18 अक्तूबर, 2017

‘पाछो कुण आसी’ - मानवीय संवेदनाओं व हेत-प्रेम के जीवंत चित्र

० सी.एल. सांखला, कोटा
    मनुष्य होने की पहचान उसके अंतस में हेत-प्रेम व मानवीय संवेदनाओं का संचरण ही है। संवेदनाओं की सघनता मनुष्यता को सही मायने में प्रामाणिक बनाती है। अमूर्त भावनाओं का जितना अधिक जुड़ाव जीवन से होता है, वे उतनी ही तीव्रता से कविता में ढलकर समूर्त होने लगती है।
    राजस्थानी कविता और गद्य में अपनी गहरी पकड़ व पैठ रखने वाले नीरज दइया तीन चार दसकों में जो साहित्य सर्जना की है, बेहद मूल्यवान है। कविता संग्रह ‘साख’ (1997), देसूंटो (2000), हिंदी कविता- ‘उचटी हुई नींद (2013) तथा ‘आलोचना रै आंगणै’ (2011), ‘बिना हासलपाई’ (2014) आदि उम्दा रचाव के साक्ष्य हैं। वर्ष 2015 में सर्जना बीकानेर से प्रकाशित राजस्थानी कविता संग्रह ‘पाछो कुण आसी’ की कविताएं मनुष्य की आंतरिक संवेदनाओं व हेत-प्रेम की सशक्त अभिव्यक्ति है।
    वक्त की गिरफ्त में संवेदना शून्य हुए व्यक्ति को जगाने व पुनः संवेदित करने के सद्प्रयत्न में कवि बार-बार ‘हेलो’ करता है-
म्हैं हेलो करूं
हेला माथै हेलो करूं
बारंबार करूं
दिन-रात करूं
मन-आंगणै करूं...
कदैई तो सुणैला थूं। (हेलो)
    कवि की दृष्टि में संवेदनशील मानवीय चेतना से मिलन अथवा अनुभूति ही सही मायने में पुण्य कर्म या सौभाग्य है तथा उससे परे हो जाना ही पाप या दुर्भाग्य है। कवि को यह दृष्टि यथार्थ व आदर्श तथा विज्ञान व अध्यात्म को सुसमन्वित करती है-
        थारी ओळूं में जीवणो
        पुन्न है म्हारो
        थनै बिसरावणो पाप। (पाप-पुन्न)
    मनुष्य जीवन एक सत्य है परंतु मृत्यु उससे भी अधिक ठोस सत्य है। जीवनदात्री बहमाता जब अतिरिक्त जीवन शक्तियां देती हैं तो मुस्कुराती है। साथ ही कवि भी मुस्कुराता है। दोनों जानते हैं कि जीवन से पहले मृत्यु लिखी जा चुकी है-
        जीवण सूं पैली मौत लिखी
        कीं देवण लाग्या जद बैमाता
        मुळक्या
        मुळक देख’र मुळक्यो म्हैं। (बिसरगी मुळकती-मुळकती)
बहुत ही कम शब्दों में कवि नीरज दइया बहुत बड़ी बात कहने में सिद्धहस्त हैं-
        लोग मौको तकै
        ठाह ई कोनी लागण देवै
        काट’र लेय जावै नस। (लोग मौको तकै)
दइया की इन कविताओं में रोमांचक रूपक एवं बिम्ब योजनाएं दृष्टव्य है-
        आंख री छियां-छियां
दीठ लेय’र जावै
सुपना रै देस। (मिनख एकलो कोनी)
    अंतरंग रागात्मकता और मानवीय हेत-प्रेम मनुष्यता की कसौटी भी है जो इन कविताओं में बखूबी देखी जा सकती है-
थारी ओळ्यूं मांय
खदबदीजै काळजो
बरसै बादळां दांई
थारी हूंस... ! (हूंस)
    कवि मानव मन की इच्छा शक्ति तथा क्रियाशीलता को जिंदगी के लिए आवश्यक मानता है अन्यथा जिंदगी व मौत में कोई अंतर नहीं रह जाता। ‘सगळा मारग’ कविता से ये पंक्तियां शायद यही बात कहती है-
जे मिलण री हूंस नीं
कांई करैला संजोग
आपां रै मून रैयां
मर जावैला
सगळा मारग। (सगळा मारग)
    वस्तुतः ये कविताएं अमूर्त भावों की कोरी कल्पनाएं न होकर साधारण आदमी की जद्दोजहद एवं जीवट की मूर्त अभिव्यक्ति है। जिनमें संदेश भी है और प्रेरणाएं भी-
साची ! अंगूठो कैवतां ई
म्हारी आंख्यां साम्हीं आवै- गुरु द्रोण
जे कर लेवूं आंख्यां आडो हाथ
लखावै- गायब हुयग्या म्हारा अंगूठा...। (अंगूठो)
    ‘पाछो कुण आसी’ कविता संग्रह की सभी कविताओं में यूं तो छंद मुक्त कविताएं है जिनमें गद्य कविताओं की बानगी हैं, किंतु सही मायने में ‘गद्य कविताएं’ शीर्षक देकर जो संकलित है उनमें ‘चालो माजी कोटगेट’, ‘इंदरधनुस’, ‘ऊंट’, ‘चकारियो’, ‘भींत’, ‘धीरज’, ‘प्रेम’ आदि कविताएं पढ़ना व समझना जरूरी है। यह एक बेजोड़ संग्रह है। इनमें अतीत के गुणगान नहीं, वरन गुजरे वक्त की जीवंत बची धड़कने साफ सुनाई देती है। यहां समय के साथ कदमताल करती जिंदगी तथा बदलते समय की आबोहवा में सांस लेती मनुष्यता की लिखावट में तृष्णा और भटकाव है तो भविष्य की असल कथाएं कहती कविताएं भी। भले ये कविताएं सम्मोहन पैदा न करती हो, पर यथार्थ की परते खोलती हुई पथराई आंखों को खोलती है तथा सुप्त संवेदनाओं को जगाती है। यहां मानवीय जीवन का अद्भुत व सौम्य चित्रण सहज ही देखने को मिलता है। माटी की सौंधी महक से नहाए हुए शब्द एवं राजस्थानी मुहावरों से सुगुंफित कवितांश व काव्यावलियां पाठक को सहज ही प्रभावित करने वाली है।
पुस्तक-        पाछो कुण आसी
विधा-           राजस्थानी कविता संग्रह
कवि-           डॉ. नीरज दइया
प्रकाशक-     सर्जना प्रकाशन, बीकानेर
कीमत-        140 रिपिया
संस्करण-     2015
पृष्ठ-             96

16 अक्तूबर, 2017

चेखव की बंदूक बुलाकी शर्मा के पास है

० नीरज दइया

मैं सत्यनिष्ठ यह घोषणा करता हूँ कि आज से पहले मैंने कभी कोई संस्मरण नहीं लिखा है। साथ ही यह भी कि जिस व्यंग्य लेखक बुलाकी शर्मा पर संस्मरण लिखना है वे विल्कुल कोरे हैं, अर्थात उन पर कोई संस्मरण लिखा नहीं गया है। अगर आप अपनी रिक्स पर यह पढ़ना चाहते हैं तो आभार। एक संस्मरण क्या मैं इतना प्रतिभावान हूं कि शर्माजी की पूरी जीवनी लिख सकता हूं।
समस्या यह है कि आजकल कोई किसी को महान नहीं कहता। यहां गिव एंड टेक का फार्मूला बेस्ट है। तुम मुझे गोडफादर कहो, मैं तुम्हें जीनियस कहूंगा जैसी अटकलें सर्वविदित है। यह संस्मरण जिस पत्रिका में आप पढ़ रहे हैं, उसके संपादक बड़े खेले हुए खिलाड़ी है। इन्होंने व्यंग्य विधा को और व्यंग्य विधा ने इनको इतना मांजा है कि काले बालों का पूरा मैल उतर कर सफेद-झक्क हो गए। यह संस्मरण मैं जापानी तकनीक से बने एक ओटोमैटिक पेन से लिख रहा हूं। इस पेन में सारे कानून-कायदे सेट कर दिए हैं। लिखते समय अगर मैं तयशुदा पटरी से नीचे उतरा कि पेन लिखना बंद कर देगा। इतना ही नहीं देखिए- सुना आपने सीटी बजी ना।
बुलाकी शर्मा हिंदी और राजस्थानी दो भाषाओं में लिखते हैं। वे तीसकी भाषा अंग्रेजी जानते हैं। पर इतनी नहीं जानते कि साहित्य सृजन कर सकें। ऐसा भी कह सकते हैं कि इसमें उनको इतना कोन्फीडेंस नहीं हुआ कि कुछ लिखने का ट्राई करते। उन्होंने गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर के बाल-साहित्य का राजस्थानी अनुवाद किया, जो साहित्य अकादेमी से प्रकाशित हुआ है। इस बीच एक रहस्य यह है कि बे बांगला नहीं जानते और मुस्कुराते हुए कहते हैं कि अनुवाद का अनुवाद किया है।
हम दोनों बीकानेर के मूल निवासी हूं। हमारे पास इसका प्रमाण-पत्र भी है। बिना प्रमाण पत्र के सत्य भी झूठ है। किंतु यह ऐसा सत्य है जिसे हम झूठलाना चाहते हैं। एक बार मैंने किसी अन्य प्रसंग में बुलाकी शर्मा के लिए जब लिखा बीकानेर के साहित्यकार तो बे बोले बीकानेर शब्द हटा दो। साहित्यकार किसी एक शहर का नहीं होता। मुझे भी यह ठीक लगा और मैंने उनके सामने ही बीकानेर शब्द के स्थान पर राजस्थान लिख दिया तब भी उन्हें आपत्ति थी। वे पूरे देश और विश्व के साहित्यकार होना चाहते थे। अब साहित्य अकादेमी का मुख्य पुरस्कार इस बात का प्रमाण है कि वे एक भारतीय साहित्यकार हैं।
भारतीय साहित्यकर बुलाकी शर्मा को अकादेमी पुरस्कार का रहस्य मेरी भाभी जी राधा शर्मा ने खोल दिया है। उनकी धर्मपत्नी यानी बकौल हमारी भाभी साहित्य अकादेमी पुरस्कार इसलिए मिला कि पुरस्कृत पुस्तक के लोकार्पण में वे उन्हें पहली बार साथ ले गए थे। बाकी किताबों का लेखा-जोखा यह है कि वे या तो लोकार्पण करवाते ही नहीं और कभी किसी कृति का लोकार्पण करवाया तो सपत्नीक नहीं पहुंचते। इसके साथ ही भाभी जी ने यह भी बताया कि पुरस्कार समारोह में भी वे उनके साथ दिल्ली गई थीं और भव्य आयोजन में वे उन्हें देख कर मुस्कुरा रहे थे।
बुलाकी शर्मा कवि नहीं है। उनका कोई कविता संग्रह प्रकाशित नहीं हुआ है। खबर है कि वे कविता के पाठक और प्रेमी है। गोपनीय बात यह है कि प्रेम-कविताएं छुप कर लिखते हैं और छुपा कर रखते हैं। सार्वजनीक बात यह है कि कविता-संग्रहों की समीक्षाएं लिखने से परहेज नहीं है। चूंकी वे कभी भी कवि हो सकते हैं क्यों कि कवि कम शब्दों में काम चला लेते हैं और कहानी-व्यंग्य में शब्दों का कुछ अधिक उपयोग करना होता है। इस पीड़ा का आंशिक इलाज उन्होंने व्यंग्य विधा में इस प्रकार किया है कि पहले वे लंबे व्यंग्य लिखा करते थे अब व्यंग्य लिखने से पहले मन में उसे धो लेते हैं और इतना धोते हैं कि धो धो कर उसे छोटे साइज का कर देते है।
‘धोना’ क्रिया के संग वे प्रेम से सपत्नीक संलग्न है। घर में बर्तन और कपड़े भाभीजी धोती हैं और वे व्यंग्य में अपनी मरजी से पूरे देश-दुनिया को धोते हैं। वे अपने चालीस वर्षीय अनुभव के आधार पर शरमाते हुए कहते हैं कि वर्ष 1978 में ‘मुक्त्ता’ पत्रिका में ‘बजरंगबली की डायरी’ से उन्होंने अपने आपको व्यंग्य लेखन मान लिया था। बाद में वे साप्ताहिक हिन्दुस्तान, कादम्बिनी, आजकल, अमर उजाला, ट्रिब्यून, सन्मार्ग आदि अनेक पत्र-पत्रिकाओं में व्यंग्य समेत विविध विधाओं में प्रकाशित हुए। अब उनके पास खुद ऐसी कोई लिस्ट नहीं है कि वे कब-कब कहां-कहां छपे। इसलिए ऐसा कहना ठीक रहेगा कि उनकी सैकड़ों रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं।
बुलाकी शर्मा क्या मैं व्यंग्यकार हरिशंकर परसांई तक को बहुत बाद में पहचान पाया। यह तो भला हो के.पी. सक्सेना और श्वेत-श्याम टेलीविजन युग का कि उन्होंने एक कवि सम्मेलन में ऎखा व्यंग्य पढ़ा। मैंने व्यंग्य क्या सुना, मैं व्यंग्य का मुरीद हो गया। फिर तो शरद जोशी का प्रतिदिन कॉलम पढ़ने लागा। बहुत बाद में पता चला कि मेरे घर जो बहुत सारी पुस्तकें हैं और पिताजी लिखते-पढ़ते रहते हैं वे भी व्यंग्यकार हैं। मेरे स्व. पिता श्री सांवर दइया ने साहित्य के प्रति मेरी प्रतिभा का आकलन मेरी युवावस्था में कर लिया था। वे अपनी रचनाएं मुझे सुनाया करते थे। उनके राजस्थानी व्यंग्य मुझे सुनने पड़ते थे। बाद में उन्होंने मेरा प्रमोशन किया और मैं उनकी रचना का पहला पाठक होने लगा। पेन रुक रहा है। विषयांतर हो रहा है।
राजस्थानी के संदर्भ में हरिशंकर परसांई को दो टुकड़े करने पड़ेंगे। राजस्थानी के हरिशंकर परसांई बुलाकी शर्मा हैं या मेरे स्वर्गवासी पिता सांवर दइया हैं इस बात पर संदेह है। वोट किए जाएंगे तो दोनों को आधे आधे मत मिलेंगे। फिर पेन रुक रहा है। तो आप जान लिजिए कि राजस्थानी में बुलाकी शर्मा के दो व्यंग्य संग्रह ‘कवि कविता अर घरआळी’ (1987) तथा ‘इज्जत में इज्जाफो’ (2000) प्रकाशित हैं। जिनमें 32 व्यंग्य हैं। हिंदी में चार व्यंग्य संग्रह- ‘दुर्घटना के इर्द-गिर्द’ (1997), ‘रफूगीरी का मौसम’ (2008), ‘चेखव की बंदूक’ (2016) और ‘आप तो बस आप ही हैं !’ (2017) प्रकाशित हैं। जिनमें 156 व्यंग्य हैं।
बुलाकी शर्मा कालम राइटिंग के लिए भी जाने जाते हैं। पहले जब धारदार व्यंग्य लिखते थे बहुत डरते थे। सोचते थे कहीं कोई लड़ाई नहीं कर बैठे इसलिए वे छद्म नाम से लिखा करते थे। अब तो यह रहस्य खुल गया कि दैनिक भास्कर बीकानेर में अफलातून नाम से लंबे समय तक ‘उलटबांसी’ लिखने वाले कोई दूसरे नहीं अफलातून शर्माजी हैं। लोगों को उन पर पहले भी शक था। बीकानेर के ‘विनायक’ में ‘तिर्यक की तीसरी आंख’ में भी डरपोक बुकाकी शर्मा लंबे समय तक लिखते रहे। बाद में जब सरकारी सेवा से शर्माजी ने ऐच्छिक सेवानिवृति ली, तब से ‘विनायक’ में तिर्यक का रहस्य भी खोल दिया। रहस्य यह भी है कि सरकारी सेवा से सामन्य ढंग से मुक्त होने पर लोगों को पता चल जाता है कि उम्र साठ हो चुकी है। बस साठ को छूने से दो-चार महीने आपने ऐच्छिक सेवानिवृति का नाटक दिखाया और घर बैठ गए। सरकार के घर बिठाने और खुद के घर में खुद बैठने में तनिक अंतर है। जवान शर्माजी को जो जानते हैं वे यह जान ले। भ्रम में मत रहना काल बाल जो दिखते हैं, सब डाई का कमाल है। लेखा-सेवा वाले सफेद को काले और काले को सफेद करने का मर्म बखूब जानते हैं। इतने वर्षों तक व्यंग्य लिखने वाले शर्माजी अब बहादुर बन चुके हैं। वे अपने नाम से लिखने लगे हैं। दैनिक युगपक्ष में ‘शब्द बाण’ कालम उनके नाम से प्रत्येक रविवार पढ़ा जा सकता है।
पहले बुलाकी शर्मा बड़े आकार के व्यंग्य लिखा करते थे आजकल व्यंग्य का आकार कालम के चक्कर में छोटा करते गए हैं। कहना चाहिए कि तलवार और गुप्ती का काम वे अब कटार और चाकू से निकालने का फार्मूला जान गए हैं। वैसे भी धारदार हथियार रखना कानून अपराध है। गुप्त बात यह है कि जब यह रहस्य उजागर हुआ कि ‘चेखव की बंदूक’ बुलाकी शर्मा के पास है। तब उन्होंने एक व्यंग्य लिखा ‘चेखव की बंदूक’ और कालांतर में इसी नाम से व्यंग्य संग्रह प्रकाशित करवा कर मित्रों को बांटने लगे जिससे कि असलियत इस मजाक में छिप जाए। हुआ यह कि कुछ मित्रों ने मेरी अक्कल निकाल ली और बोले- तुम शर्माजी को भाई साहब कहते हो और घर आते-जाते हो, पता करो कि चेखव की असली बूंदक उन्होंने कहा छिपा कर रखी है।
मैंने एक बार उनके घर मौका मिलने पर खोजा तो बंदूक तो नहीं मिली पर बारूद का खजाना मिला। बारूद इस अर्थ में कि वे ना जाने किस वर्ष से लगातार डायरी लिखते है और असली डायरी लिखते हैं जिसमें जिस किसी चेहर पर कोई मुखौटा अगर उन्होंने देखा है तो उसे भी दर्ज कर दिया है। बुलाकी शर्मा वास्तव में बजरंग बली है जो आज तक अच्छा-बुरा सब कुछ सहन कर सभी से अच्छे संबंध बनाएं हुए हैं किंतु डायरियां जो चुपके से सरसरी निगाह में देखी गई कुछ अंश पढ़े गए से ज्ञात होता है कि उनके आस-पास की असलियत क्या रही हैं। मित्रों के अनेक राज दफन किए हैं। किसी दिन सच्ची बही सामने आ गई तो यकीन जानिए कि वो बारूद का असला होगा कि बहुत-सी चलती दुकाने बंद हो जाएंगी। पेन रुक रहा है और वैसे भी ऐसी नितांत निजी बातें कम से कम मुझे सार्वजनिक नहीं करनी चाहिए बेशक भले मेरी अक्कल निकाल ली गई हो फिर भी इतना होश तो मुझे है।
क्या यह कमाल नहीं है कि 188 व्यंग्य पुस्तकार होने के बाद भी अब भी उनके मन में यह बात बार बार आती है कि व्यंग्य संग्रह आना चाहिए। एक हिंदी में एक राजस्थानी में। उनके व्यंग्य खजाने में अब भी दस व्यंग्य प्रकाशित हो जाएं जितना मसाला है। संभव है कुछ ऐसा हो भी। होना भी चाहिए। उन्हें व्यंग्य विधा के लिए अनेक सम्मान मिले हैं। बीसवीं शताब्दी में यानी 1999 में राजस्थान साहित्य अकादमी उदयपुर ने पुरस्कृत किया। नवीन शोध से पता चला है कि बुलाकी शर्मा बिना चोटी रखे देश में चोटी के व्यंग्यकार बनना चाहते हैं। पुरानी बात है कि एक चोटी वाले ज्योषित ने उन्हें कहा कि बुलाकी तुमको उदयपुर अकादमी से संग्रह ‘दुर्घटना के इर्द-गिर्द’ के लिए पुरस्कार इसलिए मिला कि उस में 21 व्यंग्य थे। अब इस आंकड़े को पकड़ लो और अगर पुरस्कार पाना है तो अगले व्यंग्य संग्रह में 21 व्यंग्य ही आने चाहिए। हमारी भाभीजी वहीं बैठी वार्ता सुन रही थी जो तपाक से बोली- महाराज इन दिनों ये छोटे साइज के व्यंग्य लिखते हैं तो किताब छोटी होगी इसलिए कुछ दूसरा उपाय बताओ?
बुलाकी शर्मा पर पूरा विश्वास किया जा सकता है। वे पूरे विश्वासी है। कभी कभी अंधविश्वासी भी बन जाते हैं खासकर पुरस्कार लेने का मसला हो तो। ज्योषित ने बोला था कि 21 नहीं तो 42 व्यंग्य ले लो। देखिए उनके अगले व्यंग्य संग्रह ‘रफूगीरी का मौसम में’ यही हुआ है। जब मामला नहीं बैठा तो ‘चेखव की बंदूक’ में 51 व्यंग्य रखे गए और इसकी भनक जैसे ही ज्योषित महाराज को हुई वे उनके घर पहुंच गए और इसी वर्ष प्रकाशित व्यंग्य संग्रह ‘आप तो आप ही हैं !’ में 42 व्यंग्य ही रखे गए हैं। मैं ज्योषित नहीं जानता पर राय देने का अवसर नहीं छोड़ना चाहता। कुछ अटपटी बात कहने से चर्चा होती है। सीधी-साधी बात पर कौन दिल फेंकता है। मेरा दावा है कि अगर इक्कीस-इक्कीस व्यंग्यों के इक्कीस संग्रह बुलाकी शर्मा के निकाले जाएं तो उन्हें चेखव की बंदूक जो असली वाली उन्होंने छिपा कर रखी है बेचनी पड़ेगी। एक पंथ दो काज का इससे बढ़िया उदाहरण नहीं हो सकता। यह एक झलक है हमारे स्वदेशी शोध की।
वैसे हमारे देश में शोध की हालत यह है कि बुलाकी शर्मा जैसे बड़े व्यंग्यकार पर कोई बड़ा शोध नहीं हुआ है। हां, बुलाकी शर्मा के लेखन पर यूनीवर्सिटी के कुछ बालक और बालिकाओं ने लघुशोध लिखें है, व्यक्तिगत और सामूहिक। सारी स्थितियों को देखते हुए और व्यंग्यकार शर्माजी की साठी-पाठी उम्र का ध्यान रखते हुए, एक नवजात व्यंग्यकार नीरज दइया ने उनके समग्र लेखन पर आलोचनात्मक पुस्तक का मानस बनाया है। व्यंग्य-यात्रा के संपादकजी संस्मरण में व्यंग्य की फुल मात्रा डालने का आदेश दे रहे हैं तो उनकी प्रेरणा से ही इस आलेख को मेरे मानस ग्रंथ का हिस्सा मान लिया जाए। मिलावट का दौर है। शुद्धता जैसी चीज बाजार में अब बची नहीं। बचा हुआ है अथवा अगर बचाना हो तो प्रेम को बचाएं। जहां प्रेम का आकाल हो तो प्रेम जनमेजय या बुलाकी शर्मा का स्मरण किया जाए। उनकी आत्मीयता से आपके हदय में प्रेम स्रोत से प्रेम छलकने लगेगा। देखिए- सुना आपने सीटी बजी। पेन में सारे कानून-कायदे सेट कर दिए थे इसलिए पेन रुक रहा है। लो एकदम रुक गया।
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लक्ष्मी-सरस्वती संवाद

डॉ. नीरज दइया
ताजा ताजा खबर है कि घटिया स्कूली शिक्षा देने के मामले में भारत को सिल्वर मेडल मिला है। वर्ल्ड बैंक के इस परिणाम में कहीं कोई चूक हुई है वर्ना हमें गोल्ड की उम्मीद थी। सर्वे और सैम्पल टैस्ट में हमारे बच्चों में नकल की बीमारी के कारण हम थोड़ा पिछड़ गए हैं। पिछड़े हुए है तो क्या हम मिडल क्लास परिवार वाले मंथली बजट में खाने-पीने के खर्चे के बाद दूसरा सबसे बड़ा खर्च शिक्षा पर करते हैं। सरस्वती हम पर मेहरबान हो इसलिए लक्ष्मी को लुटाते हैं। हाल यह है कि सरस्वती की कृपा होती नहीं और जो कुछ लक्ष्मी कृपा हमारे पास होती है उस से हाथ धो बैठते हैं। काश कि सरस्वती के चक्कर में लक्ष्मी को बर्बाद नहीं करते तो वर्ड बैंक द्वारा घटिया स्कूली शिक्षा में तो अव्वल घोषित हो जाते। इसी मुद्दे को लेकर लक्ष्मी-सरस्वती में जोरदार भिडंत हो गई।
लक्ष्मी - देश में रक्षा और शिक्षा पर सर्वाधिक अधिक खर्च होता है। फिर भी तुम निहाल क्यों नहीं करती?
सरस्वती - यह मेरी मर्जी है किसे निहाल करूं किसे बेहाल, तुम मुझे पूछने वाली होती कौन हो?
लक्ष्मी- मैं होती कौन हूं, तुम्हारी इतनी हिम्मत कि मुझसे सवाल करती हो। जुबान लड़ाती हो !
सरस्वती - जुवान लड़ाने से क्या मतलब है तुम्हारा। अरे सारा खेल ही इसी जुबान का है। बच्चों को स्कूल में सब बातें करनी आती है पर तुम्हारे गणित के सवाल ठीक से करने नहीं आते। जहां तुम तुम्हारा नाम वहां सब घोटाला।
लक्ष्मी - अरे जा जा, तुम भी दूध की धुली नहीं हो। मुझे क्या पता नहीं है कि बच्चे किताब पढ़ना ही नहीं जानते हैं। पहले तुम अपनी कृपा करो कि वे किताब ठीक से पढ़ना जान जाए। दो अंक ठीक से लिखेंगे तभी तो गणित के सवाल ठीक से कर पाएंगे।
सरस्वती - मैं तो सब कुछ कर दूं पर तुम जो बीच में टांग अड़ाती रहती हो, उसका क्या ? बात होती है शिक्षा की और सब बजट की बातें करते हैं। तुम को पाने के और अपने घर भरने के लिए नई नई योजनाएं लाते हैं, उसका क्या। अरे जब सबकी नजरों में तुम ही तुम हो तो मैं अपनी कृपा क्यों बरसाने लगी। मैं भी देखती हूं कि तुम्हारे बल पर ये कितनी उछल-कूद करते हैं।
लक्ष्मी - अरे रहने दे, रहने दे, मेरे बिना तो कहीं कुछ हो ही नहीं सकता। तुम्हारे विद्या मंदिर के गुरुजी भजन कोई फ्री में नहीं करते। उन सब को मेरे से उम्मीद होती है। ये कहने को सरस्वती पुत्र जरूर है पर मेरी औलादों के बिना सब फीके हैं। पगार के कारण सारे खेल होते हैं।
सरस्वती - कलम के धनी साहित्यकार तो मेरे उपासक है।
लक्ष्मी - यहां भी तुम झूठी साबित हो जाओगी। देखती नहीं ये पुरस्कारों के लिए कैसे कैसे छल-छद्म करते हैं। सारी साठ-गांठ तिकड़म और सेठ-साहूकारों की माया से बनाने-बिगाड़ने वाले पुरस्कारों की है। ये नाम के सरस्वती पुत्र है पर भीतर ही भीतर सब के सब ढोंगी बाबा है।
सरस्वती - हे कलम के धनी साहित्यकार ! क्या तूं मेरा सच्चा उपासक है? बोल वत्स....
मैं असमंजस में पड़ गया कि कहीं मेरे झूठ को मां सरस्वती जान नहीं जाए फिर भी प्रत्येक में बोला- हां-हां मैं सच्चा उपासक हूं और अज्ञात भय के मारे आंखें खुल गई।
पास बैठे पंच काका पूछ रहे थे- क्या कोई सपना देखा? मैंने तुम्हें कितनी बार कहा है कि रात को ये पढ़ना लिखना छोड़, पूरी नींद लिया कर। बात तो बराबर है, रात में जागता है और दिन में सोता है।
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09 अक्तूबर, 2017

टांय टांय फिस्स

पुस्तक समीक्षा-
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टांय टांय फिस्स   व्यंग्यकार : डॉ. नीरज दइया प्रकाशक- सूर्य प्रकाशन मंदिर, दाऊजी रोड (नेहरू मार्ग) बीकानेर पृष्ठ : 96 मूल्य : 200/- संस्करण : 2017   
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    राजस्थान के व्यंग्य लेखन परिदृश्य में आज फारुख अफरीदी, अतुल चतुर्वेदी, अनुराग वाजपेयी, अजय अनुरागी, बुलाकी शर्मा, मधु आचार्य आशावादी, नवनीत पांडेय और अब नीरज दइया भी शामिल हो गये। डॉ. नीरज दइया के सद्य प्रकाशित व्यंग्य संग्रह ‘टांय टांय फिस्स’ में उनके चालीस व्यंग्य संकलित हैं। इन व्यंग्य रचनाओं से गुजरते हुए कहा जा सकता है कि डॉ. नीरज दइया उन व्यंग्यकारों में से एक हैं जिनके लेखन में भौतिकतावादी संस्कृति का एहसास हावी नहीं हुआ हैं। अथवा यूं कह लीजिए कि वे अपनी चिंताओं में मनन करने वाले अन्वेषी हैं। अन्वेषक का काम ही अनुसंधान करने का होता है। नए-नए तथ्यों को तलाशना और उस पर मौजूं तरीके से अपनी बात को कहना होता है, जिस पर नीरज दइया को विशेष अधिकार प्राप्त है।
    नीरज दइया के व्यंग्य आज समकालीन परिदृश्य में गंभीरता से अपनी मौजूदगी बनाए हुए हैं, उनकी यह चिंता व्यंग्यधर्मिता के प्रति उनके मौलिक चिंतन को जहां व्यक्त करती है, वहीं उनकी सक्रियता को भी दर्शाती है कि क्यों एक कवि-कथाकार व्यंग्य लिखने को विवश हुआ। उनका समाज के प्रति दायित्वबोध व्यंग्य के माध्य से अपनी चिंताओं के साथ अभिव्यक्त हुआ है।
    संग्रह के आरंभ में प्राक्कथन में वरिष्ठ साहित्यकार भवानीशंकर व्यास ‘विनोद’ ने लिखा है- ‘डॉ. नीरज दइया एक बहुश्रुत और बहुपठित लेखक है।’ इस उक्ति के साक्ष्य में देखें तो संग्रह में संकलित विविध वर्णी व्यंग्यों में नीरज के लेखन में एक ताजगी दिखती है, वह विषयों को समाज से ही उठाते है लेकिन उसको प्रस्तुत निराले ढंग से करते हैं।
    संग्रह की सभी व्यंग्य रचनाओं में एक स्थाई चरित्र के रूप में पंच काका की उपस्थिति से अपनी मौलिकता और निजता बनी है। पंच काका के माध्यम से अनेक सत्यों को उद्धाटित किया है तो व्यंग्यकार नीरज दइया ने व्यंग्य करते हुए खुद को भी नहीं छोड़ा है। वे अपने आप पर व्यंग्य करने का कौशल रखते हैं इसिलिए उनके व्यंग्य में शालिनता और शिष्टता एक स्थाई भाव के रूप में देखी जा सकती है।
    विगत दो वर्षों से मैं उनके लेखन का साक्षी रहा हूँ, वे नियमित रूप से कालम लेखन में भी हाथ आजमा रहे हैं। उनका यह हुनर पक्का तीरंदाज बनाने में कामयाब रहा है। रोजमर्रा के विषय कब व्यंग्य के विषय बन जाते है और कब विसंगतियां उस पर हावी हो जाती है। यह एक प्रकार की बैचैनी है, जो लेखक को औजार देती है कि अब आपका काम है कि रनदे से उस वास्तविकता को निखार कर उसे नए अर्थ से भर दें, या उसे परिभषित कर दें। नीरज दइया के लेखन में कहीं कोई दुराव या छिपाव नहीं है। जैसे बड़ी कंपनियां अपने उत्पाद को बेचने के लिए हथकंडे अपनाती है। ऐसा कुछ भी यहां देखने को नहीं मिलेगा। कोई कंडीशन अप्लाई वाला बोर्ड यहां चस्पा नहीं। अपने लेखन से विशुद्ध सरोकार रखने वाले व्यंग्यकार नीरज दइया कभी किसी दौड़ में शामिल नहीं रहे। लेकिन लेखकीय गुण, माहौल उन्हें शुरू से ऐसा मिला कि वे खुद भी मौलिक लेखन के अंतर्गत कविता-आलोचना और अनुवाद-कर्म करते हुए व्यंग्य लेखन में पूरी ठसक के साथ आ गए।
    समकालीन व्यंग्य रचनाओं में बदलती स्थितियों के साथ त्वरित टिप्पणियां भी शामिल होने लगी है। हर्ष का विषय है कि इस संग्रह में समकालीनता का आग्रह होते हुए भी स्थितियों पर गहनता से सोच-विचार कर उनको आधार बनाया गया है। जीवनानुभव और जीवन की स्थितियों से मुठभेड़ करते हुए नीरज दइया ने मीठी आलोचना का मीठा फल!!, रचना की तमीज, ‘सामान्य’ शब्द कैसे है सामान्य, खाने-पीने की शिकायत, विकास का गणित, साहित्य माफिया, याद नहीं अब कुछ, बेईमानों पर पड़ी बड़ी मार और टांय टांय फिस्स आदि व्यंग्य लिखते हुए व्यंग्य की लाठी को बचाए रखा है। 
    नीरज दइया का लेखन विश्वसनीय है। समाज के विषय अब उनके विषय होते जा रहे हैं। व्यंग्य लेखन का दर्द वे समझते है और तभी उनके पास विसंगतियां आकर मुस्कराने लगती हैं। उनके तेवर को देख कर लगता है कि उनकी आलोचना में भी अच्छी पकड़ हो सकती हैं। विषय में से अपने हिस्से की धूप निकाल लेना नीरज दइया भली-भांति जानते है। टांय टांय फिस्स व्यंग्य संग्रह के व्यंग्य निश्चित ही पठनीय है, और पाठकों द्वारा पढ़े जा रहे हैं। व्यंग्य-यात्रा के सम्पादक डॉ. प्रेम जनमेजय का यह कहना कि व्यंग्य लेखन ऐसा धारधार विषय है कि वह इतना पैना है कि सामने वाले को भयभीत कर दें, लेकिन बिना अहित किए। इससे साफ जाहिर है कि नीरज दइया के पास एक सशक्त भाषा है जिसका उपयोग वे अपने लेखन में बेबाक तरीके से कर रहे हैं। कहीं-कहीं उनके लेखन में हरीश नवल जैसे अत्यंत शालीन व्यंग्यकार बोलते दिखते है तो लगता है कि ‘टॉय-टॉय फिस्स’ को पहचान मिलने में अब देर नहीं। नीरज दइया को लेखन में श्रीलाल शुक्ल होना है, तो मार्कें का सुभाष चन्दर भी। फिलहाल व्यंग्यकार डॉ. दइया को शुभकामनाएं कि उनका लेखन यशस्वी हो, वे अपने पाठक अर्जित करें। पुस्तक के सुरुचिपूर्ण मुद्रण और आकर्षक प्रस्तुति के लिए प्रकाशक साधुवाद के पात्र हैं।
- डॉ लालित्य ललित
सम्पादक, नेशनल बुक ट्रस्ट,इंडिया,
नेहरू भवन, 5,इंस्टिट्यूशनल एरिया,फेज-2,
वसन्त कुंज,नई दिल्ली-110070