ी भासा है।’ पर जब अपने ही लोग इसे बिसरा रहे हो तो मान्यता मिलने के बाद भी क्या राजस्थानी खुश हो पाएगी?
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मायड़ भाषा को युवा पीढ़ी में लोकप्रिय बनाने की आवश्यकता
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प्राथमिक शिक्षा का माध्यम राजस्थानी नहीं होने से प्रदेश के बच्चों की जड़े काटती जा रही हैं, इसके अभाव में विकास की सारी संभवानाएं कुंठित होती जाती है। उन पर बहुत छोटी उम्र में ही हिंदी और अंग्रेजी का बोझ डाल कर उनके भाषाई संस्कार छिने जा रहे हैं। 
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देश और प्रांत के गठन के समय भाषा का संदर्भ महत्त्वपूर्ण माना गया है। पंजाब के लिए पंजाबी, गुजरात के लिए गुजराती और महाराष्ट्र के लिए मराठी फिर राजस्थान के लिए राजस्थानी क्यों नहीं?
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मातृभाषा से हर आदमी की एक खास पहचान बनती है, हमारी खास पहचान खान-पान से लेकर पहनावे तक में धीरे धीरे लुप्त होती जा रही है।
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आज अंग्रेजी की पौ बारह पच्चीस है। लगने लगा है कि अंग्रेजी से जुड़ कर हम उच्च वर्ग में शामिल हो जाएंगे। हिंदी समेत सभी भारतीय मातृभाषाओं की स्थिति कमजोर होती जा रही है ऐसे में राजस्थानी दोहरी मार झेलने को विवश है।
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11 फ़रवरी, 2018

लड्डू / डॉ. नीरज दइया

खिर इंतजार करते-करते वह बस आ गई जिससे मुझे यात्रा करनी थी। इसे संयोग कहेंगे कि बस भरी हुई थी। बस में चढते ही मैं सीट का जुगाड़ करने की फिराक में था, पर हर सीट पर किसी न किसी का कब्जा था। काफी सवारियां बस में खड़ी थी। मैंने विचार किया पीछे कोई एक-आध सीट खाली मिल सकती है। रास्ते में खड़ी सवारियों में आगे-पीछे धक्कम-पेल करते बड़ी मुश्किल से पीछे तक पहुंचा। मेरा अंदाजा ठीक था, एक सीट खाली दिखाई दी। मैंने पहले आओ, पहले पाओ के हिसाब से सीट पर कब्जा करने का जरा सा प्रयास किया ही था कि पास की सीट पर काबिज नवयुवक ने सीट पर रखे रुमाल की तरफ संकेत करते हुए कहा- “रोकी हुई है, कोई आ रहा है।” 
            मैंने झेंपते हुए कहा- “अच्छा जी” और पास खड़ा रह गया। सोचा- नाहक हैरान हुआ। आगे भी खड़े होने के लिए पर्याप्त जगह थी। मैंने देखा- उस सीट के लिए एक-दो अन्य यात्री भी आए, किंतु पास बैठा आदमी पक्का पहरेदार था किसी को पल भर भी बैठने नहीं दिया। वह कहता रहा- “रोकी हुई है, कोई आ रहा है।” इसी बीच एक सुंदर नैन-नक्स वाली लड़की को देखा जो मुस्कान बिखेरते हुए उसी आदमी से पूछ रही थी- “यह सीट खाली है क्या?” लड़की की मुस्कान से वह आदमी जैसे खिल उठा, उसकी आंखों में चमक आ गई थी। मुस्कुराते हुए वह कह रहा था- “हां-हां, आइए....। खाली है।” यह सुनते ही वह लड़की पीछे पलट कर ऊंचे स्वर में बोली- “ताऊजी! यहां आ जाएं। सीट मिल गई है।” वह आदमी मुंह बाए आगे खड़ी सवारियों में उसके ताऊजी को पहचानने की कोशिश करने लगा।  
            मुझे लगा उस आदमी के सपने बिखर कर चकना चूर हो गए हैं और वह मुंह बाए ऐसे दिखाई दे रहा था जैसे उसके मुंह में कोई लड्डू आते-आते रह गया हो। उस लड़की के ताऊजी को देखते हुए उस आदमी का मुंह ना जाने क्यों खुला रह गया था और मुझ से निगाहें मिलते ही उसने सकपकाकर मुंह बंद कर लिया। मैं अब कहां चूकने वाल था, मैंने मन ही मन कहा- “ क्यों, मिल गया लड्डू?”
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